
महेश शर्मा-
पत्रकारीय जीवन यात्रा में छोटे-मोटे पड़ाव आते गए। जुनून बना रहा। हार नहीं मानी। दौड़-भाग जारी रही। सीमित संसाधन थे। नौकरी के दौरान चंद रुपल्ली की तनख्वाह। लखनऊ, दिल्ली का किराया भाड़ा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पास घनश्यामदास बिड़ला थे पर मेरे पास तो कोई घनश्यामदास बिड़ला थे नहीं। किराया, कभी रोटी तो कभी डबलरोटी से पेट भरना, रेलवे प्लेटफार्म पर समय बिताने का भी दौर गुजरा। संकोची स्वभाव के चलते किसी की चाय भी बोझ सरीखी लगती थी। हां, लेकिन हार नहीं मानी।
क्रम से गिना रहा हूं, कहां-कहां हाथ-पांव मारते रहे। कलम घसीट का सपना लिए जिंदगी चप्पल घसीट में बदलती जा रही थी। पत्रकारीय जीवन की यात्रा में घर वाले तक मेरे साथ नहीं थे। एक रात तो कान पकड़कर घर से बाहर कर दिया गया। पितातुल्य आर्यनगर वाले माना बाबू (वरिष्ठ पत्रकार सुधीर मिश्रा के पिता) ने सुधीर की गुजारिश पर अपने घर में रहने की जगह दी, जहां मैं लगभग एक माह रहा। बाद में बाबू (पिताजी) आकर लिवा ले गए।
खैर, विवाह हो चुका था। हमारे दोस्तों ने संघर्ष में बहुत साथ दिया। स्टेट बैंक वाले दीपकराज गुप्ता हों या अशोक यादव। ये कदमताल करते दिखायी दिए। एक की लम्ब्रेटा तो दूसरे की बुलट ने खूब साथ दिया। लम्ब्रेटा स्कूटर का नाम ही दद्दा (बड़े भाई) रख दिया था। पेट्रोल डलवाकर उछल-उछलकर किकियाते (किक मारकर स्टार्ट करना) थे तब कहीं जाकर दद्दा स्टार्ट होते थे। कानपुर के धाकड़ कहे जाने वाले पत्रकारों से जान-पहचान अशोक यादव (अब स्वर्गीय) ने करायी। इनमें योगेश वाजपेयी, दिलीप शुक्ला, राजीव शुक्ला, फोटो जर्नलिस्ट कुमार, रवि पांडे, रवींद मिश्रा दादा, कुंतल वर्मा, तनवीर हैदर उस्मानी, अरुण अग्रवाल, लखनऊ वाले रामदत्त त्रिपाठी आदि।
आत्मविश्वास से लबरेज होने के कारण किसी से भी मिलने बात करने में कोई हिचक नहीं रही। ज्यादा से ज्यादा मना कर देंगे, यह सोचकर नौकरी मांगने के लिए अमृत प्रभात के कमलेश बिहारी माथुर, नवभारत टाइम्स के रामपाल सिंह, पंजाब केसरी के अश्वनी कुमार से मिलने तक दौड़-धूप की। अस्थायी छोटे-मोटे पड़ाव आते रहे। स्थापित होने के लिए लिखना-पढ़ना मूल मंत्र था, सो करता रहा। (लगता है थोड़ा भटक रहा हूं)
खैर, दैनिक जागरण में नरेंद्र मोहन जी से साक्षात्कार करा के प्रमोद तिवारी ने अवसर तो दे दिया पर भीतरखाने की राजनीति कुछ उलझाने सी लगी। प्रमोद तिवारी ने कानपुर केसरी से तो मैंने लोक भारती से पत्रकारीय जीवन की शुरुआत की। हम दोनों में मामा और भांजे का रिश्ता था। मैं प्रमोद का मामा था। एक बेहतरीन गीतकार को फिल्मों में ट्राई करने की सलाह महंगी पड़ गयी। दो साल भी दैनिक जागरण में बीते नहीं थे कि प्रमोद तिवारी से हल्का-फुल्का विवाद हो गया। गुस्सा होकर मैंने दैनिक जागरण को अलविदा कह दिया। मालिकों से भी नहीं मिला था। क्योंकि जिसने मुझे रखवाया वही मेरे लिए मालिक के समान था। पर थोड़ा ऐंठू स्वभाव का।
