
संजय कुमार सिंह
दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर नकदी मिलने और उसे छिपाने की सारी कोशिशें नाकाम होने के बाद आखिरकार जांच के लिये तीन सदस्यों की समिति बनाई गई है। मुझे लगता है कि यह अपने आप में गंभीर मुद्दा है क्योंकि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने तमाम मामलों की जांच नहीं कराई है और इस मामले में भी दिल्ली के अग्निशमन प्रमुख के बयान से मुद्दे को घुमाने की कोशिश की गई थी। जलती हुई नकदी के वीडियो देखने के बाद जांच के अलावा कोई रास्ता नहीं था और सुप्रीम कोर्ट ने जांच के आदेश दे दिये हैं। इधर जज साब ने कहा है कि पैसा परिवार के रहने की जगह से अलग, ऐसे स्टोर में था जो स्टाफ के लिए था और जहां कोई भी आसानी से आ जा सकता है। यह जगह रहने के स्थान से अलग, चारदीवारी के कोने में है। नोट जब जल गये और सिर्फ तस्वीर ही है तो एक संभावना यह भी हो सकती है कि नोट नकली हों। जज साब के घर का हिस्सा नोट रखने के लिए इस्तेमाल भर किया जाता हो। दूसरी ओर यह भी संभव है कि स्टाफ के हों। जो भी हो, जांच का मामला है और जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जाना चाहिये। इसके लिए वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों के विवरण के साथ फोन के डीटेल भी मांगे गये हैं। इसलिए मुझे लगता है कि आज की सबसे बड़ी खबर यही है और इसे लीड होना चाहिये था। खासकर इसलिए भी कि न्यायपालिका में लोगों का भरोसा बनाये रखने के लिए जांच जरूरी है और इसके लिये जज लोया की मौत की जांच भी जरूरी थी पर महाराष्ट्र में सरकार बदल गई तो उसकी मांग मजबूती से नहीं की जा सकी।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर में बताया गया है कि जिस कमरे में नकदी रखी थी उसमें ताला लगा था और आग बुझाने के लिए ताला तोड़ना पड़ा तथा वीडियो में किसी को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि महात्मागांधी में आग लग गई। इसलिए नोट घर के बाहर, स्टोर में था, जहां कोई भी आ जा सकता है – जैसी दलीलों का बहुत मतलब नहीं है। फिर भी जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जाना चाहिये और इस बार मामला हेडलाइन मैनेजमेंट का नहीं है। हालांकि इस खबर को प्रमुखता नहीं मिली वह भी हेडलाइन मैनेजमेंट ही है। मेरे आठ अखबारों में से दो में ही यह खबर लीड है। एक टाइम्स ऑफ इंडिया है और दूसरा दि एशियन एज। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सेकेंड लीड है, जज की जांच के लिये मुख्य न्यायाधीश ने तीन सदस्यों का पैनल बनाया। जबकि आज ही द हिन्दू में पूर्व मुख्य न्यायाधीश, एनवी रमन्ना का कहा प्रमुखता से छपा है कि नागरिक न्यायपालिका में विश्वास खोते जा रहे हैं। आज की दूसरी बड़ी खबर दक्षिण के राज्यों की यह मांग है कि लोकसभा में सीटों की संख्या अगले 25 वर्षों तक वही रखी जाये। यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स, द हिन्दू, द टेलीग्राफ और नवोदय टाइम्स में लीड है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के जज के घर नकदी की रिपोर्ट सार्वजनिक की। अमर उजाला का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया वीडियो, जस्टिस वर्मा के घर 4-5 बोरियों में भरे मिले से अधजले नोट। परिसीमन रोकने और लोकसभा में सीटों की संख्या 25 साल तक स्थिर करने की मांग दोनों में सेकेंड लीड है।
आज की तीसरी बड़ी खबर फडणविस का योगी की बुलडोजर वाली भाषा बोलना है। द टेलीग्राफ में यह सेकेंड लीड है। इसके अलावा और भी खबरें हैं लेकिन वह सब इस तथ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है कि न्यायमूर्ति यशंवत वर्मा के घर नकदी होने की खबर आग लगने से बाहर आई, वरना ईडी को जो मामले मिलते रहे हैं उनमें दो प्रतिशत में ही सफलता मिली है। नकदी को अब 50 करोड़ कहा जा रहा है और इतनी बड़ी नकदी एक दिन में नहीं रख दी गई होगी। उसे छिपाने की पूरी कोशिश हुई फिर भी खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में छप गई। इससे जो हंगामा मचा और सरकार चेतती उससे पहले ही मामला राज्यसभा में उठाया जा चुका था और इसका कारण यही हो सकता है कि मामला इस लायक था। वरना एक जज साब के खिलाफ शिकायत की पुष्टि कराने में तीन महीने से ज्यादा गुजर चुके हैं। दूसरी ओर, नकद होने की खबर को दबाने, गलत साबित करने की कोशिश भी हुई। दमकल वाले से कहलवाया गया कि कोई पैसा जब्त नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने बयान जारी करके कहा कि तबादला ‘अफवाहों’ से संबंधित नहीं है। यह अलग बात है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने कड़ा रुख अख्तियार किया और आखिरकार तीन जजों की जांच टीम बनाई गई। स्पष्ट है कि इस मामले में एक हफ्ते तक खबर नहीं देने वाला देश का मीडिया अफवाह फैलाने में भी शामिल रहा या ऐसा करने वालों का साथ दिया। अग्नि शमन अधिकारी का काम जब नकदी जब्त नहीं करना है तो नकद नहीं मिलने का उनका बयान चलाने का कोई मतलब नहीं था। लेकिन खूब चला। ऐसा नहीं है कि मीडिया सरकार के समर्थन के लिए ही काम करता है। असल में वह अपने फायदे के लिये हर संभव काम करता है या कुछ भी करता है। आज एक खबर यह भी है कि सीबीआई ने फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के मामले में रिया चक्रवर्ती को क्लीन चिट दे दी है। लेकिन मीडिया ने उस लड़की और उसके परिवार तो जिस कदर परेशान किया वह अभी भूला नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसके लिए मीडिया पर मुकदमा होना चाहिये। पर कौन करे, किसे उम्मीद होगी। इसलिए कुछ नहीं होना है। एडिटर्स गिल्ड से लेकर ब्रॉडकास्ट एसोसिशन तक से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है। मीडिया टूल बना हुआ है और यह दिख रहा है तथा शर्मनाक है।


