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आज के अखबार : जज के घर नकदी मिलने और सिर्फ तबादला को स्पष्ट करने की बजाय और उलझा दिया

संजय कुमार सिंह

दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर नकदी होने की सूचना उनके घर आग लगने के बाद सार्वजनिक हुई। अब पता चल रहा है कि आग 14 मार्च को लगी थी और खबर कल पहली बार टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी। लगभग एक हफ्ते बाद। मैंने कल लिखा था, इससे पता चलता है कि सिस्टम चौपट हो गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में 21 मार्च 2025 को जो खबर लीड छपी थी वह एक हफ्ते पुरानी थी और कई लोगों को मालूम होने के बावजूद अखबारों में नहीं छपी तो साफ है कि बड़े भ्रष्टाचार की आशंका वाली खबर अखबारों को मिली नहीं या मिली तो छपी नहीं। कारण जो हो, जब टाइम्स ऑफ इंडिया को मिली तब भी दूसरों को नहीं मिली इसका मतलब पर्दा अच्छा था। कामयाब रहा। अमृतकाल में भ्रष्टाचार का (यह या कोई और) मामला सिस्टम से तो नहीं ही पकड़ा गया जब सार्वजनिक हो गया तब भी खबर नहीं छपी, लगातार एक हफ्ते तक। यह मीडिया की आजादी और उसके उपयोग का बढ़िया उदाहरण है। इसे आप नामुमकिन मुमकिन होने के रूप में भी देख सकते हैं। अब यह भी खबर है कि नकदी 15 करोड़ रुपये की थी (हाईकोर्ट बार के हवाले से अमर उजाला)।

इस मामले में अधिकृत बयान सुप्रीम कोर्ट का है जो अपने आप में दुर्लभ होता है। इसमें जो कहा गया है उससे पहले कुछ अन्य ‘सूचनाएं’। 1) नकदी आधिकारिक आवास के आउट हाउस से बरामद हुई थी। दिल्ली अग्निशमन सेवा के प्रमुख ने कहा है, 2) न्यायमूर्ति वर्मा के घर से कोई नकदी ‘बरामद’ नहीं हुई। तब सवाल है कि क्या इसके बिना तबदला हो गया? जी हां, सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने कहा है, तबादला जांच प्रक्रिया से अलग है। यह भी कहा जा रहा है कि पुलिस और अग्निशमन सेवा इस घटना पर शांत है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने रिपोर्ट भेज दी है (इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया)। उसमें क्या है, ढूंढ़ रहा हूं। नवोदय टाइम्स के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट के बाद आवश्यक कार्रवाई होगी। अमर उजाला ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार कॉलेजियम से पहले ही जांच शुरू हो गई थी। इंडियन एक्सप्रेस और अमर उजाला के अनुसार राज्यसभा में उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा कि मामला राजनेता का होता तो तुरंत कार्रवाई होती। इस संबंध में कल मैंने फेसबुक पर लिखा था, लाइव लॉ के अनुसार जयराम रमेश ने कहा (अनुवाद गूगल का, संपादित)  “आपने खुद बार-बार न्यायिक जवाबदेही की आवश्यकता पर सवाल उठाए हैं। असल में, आपने इस मुद्दे पर सदन के नेता को निर्देश भी दिया था। महोदय, मैं आपसे इस मुद्दे पर कुछ कहने और सरकार को आवश्यक निर्देश देने का अनुरोध करता हूं ताकि न्यायिक जवाबदेही बढ़ाने के लिए प्रस्ताव लेकर आये।” इस पर सभापति ने जवाब दिया: “माननीय सदस्यों, मैं इस सदन के 55 सदस्यों द्वारा दिए गए नोटिस (ज्ञापन) से अवगत हूं और  उनका सत्यापन करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए हैं। उन सभी को  ई-मेल भेजा गया था। अच्छी बात यह है कि अधिकांश सदस्यों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है और मुझे अपना कर्तव्य निभाने में मदद की है। कुछ सदस्यों ने अभी तक ऐसा नहीं किया है। उन्हें भी इसी बात को दोहराते हुए एक ई-मेल भेजा गया है। मैंने सभी प्रक्रियात्मक कदम उठाए हैं…जिन सदस्यों ने अभी तक ऐसा नहीं किया है, वे उन्हें भेजे गए दूसरे ई-मेल का जवाब दे सकते हैं, फिर मेरे स्तर पर प्रक्रिया में एक पल के लिए भी देरी नहीं होगी।”