इस दौरान बीट रिपोर्टिंग में तब तक आज अखबार में काम करने वाले रमेश वर्मा जी मेरे मुकाबिल थे। डर भी लगता था कि कहीं पिट न जाऊं। हां इसी दौरान श्रीप्रकाश जायसवाल मेयर बने। यूपी में जनता दल की सरकार में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री। बाहैसियत मुख्यमंत्री वह पहली बार कानपुर आए। हेलीकॉप्टर सिविल एयरपोर्ट पर लैंड किया। मैं कवरेज पर था। शाम दफ्तर पहुंचते ही, अचानक नरेंद्र मोहन जी लोकल में प्रकट हुए और छह फुट से थोड़ा ज्यादा लंबे, मोटे फ्रेम का चश्मा चढ़ाए, अंदर से झांकती मजीरा जैसी आंखे, ठीक मेरे पीछे खड़े होकर बोले, प्रमोद, सीएम मुलायम सिंह यादव को कवर करने कौन गया था? मेरी तो सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गयी।
वैसे भी सोमवार को होने वाली एडिटोरियल मीटिंग में उनके सवालों से बचने के लिए खंभे के पीछे बैठता था। फिर वह ढूंढ़ निकालते थे। उनके सवाल कुछ इस तरह के होते थे कि जैसे एयरबस कहां बनती हैं? होनालुलू कहां है? इत्यादि-इत्यादि। तो विवाद के चलते प्रमोद से पटरी नहीं बैठी और दैनिक जागरण को गुडबाय कहना पड़ गया। तेजी दिखाना भी छोड़ने का एक कारण बना। एनटीसी में भ्रष्टाचार श्रृंखलाबद्ध पर पांच स्टोरी लिख पाया था कि कंटेंट को लेकर जांच बैठा दी गयी। आलोक भदौरिया को जांच अधिकारी बनाया गया। प्रमाण सामने रखे। जैसे तैसे फारिग हुए। भदौरिया जी हमारे सीनियर और खांटी पत्रकार थे। लेकिन किस्मत में तो एक मेहनती, जुझारू, कंटेंट पर पकड़ रखने वाले स्वनाम धन्य संपादक सत्य प्रकाश त्रिपाठी के साथ काम करना लिखा था।
हालांकि, जागरण छोड़ने के बाद हार मान ली थी पर अबकी माध्यम बने हमारे मित्रवत छोटे भाई चुन्नू दुबे (राजकुमार दुबे)। काम की तलाश और छोटी बहन सुनीता के विवाह की चिंता खाये जा रही थी। इसी कश्मकश में दो महीने बीत गए। चुन्नू के स्कूटर पर आवारगी होती रही। पुराने दोस्त हौसलाफजायी करते रहे। चुन्नू हमें परमट में आनंदेश्वर बाबा के दर्शन कराने जब तब ले जाते थे। वह रोज वाले थे।
एक दिन चुन्नू बोले, आपके मुंह से जनसत्ता अखबार की अक्सर तारीफ सुनता हूं। आप कहते थे कि स्वतंत्र भारत में कानपुर के संपादक सत्यप्रकाश त्रिपाठी जी वहीं से आए हैं। चलो, उनसे मिलते हैं। मैने कहा, यार उन्हें मैं जानता तक नहीं हूं। कैसे मिलूंगा? चुन्नू बोले, अंबरीश भाई साहब (अंबरीश शुक्ला) के माध्यम से बात करो। खैर मैने संपर्क किया तो उन्होंने मेघदूत होटल के ग्राउंड फ्लोर पर शलाका रेस्टोरेंट बुलाया और तीन डोसे का आर्डर दिया। मैने पूछ लिया, ये तीन क्यों। बोले, दो मैं खाऊंगा एक तुम। मैं मुस्करा दिया। बड़ी बात यह कि पेमेंट उन्हीं ने किया था।
नटशेल में यह कि अंबरीश जी की सलाह के मुताबिक उनके नाम का जिक्र न होना चाहिए। वरना हो नहीं पाएगा। मैंने सोचा कोई लागडांट रही होगी। जब हम डोसा खा रहे थे तो चुन्नू सड़क पार स्कूटर लिए खड़े थे। चुन्नू हमारे रथ और मनोरथ के सारथी जो बने थे। उनकी मर्जी पर उन्हीं के स्कूटर से चलता था और चलाते वही थे। तो मैं उन्हें रथ और मनोरथ का सारथी कहता था। मेरी इस यात्रा में चुन्नू न होते तो मैं कहीं छोटी सी दुकान किए जीविका चला रहा होता।
खैर, स्वतंत्र भारत और पायनियर अखबार राजाराम जैपुरिया का था। कानपुर शरद जैपुरिया देखते थे। हालांकि उनके लिए यह उद्योग ही था और हनक व सत्ता में पैठ बनाने का माध्यम भी। लेकिन कई कलम घसीट वहां नौकरी करके जीवन की गाड़ी चला रहे थे। शिशिर जैपुरिया लखनऊ देखते थे। दोनों जुड़वा भाई। एक साथ एक जैसे कपड़े पहने हों तो आप पहचान नहीं सकते। विधानसभा मार्ग पर ऑफिस व प्रेस था।
