मनोज अभिज्ञान-
ग़ाज़ा पट्टी आज दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में से एक बन चुकी है, न केवल आम नागरिकों के लिए, बल्कि सच्चाई की खोज में जान जोखिम में डालने वाले पत्रकारों के लिए भी। पिछले दो सालों में इजरायल-हमास संघर्ष के दौरान ग़ाज़ा में पत्रकारों की हत्याओं की संख्या ने इतिहास के सबसे भयानक आँकड़े दर्ज किए हैं। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) के अनुसार, 7 अक्टूबर 2023 से जुलाई 2024 तक 100 से अधिक पत्रकार मारे गए, जिनमें अधिकांश फ़िलिस्तीनी थे। इनमें वे भी शामिल हैं जो केवल समाचार संग्रहण, सत्यापन या रियल-टाइम रिपोर्टिंग कर रहे थे। विश्व के किसी अन्य संघर्ष क्षेत्र में पत्रकारों की इतनी बड़ी संख्या में हत्याएं नहीं हुईं। इस संघर्ष ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और युद्ध कानून पत्रकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त हैं या इनकी अवहेलना को चुपचाप सह लिया जा रहा है।
पत्रकार युद्ध क्षेत्र में विशुद्ध रूप से नागरिक माने जाते हैं, और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के तहत उन्हें विशेष सुरक्षा दी जानी चाहिए। फिर भी ग़ाज़ा में मारे गए पत्रकारों की कहानियाँ इस सुरक्षा की बुरी तरह विफलता की गवाही देती हैं। कई पत्रकारों को निशाना बनाकर मारा गया, उनके प्रेस जैकेट और कैमरे के बावजूद। कुछ के परिवारों को भी बमबारी में जान गंवानी पड़ी, जिससे यह संदेह और गहरा हो गया कि ये केवल कोलेटरल डैमेज नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया दमन है। कुछ मामलों में पत्रकारों के निवास स्थान और दफ्तर भी हमले का निशाना बने।
ग़ाज़ा में पत्रकारों की दुर्दशा केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सूचनाओं की घुटन, इंटरनेट ब्लैकआउट और दमनकारी कानूनों की भी अहम भूमिका है। जब एक पूरे क्षेत्र में संचार माध्यम बंद कर दिए जाएं और केवल सैन्य-नियंत्रित सूचनाएँ सामने आएँ, तो
सच्चाई का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) ने ग़ाज़ा को सूचना के अंधेरे में डूबा क्षेत्र कहा है। स्थानीय पत्रकारों पर न केवल जान का खतरा है, बल्कि उन्हें पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, निकास विकल्प और स्वतंत्रता भी नहीं मिलती।
ग़ाज़ा जैसे युद्धक्षेत्रों में पत्रकारों की सुरक्षा न केवल मानवीय दायित्व है, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अंतर्गत विधिक दायित्व भी है। कई महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ और घोषणाएँ पत्रकारों की रक्षा सुनिश्चित करने हेतु मान्यता प्राप्त कर चुकी हैं। जिनेवा कन्वेंशन IV और अतिरिक्त प्रोटोकॉल विशेष रूप से नागरिकों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं जिसके तहत पत्रकारों को गैर-लड़ाकू (non-combatant) नागरिक माना जाता है।
अनुच्छेद 79 (Protocol I) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि: ‘Journalists engaged in dangerous professional missions in areas of armed conflict shall be considered as civilians… यानी, पत्रकारों को तब तक नागरिक माना जाएगा जब तक वे सीधे युद्ध में हिस्सा न लें, और उन्हें वैसी ही सुरक्षा मिलेगी जैसी अन्य नागरिकों को दी जाती है।
इस प्रस्ताव में विशेष रूप से सशस्त्र संघर्षों में पत्रकारों, मीडिया कर्मियों और संबद्ध कर्मचारियों के खिलाफ हिंसा की निंदा की गई है। इसमें यह भी मांग की गई है कि सभी पार्टियाँ अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत अपने दायित्वों का पालन करें और पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। यह प्रस्ताव इस बात को रेखांकित करता है कि पत्रकारों पर जानबूझकर हमला करना युद्ध अपराध हो सकता है।
