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सुख-दुख

जस्टिस काटजू साहब दूसरी दुनिया की रवानगी प्लान कर चुके, डिपार्चर लाउंज में बैठे कर रहे फ्लाइट का इंतज़ार!

काटजू साहब का लिखा पढ़ कर अपना दुःख बताने का दिल हो आया!

यशवंत सिंह-

एक वक़्त ऐसा आता है जब बड़े से बड़ा महारथी पूरे संसार से उदासीन हो नई, दूसरी, अनजानी दुनिया की यात्रा की तैयारी करने लगता है। काटजू साहब की पोस्ट देख ख़ुद के मन का हाल लिखने से रोक न सका।

आज सुबह उठा तो थोड़ा डिप्रेस्ड था। वजह कोई नहीं। बस, दुनिया का ग़म। कल कुल आठ लोगों ने मुझसे मदद माँगी। ज़्यादातर मामले पुलिस से संबंधित थे। यूपी के विभिन्न ज़िलों के। सब जेन्युइन केस थे। किसी को निराश नहीं किया। सबकी हैप्पी एंडिंग हुई। लेकिन दूसरों के दुःख को देखते सुनते लगने लगता है कि संसार दुखों का सागर है। कुछ भी कर लीजिए, दुख से नहीं भाग सकते। दूसरों के जीवन में इतना दुख है तो हम भला सुख कैसे महसूस कर सकता हूँ।

ग़ाज़ीपुर में कल अस्पताल गया भाभी को देखने। बड़े पिता जी की सेकंड नंबर वाली बहू हैं। किडनी समेत कई अंग प्रभावित हैं। डायलिसिस हुई। ज़िला अस्पताल में। निःशुल्क। इनके इकलौते पुत्र और मेरे भतीजे Digvijay Singh दिन रात अस्पताल में ही रहते हैं, माँ की सेवा में। ये सरकारी प्राइमरी और मिडिल स्कूल के हेड मास्टर हैं।

अस्पताल में मरीज़ों की बाढ़ आई हुई है। स्ट्रेचर पर लिटा लिटा कर इलाज हो रहा है। मरीज़ों की तादाद देख कर लगता है जैसे पूरा ज़िला बीमार हो रहा हो। मेडिकल कॉलेज से संबद्ध हो चुके ज़िला अस्पताल का विस्तार भी मरीज़ों की वेटिंग लिस्ट ख़त्म नहीं कर पा रहा है। बच्चे जवान बूढ़े लड़की महिला सब बीमार। फाइल प्लास्टिक थैला दवाई लेकर टहल रहे यहाँ से वहाँ।

आज दो लोगों ने मुझे फ़ोन कर पैसे कमाने के कुछ नये तरीक़े के बारे में समझाया। मैंने उन्हें देर तक सुनने के बाद समझाया कि मित्र मेरे दुख किसी पैसे से नहीं हरे जा सकते। मेरा दुख निजी नहीं, सामाजिक है। कोई बीमार दुखी परेशान दिखता है तो मैं परेशान हो जाता हूँ। इसीलिए मैं अक्सर ख़ुद की एक कृत्रिम खुशहाल दुनिया में रहता हूँ जहां दुःख दर्द के कातर स्वर न पहुँच जाए।

मैंने मित्र को समझाया कि जब मरने के बाद और जन्मने से पहले की दुनिया के बारे में अपन को पता ही नहीं है तो पैसे कमा कर करेंगे क्या। दो टाइम भोजन और सुंदर नींद के लिए पैसों की ज़रूरत नहीं पड़ती। इतना प्रकृति / भगवान ने सबको दे रखा है। गाँव में तो जो गरीब कहे जाते हैं उन्हें अस्सी साल की उम्र में खेतों में काम करते देखा और पचास साल के बाबू साहब को बीपी सुगर से जूझते हाय हाय करते पाया। इसलिए प्रसन्नता और उम्र का अमीरी से कोई सीधा रिश्ता नहीं है।

आज फ़ोन पर मैप देख रहा था, ज़ूम इन और ज़ूम आउट कर कर के। इस देश से उस देश। इस शहर से उस शहर। हर जगह आदमी वाले मकान दिखे। देर तक डूब कर देखता रहा। श्रीलंका से लगाये यूरोप तक। ऐसा फील हुआ, वर्ल्ड टूर निपटा कर लौटा हूँ और सबसे सही वही जगह है जहां आप एकांत में सुकून से रह पाते हों।

Satyendra PS गुरु जी के सानिध्य में कुछ वक्त लखनऊ में संगत जमी और ठहाके लगे। वे दिल्ली चले गये और हम ग़ाज़ीपुर आ गये। हम दोनों का इकट्ठे हरिद्वार ऋषिकेश जाने का प्लान है। हम दोनों का मानना है कि संसार की काया एक माया है और कहीं कुछ रखा नहीं है। एक उम्र है जो काटनी है रो के हंस के!

वैसे भी आजकल जिस तरह नौजवान लोग हार्ट अटैक से मर रहे हैं उसे देख कर लगता है किसी का कभी भी नंबर आ सकता है इसलिए अपनी यात्रा के विस्तार को समेटना शुरू करो। न जाने कब आ जाए धरती के क़ैद से निकलने का परवाना!

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