स्पष्ट है कि मामला ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाला है। हाईकोर्ट के जज से संबंधित एक अनूठे मामले में तीन महीने में उपराष्ट्रपति ने पुष्टि के लिए एक मेल भेजा है। एक पल की भी देरी नहीं करने के आश्वासन के साथ। कहने की जरूरत नहीं है कि आज भी इस मामले पर चर्चा हो गई क्योंकि टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर छप गई और सुबह से ही सोशल मीडिया पर हंगामा है।” हाईकोर्ट के जज के घर पर नकद बरामद होने के संबंध में आज के अखबारों में जो खबरें हैं उनमें यह भी है कि मुख्य न्यायाधीश ने जांच शुरू कर दी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड है, भारत के मुख्य न्यायाधीश जांच के संबंध में आज निर्णय कर सकते हैं। स्पष्ट है कि जांच शुरू हो चुकी होगी या आज होगी। मामला टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर छपने के बाद सार्वजनिक हुआ और ऐसे में अखबारों में खबर छपने का महत्व समझा जा सकत है और जो सूचना होने के बावजूद उसे सार्वजनिक नहीं करते हैं या उनका सार्वजनिक होना सुनिश्चित नहीं करते हैं उन्हें जनहित में ऐसा शीघ्रातिशीघ्र करना चाहिये। हालांकि, द हिन्दू के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि जज का तबादला ‘अफवाहों’ से संबंधित नहीं है। इसके बाद मैं यह सुनने पढ़ने के लिए तैयार हूं तबादला सामान्य या नियमित है। अफसरों के तबादले के बाद नेताओं की ओर से यही कहा जाता था। अब तो ऐसा सुनने में ही नहीं आता है। संभव है, अब अफसरों की हिम्मत ही नहीं हो कि कोई ऐसा काम करें जिससे तबादला करना पड़े। आज की खबर ज्यादातर न्यायमूर्ति को बचाने की कोशिश लगती है। वरना उनके पिछले दिनों के उनके कुछ खास फैसलों की चर्चा की जाती और कुछ ठोस होता। सच्चाई यह है कि ऐसा एक ट्वीट व्हाट्सऐप्प पर घूम रहा है। मैंने उसपर अलग से लिखा है।

दि एशियन एज ने लिखा है कि मुख्य न्यायाधीश की जांच जारी है; सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ट्रांसफर फाइनल (अंतिम) नहीं है। यहां अग्निशमन अधिकारी का बयान और व्यापक है। इसके अनुसार, हमारे कर्मचारी को नकदी नहीं मिली। इस बयान का पता चलने के बाद मैंने लिखा था, कहने की जरूरत नहीं है कि अग्निशमन अधिकारी का काम न तो नकद बरामद करना था और ना वे उसके लिए गये थे। उन्हें नकदी नहीं दिखी इसका मतलब यह भी नहीं है कि जिन्हें दिखी उन्हें दृष्टि दोष है। पर सवाल ये है कि तबादला यूं ही कर दिया गया होगा? आज की खबरों से यही लगता है कि तबादला अंतिम नहीं है और इसका संबंध ‘अफवाह’ से नहीं है। इस संबंध में दि एशियन एज ने लिखा है, हालांकि नकदी बरामद होने के कथित मामले में पुलिस की कोई जांच नहीं हो रही है क्योंकि इस घटना पर कोई एफआईआर नहीं हुई है। मैंने कल ही कहा था कि खबर नहीं छपने से लगता है कि देश की व्यवस्था चौपट हो गई है। खबर छपने के बाद जो सब हुआ उससे भी इसकी पुष्टि होती है। वरना नकद मिलने के बाद अमित शाह के मातहत काम करने वाली ईडी को जांच करना चाहिये था? अगर अधिकार के मामले में कोई मुद्दा है तो सवाल उठता है कि क्या वह सिर्फ विपक्षी नेताओं को परेशान करने के लिए है और सफलता दर दो प्रतिशत होने के बाद भी कोई दिक्कत नहीं है। यही हाल सीबीआई का है – जज की नहीं तो उन्हें रिश्वत दे सकने वालों की जांच तो कर ही सकती थी। उनके पुराने मामले तो खोले ही जाने चाहिये। लेकिन उसपर झूठा ट्वीट किया जा चुका है और व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी उसे फॉर्वार्ड कर रहा है।

