
नवीन कुमार-
सीताराम येचुरी एक डेलीगेशन के साथ विदेश यात्रा पर थे। उसका नेतृत्व पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु कर रहे थे। येचुरी अलग-अलग नेताओं से अलग-अलग भाषा में बात कर रहे थे।

इसपर ज्योति बसु ने येचुरी से कहा कामरेड तुम तो बहुत ही खतरनाक आदमी जान पड़ते हो। येचुरी ने उनसे पूछा ऐसा क्यों कह रहे हो आप। बसु ने कहा और क्या, हममें से किसी को नहीं पता कि तुम किसे क्या पट्टी पढ़ा रहे हो। तुम सुरजीत से हिंदी में, वसवपुनैया से तेलुगु में, बालनंदन से तमिल में और मुझसे बंगाली भाषा में बात करते हो।
सीताराम येचुरी की मौत सन्न कर देने वाली है। अभी उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।अरबपतियों के विमान में उड़ने वाले सत्ताधीशों के शिष्य और साथी कभी नहीं समझ पाएँगे कि कई राज्यों में सरकार चलाने वाली पार्टी का मुखिया मारुति ऑम्नी से चलने की नैतिकता और आत्मबल कहां से लाता है। अलविदा कॉमरेड। आप बहुत याद आएंगे।
राज शेखर त्रिपाठी-
येचुरी से वो पहली मुलाकात….सीता कौन ! ?
वो साल 2003 था। यही सितंबर का महीना था। याद नहीं, शायद बंगाल में किसी चुनाव में हिंसा हुई थी। बावजूद इसके लेफ्ट ही लाभ में था। दिल्ली में नया नया था, हर बड़े चेहरे को फटी आंखों से देखता था। बहरहाल, हरकिशन सिंह सुरजीत की बाइट लेने गोपालन भवन पहुंचे। वही गोलमार्केट के करीब CPM मुख्यालय। सुरजीत नहीं थे। रिसेप्शन पर बैठे शख्स ने सुझाया सीता से बात कर लो !
मैने सोचा सीता !!! सीता कौन ??
असमंजस में ही था कि दीपक चौरसिया अवतरित हुए। तब स्टार रिपोर्टर थे। उनकी नकल करके एक दंत मंजन की ऐड भी आ चुकी थी।
दीपक रिसेप्शन पर बैठे उसी शख्स से मुखातिब हुए –
‘अरे तिवारी जी…..कोई है ?’
‘कहा तो सीता से बात कर लो !’ तिवारी जी बोले।
तिवारी जी का पूरा रंग-रूप रिसेप्शनिस्ट से भी कमतर था। ये तो बाद में पता चला कि दृष्टिदोष हमारे में ही था! गोपालन भवन वाले तो प्रकाश करात को महासचिव बनने के बाद भी प्रकाश कहते थे।
दीपक ने कहा – तो बुलाओ न यार !
मैं अब भी कनफ्यूज था। मुझे किसी महिला की उम्मीद थी। मगर सीढियों से उतरे सिगरेट के आखिरी कश लगाते सीताराम येचुरी। मैं फिर फटी आंख!
बहरहाल सीता ने बाहर आकर मुस्कराते हुए सिगरेट घास पर कुचली, जहां पार्टी का निशान और गोपालन भवन लिखा है वहां खुद फ्रेम बना कर खड़े हुए।
बोले – ‘हां भाई….’
गनीमत है दीपक थे तो मुझे थोड़ी मोहलत मिल गयी, भूला सवाल याद आ गया। मुस्कराते येचुरी ने जवाब दिया, गले में लटका चश्मा ठीक करते वापस अंदर।
भाई Navin Kumar ने उनके बहुभाषा ज्ञान पर ज्योति बसु और उनका एक रोचक संवाद याद किया है। मजे कि बात ये कि वो नेपाली/ गोरखाली भी अच्छी जानते थे। नेपाल के कम्युनिस्ट तख्तापलट के बाद वो इंडियन डिप्लोमेटिक मिशन के अनिवार्य पार्ट थे। वाजपेयी और ब्रजेश मिश्रा काल में भी! प्रचंड और भट्टाराई उसी जेएनयू के पोलिटिकल प्रोडक्ट थे जहां येचुरी छात्रसंघ अध्यक्ष रहे।
येचुरी भाषा कैसे सीखते थे, ये वाकया उन्हीं का सुनाया हुआ है-
जब दक्षिण से दिल्ली आए तो बसों में लिखा देखा
“कोई अंग खिड़की से बाहर न निकालें”
अब हाथ के सिवा कोई अंग बस की खिड़की से बाहर तो निकल नहीं सकता था। येचुरी ‘समझ’ गए।
छात्रसंघ की अगली बैठक में कोई प्रस्ताव आया। येचुरी प्रस्ताव रखते हुए पूरे काॅन्फीडेंस के साथ बोले।
“जो जो इस प्रस्ताव से सहमत है अपना अपना अंग खड़ा करे”
येचुरी के इस किस्से पर हम सबने ठहाके लगाए और वो बच्चों वाली खिलखिलाहट के साथ बड़ों की तरह सिगरेट जलाकर कश लेने किसी खुले कोने की तलाश में चले गए।
कामरेड अलविदा क्या कहना…बस…सिगरेट खत्म कर यहीं लौटना प्लीज़!


