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सुख-दुख

25 साल बाद हैदराबाद पहुंचे वरिष्ठ पत्रकार से रिश्तों के मायने जानिए!

परमेंद्र मोहन-

भगवान ने मुझे जो भी सौगात दी है उनमें से एक है रिश्ते। हैदराबाद में 1998 से लेकर 2001 तक मैंने और Kumkum Mohan ने वार्ता में साथ काम किया था और पीहू Aakansha यहीं हुई थी, जिसके बाद मैं वहीं ईटीवी में चला गया था और फिर नोएडा आ गया।

करीब 25 साल बाद हैदराबाद गया तो उन सभी साथियों को फोन किया, जिसके बाद जो उस वक्त जहां थे, वहीं से सीधे लोकेशन पूछ कर पहुंच गए। जो नहीं आ पाए उन्होंने अफसोस जताया, नाराज़गी जताई कि कम से कम 3-4 घंटे पूर्व सूचना का टाइम तो देना चाहिए था, प्रॉमिस कराया कि अब तो एक बार और आना ही होगा। पीहू पहली बार अपनी अक्ल में अपनी जन्मस्थली जाकर बेहद खुश थी और सबकी आत्मीयता देख कर हैरान भी थी कि इतने लंबे अंतराल के बाद भी स्नेह का धागा कितना मज़बूत है।

अब सोचिए कि अक्सर और बहुत से लोग जो कहते हैं कि वक्त बदल गया है, लोग बदल चुके हैं, रिश्ते मायने खो चुके हैं, उन्हें कैसे समझाऊं कि एक फोन पर ढाई दशक बाद अपना काम आगे पीछे मैनेज कर जो मित्र तेज़ धूप में मिलने आए उन्हें क्या मिला और उन साथियों को रिकॉल करके एक बिज़ी शेड्यूल में बात मुलाकात से मुझे क्या मिलना था?

दरअसल हम अपनी मशीनी जिंदगी में उन अपनों को भी नहीं समझ पा रहे हैं जो बिना किसी स्वार्थ, बिना किसी मकसद हमेशा जुड़े होते हैं क्योंकि ये जुड़ाव ही जीवन है। यकीन मानिए आज भी हैं ऐसे लोग जिन्हें हमसे कुछ भी नहीं चाहिए और जिनसे हमें भी कुछ नहीं चाहिए फिर भी दोनों को ही दोनों अगर चाहिए तो फिर समझ लीजिए कि जीवन धन्य है क्योंकि पैसा, पद, संपत्ति, ऐशो आराम से साथी नहीं बनाए जा सकते।

अद्भुत हो सुभाष, नरहरि, नरेश तुम लोग और अजय, शिवाजी, राहुल देव अगली बार पक्का मिलेंगे जुबान दे रहा हूं।

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