यूनेस्को की Journalist Safety Strategy और UN Plan of Action on the Safety of Journalists and the Issue of Impunity (2012) पत्रकारों की सुरक्षा और उन पर हमलों की निष्पक्ष जांच की मांग करता है। यह ढांचा सदस्य देशों से अपेक्षा करता है कि वे पत्रकारों की रक्षा के लिए कानून बनाएं और दोषियों को सजा दिलवाएं।
यदि किसी पत्रकार को जानबूझकर मार दिया जाता है, विशेष रूप से किसी संघर्ष क्षेत्र में, तो यह ICC के तहत युद्ध अपराध हो सकता है। ICC के रोम संविधि के अनुच्छेद 8 के तहत नागरिक आबादी पर जानबूझकर हमला, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर हमले, सभी को युद्ध अपराध माना जाता है। 2024 में ICC के मुख्य अभियोजक ने इस बात के संकेत दिए थे कि ग़ाज़ा में युद्ध अपराधों की जांच की जाएगी, लेकिन अब तक पत्रकारों की मौतों को इस जांच में प्राथमिकता नहीं दी गई है। यह अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय के ढांचे की निष्क्रियता को उजागर करता है।
पत्रकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जीवन का अधिकार, और कार्य की स्वतंत्रता जैसे अधिकार यूएन मानवाधिकार घोषणा (UDHR) और अंतर्राष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों की संधि (ICCPR) के तहत प्राप्त होते हैं। विशेषकर अनुच्छेद 19 (ICCPR), जो सूचना तक पहुँच और उसके संप्रेषण की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। पत्रकारिता इसका आवश्यक अंग है। गैर सरकारी संगठन और स्वतंत्र वैश्विक संस्थाएँ जैसे इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (IFJ), Amnesty International और Human Rights Watch बार-बार यह रेखांकित कर चुके हैं कि ग़ाज़ा में पत्रकारों के खिलाफ की गई हिंसा न केवल युद्ध अपराध की श्रेणी में आती है, बल्कि यह जानबूझकर चौथे खंभे को तोड़ने का प्रयास है। जब मीडिया को डर और दमन के साये में डाल दिया जाए, तब किसी भी लोकतंत्र या मानवाधिकार की बात करना ढोंग बन जाता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2013 में 2 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा दिवस के रूप में मान्यता दी। इसका उद्देश्य पत्रकारों पर बढ़ते हमलों को उजागर करना और सदस्य देशों को उनकी सुरक्षा की गारंटी देने हेतु बाध्य करना था। परंतु जब दुनिया के सबसे बड़े संघर्ष क्षेत्रों में, विशेषकर ग़ाज़ा में, इस तिथि का कोई महत्व नहीं रह जाता, तो यह वैश्विक नैतिक व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। ग़ाज़ा में पत्रकारिता करना अब बहादुरी से आगे की चीज़ बन चुका है। यह एक प्रकार का आत्मबलिदान है। सच्चाई की कीमत वहाँ जान से चुकानी पड़ती है। ऐसे समय में जब दुनिया के अधिकतर लोकतांत्रिक देश चुप्पी साध लेते हैं, जब वसुधैव कुटुंबकम् का दर्शन खोखला लगने लगता है, तब पत्रकारों की कुर्बानियाँ नई मानवता की मांग करती हैं। उनका बलिदान केवल सूचना की आज़ादी के लिए नहीं, बल्कि ऐसे भविष्य के लिए है जहाँ सत्य बोलने पर मौत नहीं मिलती।
इस संदर्भ में भारत का रवैया भी कठघरे में आता है। जब भारतीय अदालतें ग़ाज़ा में हो रहे नरसंहार के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को गैर-जरूरी या राजनीतिक खतरा करार देती हैं, तब वे वसुधैव कुटुंबकम् की आत्मा का गला घोंट देती हैं। न्याय व्यवस्था का यह दृष्टिकोण केवल संवैधानिक मूल्यों की अवमानना नहीं, बल्कि मानवता के साथ विश्वासघात है। ग़ाज़ा में पत्रकारों के नरसंहार पर चुप रहना उस ऐतिहासिक पीड़ा को नज़रअंदाज़ करना है, जिससे खुद भारत का स्वतंत्रता संग्राम जन्मा था।
इसलिए आज आवश्यकता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ, प्रेस परिषदें, मानवाधिकार आयोग और नागरिक समाज मिलकर इस वैश्विक अपराध के विरुद्ध आवाज़ उठाएँ। जब किसी पत्रकार की हत्या होती है, तो वह किसी व्यक्ति की मौत नहीं होती, सच्चाई की हत्या होती है, और इतिहास को खामोश कर देने की कोशिश होती है।