दूसरी ओर, अमित शाह भी पहले पन्ने पर बने हुए हैं। आइये, देखें उनके मामले क्या हैं। द हिन्दू में उनकी खबर का शीर्षक है, तमिलनाडु में भ्रष्टाचार छिपाने के लिए भाषा के मुद्दे को गर्माया गया। हो सकता है, अमित शाह सही हों पर खबर यह भी है कि भाजपा ऐसा पहले से करती रही है। तमिलनाडु सरकार के भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई से केंद्र सरकार उसकी ईडी या सीबीआई को कौन रोक रहा है? क्या उसे भाजपा पर आरोप से डर है? भाजपा ऐसे आरोपों से कब से डरने लगी? हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार अमित शाह ने कहा है, भारत अब भाषा की राजनीति से ऊपर उठ गया है। यह पास विदाउट इंग्लीश की छूट देने वाले को भारत रत्न देने के बाद हुआ क्या? त्रिभाषा फॉर्मूला को लागू कराने की जिद्द क्या है – राजनीति या शासन? जो भी हो, आरएसएस ने शिक्षा के लिए मातृभाषा का समर्थन क्यों किया है? संयुक्त महासचिव मुकुंद ने क्यों कहा है कि परिसीमन पर बहस राजनीति से प्रेरित है। द टेलीग्राफ ने लिखा है कि आरएसएस ने अंग्रेजी को करियर टेक्नालॉजी के रूप में सीखने की वकालत की है। अगर ऐसा है तो उत्तर भारत में अंग्रेजी सिखाने पर जोर दिया जाना चाहिये या दक्षिण में त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने पर। और यह राजनीति नहीं है? टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, हम आतंकवादियों को आंखों के बीच गोली मारते हैं। गरीब असहाय लोगों को घेरकर सरकारी हथियार से गोली मारने में कोई बहादुरी नहीं है और हो भी तो मारने वालों में है, आपने तो सिर्फ अधिकार दिया है और इसे अपनी बहादुरी मानते हैं तो एक बार लेवल प्लेइंग फील्ड सुनिश्चित करके चुनाव करा लीजिये। हालांकि, टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसी खबर के साथ आज ही बताया है, हाल में मारे गये 30 माओवादियों में 16 महिलायें थीं। अब यह बहादुरी है तो आपको मुबारक।  

नवोदय टाइम्स में एक शीर्षक है, भिंडरावाले बनने का प्रयास करने वाले अब असम की जेल में। यह सही हो सकता है पर जमानत नहीं मिलने के कारण ही कोई जेल में रहता है और जमानत का लोचा सबको पता है। शाहरुख खाने के बेटे को भी नहीं मिली थी और मामला नहीं टिका। बात इतनी ही नहीं है, इसे वसूली का भी मामला कहा गया था और उसके बाद क्या हुआ, जांच में क्या निकला कोई नहीं जानता। जज के घर करोड़ों मिले, जमानत नहीं मिलने और किसी के जेल में होने पर सरकार श्रेय ले तो कुछ कहने की जरूरत है? वैसे, ठग सुकेश रंजन जेल से ही वसूली करता है, जेल में हत्या हो जाती है और जेल में बंद गैगंस्टर लॉरेंस बिश्नोई वसूली करता है, हत्या करा देने के आरोप हैं  और आप कुछ नहीं कर पाते हैं। जेल में होना अपराध है या ईनाम? अगस्टा वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर मामले में क्रिश्चियन मिशेल को दिल्ली हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद भी उन्होंने अदालत में पेश होकर जमानत लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि दिल्ली उनके लिए सुरक्षित नहीं है और वह वापस हिरासत में जाना चाहते हैं। ईडी द्वारा दर्ज 3600 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जेम्स को 2018 में यूएई से प्रत्यर्पित किया गया था। जेम्स ने अदालत में कहा कि ‘सुरक्षा जोखिमों’ के कारण, वह जमानत पर रिहा होने के बजाय अपनी सजा पूरी करना और भारत छोड़ना पसंद करेंगे। स्पेशल जज संजीव अग्रवाल की अदालत में उन्होंने कहा, “मैं जमानत स्वीकार नहीं कर सकता। यह असुरक्षित है। हर बार जब मैं तिहाड़ से बाहर निकलता हूं, कुछ न कुछ होता है। मुझे पुलिस से समस्या है। मैं आपसे निजी तौर पर बात करना पसंद करूंगा।”

इसके बाद भी आप जो कहिये उसे मानना हमारी मजबूरी है। आप कह चुके हैं कि किसी की कृपा से मंत्री नहीं हैं जबकि सबको पता है कि पहली बार किसी पूर्व तड़ी पार को गृहमंत्री बनाने का काम आरएसएस समर्थित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया है। इसे आप उनकी कृपा नहीं, अपनी योग्यता मानते हैं तो हम क्या कर सकते हैं हालांकि इसका जवाब आपको साकेत गोखले ने संसद में दे ही दिया था कि वे भी चुनाव जीत कर आये हैं और उसी जेल में रहे हैं। और उन्हें भी ममता बनर्जी ने वहां पहुंचाया है।   

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