बता दूं कि यह स्वतंत्र भारत में मेरी दूसरी बार नौकरी थी। संपादकीय निजाम बदला हुआ था। राजनाथ सिंह प्रधान संपादक थे। कानपुर में भी दिग्गज पत्रकारों का जमावड़ा था। जैसे विष्णु त्रिपाठी, ओमशरण त्रिपाठी, प्रमोद झा, अजीत तिवारी, परम श्रद्धेय बांके बिहारी शर्मा, अनिल जी, मांधता सिंह, एसपी सिंह, अमित कुमार सिंह आदि बहुत नाम थे। इनके बीच पैठ बनाना मेरे जैसे पत्रकार के लिए आसान न था। हंसमुख स्वभाव और सबको सम्मान देने के कारण यह आसान हो गया था। तो स्वतंत्र भारत के गेट पर जाकर त्रिपाठीजी के पास पर्ची भिजवायी। तब विजिटिंग कार्ड की औकात ही नहीं थी। पहली बार उनसे मिलना हुआ। पर्ची मिलते ही उन्होंने मुझे बुला लिया।
मैंने देखा कि संपादक की कुर्सी पर एक कृशकाय व्यक्ति अपने इर्दगिर्द अखबारों की फाइलों के साथ बैठा दिखा। इम्प्रेसन जमाने वाला में आई कम इन सर बोला। उन्होंने गरदन हिला दी। उनका पहला सवाल जागरण क्यों छोड़ा? जवाब, आप तो सब जानते ही हैं। न जानते हों तो विस्तार से बताऊं। वह बोले, नहीं नहीं। उन्होंने कुछ नहीं पूछा.. इतना कहा, अपन शरद जी बात कर लेते हैं फिर बताते हैं। फोन कर लेना। इतनी बातचीत के बाद मैं बाहर आया। वहां पर साथी उत्सुकता से मुझे देखकर सवालिया नजरों से पूछ रहे थे कि अबे क्या हुआ? मैने कहा अभी कुछ नहीं। गेट कीपर के पास स्टूल पर बैठे चुन्नू ने भी सवालिया नजरों से देखा तो चेहरे पर मुस्कान देखकर खिलखिला पड़ा।
दूसरे दिन शरद जैपुरिया से सामना होना था। चुन्नू फिर मेरे साथ। इंटरव्यू में पास हुआ। फिर संपादकजी (त्रिपाठी जी) ने कहा कि ठीक है कल से आइए। यहां से चुन्नू की भूमिका खत्म। यह मेरे लिए महत्वपूर्ण पड़ाव था। दरअसल स्वतंत्र भारत के कानपुर संस्करण का उद्घाटन करने आए तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी ने मर्चेंट चैंबर हाल में भाषण में राजाराम जैपुरिया की ओर देखते हुए यह कहा कि जैपुरिया जी आपको अखबार चलाना है तो कनपुरिया होना होगा। यह बात तभी मैने गांठ बांध ली कि अखबार के स्थानीय संस्करण में स्थानीय मुद्दे, शहर की संस्कृति, भाषा, तीज त्योहार आदि की छाप होनी चाहिए। सत्यप्रकाश त्रिपाठी जी भी इसी मिजाज के थे। प्रभाष जोशी जी ने उनसे कह दिया था कि खूब चौके, छक्के मारना। प्रबंधन से न पटरी बैठे तो दिल्ली लौट आना। उसी कुर्सी पर बैठकर काम शुरू कर देना।
अब बताइए जिसके पीछे प्रभाष जोशी जैसा व्यक्तित्व दीवार की तरह खड़ा हो तो वह हर गेंद बाउंड्री पार पहुंचाने का प्रयास करेगा ही। और फिर जब संपादक जी ऐसे हों तो रिपोर्टर तो छाती चौड़ी करके फील्ड में दिखेगा ही। काम और मेहनत के बूते मैं उनका प्रिय रिपोर्टर हो गया।
त्रिपाठी जी के नेतृत्व में अखबार कानपुर में इशू बेस्ड जर्नलिज्म (मुद्दा आधारित पत्रकारिता) के लिए पहचाना गया। पर अखबार का यह ट्रांजिट पीरियड था। जैपुरिया ग्रुप ने इसे ललित मोहन थापर ग्रुप के हाथों बेच दिया। धीरे-धीरे संपादकीय में भी ताबड़तोड़ परिवर्तन होने शुरू हो गए। पायनियर में विनोद मेहता ने संपादकीय कमान संभाल ली तो स्वतंत्र भारत में घनश्याम पंकज ने। कानपुर में लोकप्रिय हो रहे स्वतंत्र भारत को नये मैनेजमेंट द्वारा फिलहाल टच नहीं किया गया। मुझे नगर महापालिका (नगर निगम), केडीए, जलसंस्थान की बीट दी गयी थी। कायदे कानून पढ़ने में रुचि होने के कारण रिपोर्टिंग में डेप्थ आती गयी।
वर्ष 1991 में श्रीप्रकाश जायसवाल की मेयरी के दौरान महापालिका ने सर्वसम्मति से अतिक्रमण हटाओ अभियान शुरू किया। तत्कालीन मुख्य नगर अधिकारी आरएन त्रिवेदी थे। कुछ संयोग ऐसा था कि माहौल बनाने में सिर्फ स्वतंत्र भारत की भूमिका रही। मेरी पीठ पर त्रिपाठी जी का हाथ था। हिदायत थी कि किसी से कंप्रोमाइज न करना, दबाव में न आना। सच छापेंगे, छिपाएंगे रत्ती भर नहीं। उन्होंने लोकल एडीटोरियल लिखने शुरू कर दिए। जनता को बड़ी राहत महसूस हुई। पहले अतिक्रमण हटाओ अभियान कोई जानता ही नहीं था। जन प्रतिनिधियों और अधिकारियों के साथ ही आम जनता का ऐसा सामंजस्य बना कि अखबार हाथोंहाथ बिकने लगा।
उधर प्रबंधकीय खामियों के चलते स्वतंत्र भारत के समक्ष न्यूजरील समय से न मिलने का संकट उत्पन्न हो गया। मालिकों की प्राथमिकता पायनियर था न कि हिंदी अखबार। इस कारण त्रिपाठीजी बहुत तनाव में रहने लगे थे। पर जाहिर नहीं होने देते। वह संपादकीय राजनीति की शतरंजी बिसात के भी सीधे सपाट खिलाड़ी थे। क्षमता इतनी कि अकेले अखबार निकाल लेने का आत्मविश्वास से लबालब।
बहरहाल घंटाघर, विजयनगर, किदवईनगर जैसे अतिक्रमण से अटे पटे चौराहे फुटपाथ साफ होने लगे। हिंसा हुई पर अखबार निडर होकर जनता के साथ खड़ा था। इस प्लानिंग का हम लोग हिस्सा थे। जन समर्थन बहुत बड़ी चीज होती थी वह स्वतंत्र भारत कानपुर में बाकियों के मुकाबले तेजी से हासिल कर रहा था। फिर तो हर बीट पर तीखी पैनी गहरायी वाली पत्रकारिता शुरू है गयी थी। खबर के पीछे खबर लिखने की आजादी और उसकी बढ़ती पठनीयता का मजा हमसे पूछिए।
यही नहीं, जलसंस्थान (अब जलकल) द्वारा कच्चे पानी की सप्लाई से पीलिया महामारी की रिपोर्टिंग, डॉली नर्सिंगहोम मे बच्चा प्रकरण, कस्टडी में मौत, अवैध कब्जे और सोसाइटी की जमीनों पर अवैध कब्जे, विकास शुल्क और नियमितीकरण पर इन डेप्थ रिपोर्टिंग ने हमारा बाजार मूल्य कुछ इस कदर बढ़ा दिया कि चौतरफा जय जय। उधर प्रबंधन के चलते स्वतंत्र भारत के हालात बिगड़ते गए तो इधर अमर उजाला ने कानपुर संस्करण शुरू करने का इरादा बनाया। कानपुर संस्करण के पहले संपादक अच्युतानंद मिश्रा जी हम लोगों को संस्करण शुरू करने के एक महीने पहले त्रिपाठी और मुझ समेत अच्छे पत्रकारों की टीम लेकर अमर उजाला ले गए। नियुक्ति हो गयी। पहली बार किसी बड़े संपादक (घनश्याम पंकज) को मैंने इस्तीफा सौंपा था।
अमर उजाला में आलोक भदौरिया, प्रशांत मिश्रा, ओमशरण त्रिपाठी, अंशुमान तिवारी, ओमप्रकाश त्रिपाठी, आशुतोष शुक्ला, रामेश्वर पांडे, अनिल श्रीवास्तव, गिरीश झा, फोटो जर्नलिस्ट संजय लोचन पांडे आदि लोग आ डटे। प्रतिस्पर्धा की लड़ाई दिलचस्प होती गयी। उधर स्वतंत्र भारत में नवीन जोशी, प्रमोद जोशी, धीरेंद्र श्रीवास्तव जैसे दिग्गजों ने अखबार संभाल लिया। बनी बनायी जमीन मिल गयी उन्हें। हां, हमारा प्यारा साथी गोपी रस्तोगी वहीं छूट गया। वह अमर उजाला आने का मन नहीं बना सका।
पिछले पार्ट नीचे पढ़ें….
पार्ट-5 : कानपुर में मंडराया साख का संकट, कुंद हुई कलम कुल्हाड़ों की धार!
कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-2) : सिगरेट की डिब्बी में जुग्गी दादा की सिफारिशी चिट्ठी


