दिलीप चौबे-
बड़ौदा डायनामाइट कांड में जार्ज फर्नांडिस के बाद दूसरे नंबर के अभियुक्त, धाकड़ पत्रकार के विक्रम राव के निधन से प्रतिरोध की पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ ढह गया। वह अंग्रेजी के पत्रकार थे लेकिन हिंदी और उर्दू में भी उनका समान अधिकार था। उनके पास हिंदी और उर्दू के शब्दों का विशाल भंडार था जिनका इस्तेमाल वह समुचित जगह पर किया करते थे।
उनके पास विशाल आर्काइव भी था। उनके लेख शोध पर आधारित होते थे।वह अपना हर लेख मेरे WhatsApp पर भेजते थे।राव साहब मेरे अनुरोध पर राष्ट्रीय सहारा के लिए लिखने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। श्रमजीवी पत्रकारों के हितों के लिए हमेशा संघर्षशील रहे। वह विचारों से समाजवादी भले रहे हों लेकिन इन दिनों वह कथित और छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों के वैचारिक रूझानों से मायूस थे और उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता वाम से दाएं की ओर करवट लेने लगी थी।
आजकल इस तरह की वैचारिक डगमहाट देश के अनेक लेखकों, विद्वानों और विचारकों में दिखाई दे रही है।भारत के अंग्रेजी और हिंदी की पत्रकारिता में राव साहब के योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। उनके निधन से भारतीय पत्रकारिता की जो क्षति हुई है उसकी भरपाई नहीं हो सकती। बहुत भारी मन से अलविदा राव साहब। आपके साथ जुड़ी स्मृतियों को सादर नमन। ॐ शान्ति!!
नवेन्दु उन्मेष-
के विक्रम राव : पत्रकारों के लिए लड़ने वाला आखिरी मसीहा चला गया

सोमवार की सुबह वरिष्ठ पत्रकार डा. के विक्रम राव के सुपुत्र का मेरे पास मैसेज आया कि पिता जी नहीं रहे। मैसेज पढ़कर मैं स्तब्ध रहा गया। डा. राव जब भी कोई फीचर लिखते थे तो मुझे भेज देते थे। मैं जिस भी अखबार में रहा उनका फीचर अवश्य प्रकाशित किया।
वे जब भी रांची आते मुझसे मिलते। मैं जब भी लखनउ जाता उनसे मिलना नहीं भूलता। वे एक बड़े पत्रकार थे। वे पत्रकारों के हक के लिए लड़ने वाले एक मात्र पत्रकार थे। उनके संघर्ष का परिणाम था कि सरकार को पत्रकारों के लिए वेतन आयोग की स्थापना करनी पड़ी। अखबारों के मालिकों को पत्रकारों को न्यूनतम वेतनमान देना पड़ा। रेलवे में पत्रकारों के लिए छूट की व्यवस्था की गयी। डा. राव डंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उन्होंने कुछ दिनों पूर्व मुझे बताया था कि एसोसिएशन के देशभर में लगभग चालीस हजार सदस्य हैं।
डा. राव ने आपातकाल के दौरान पत्रकारों और समाचार पर अंकुश लगाये जाने का जमकर विरोध किया था। तब इंदिरा गांधी ने उन्हें गिरफतार कर जेल में डाल दिया था। वे लगभग 16 माह जेल में रहे। जीवनपर्यन्त वे पत्रकारों के हक के लिए लड़ते रहे। प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य के रूप में भी उन्होंने पत्रकारिता की गरिमा को बचाये रखने का काम किया।
डंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन का 1996 में एक बार रांची के मेकन हाल में अधिवेशन का आयोजन किया गया था जिसका उद्घाटन तत्कालीन रेल मंत्री रामबिलास पासवान ने किया था। उस दौरान ही उनके साथ मेंरे आत्मीय संबेध हो गये थे। हम दोनों घूम-घूमकर अधिवेशन की व्यवस्था में लगे रहे। एक दिन मैंने उनसे पूछा आप तो यूनियन चलाते हैं लेकिन आपका घर कैसे चलता है। उन्होंने उत्तर दिया मेरी पत्नी रेलवे में डाक्टर है। इस कारण मुझे घर चलाने की चिंता नहीं रहती। मैंने संकल्प लिया है कि मैं आखिरी दम तक पत्रकारों के लिए लड़ता रहूगा। दो दिन पूर्व शनिवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिले थे। मुझे जो तस्वीर भेजी उसे देखकर मुझे लगा वे काफी वृद्ध हो चुके हैं। लेकिन मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने उनके स्वास्थ्य के बारे में अवश्य पूछा। इसका भी मैसेज डा. राव ने मुझे भेजा।
तेलुगु भाषी होने के बावजूद डा. राव की हिन्दी में अच्छी पकड़ थी। वे अंग्रेजी के पत्रकार थे और टाइम्स ऑफ इंडिया से अवकाश ग्रहण करने के बाद हिन्दी में लिखा करते थे। उन्होंने वायस ऑफ अमेरिका के वाशिंगटन डीसी स्थित कार्यालय में भी कार्य किया था। उन्होंने पत्रकारिता पर कई पुस्तकों की रचना की। उन्होंने कई देशों में घूमकर वहां के पत्रकारों की स्थिति की जानकारी हासिल की। इसके बाद भारत सरकार को कई सुझाव दिये कि यहां के पत्रकारों के लिए क्या किया जाना चाहिए। अवकाश ग्रहण करने के बाद वे एक स्तंभकार के रूप् में काफी चर्चित रहे। विभिन्न राजनीतिक विशयों पर प्रतिदिन लेख लिखा करते थे और आपने मित्र पत्रकारों को छपने के लिए भेज दिया करते थे। नहीं छपने पर फोन कर कारण भी जानना चाहते थे।
डॉ के विक्रम राव के पिता रामा राव भी एक पत्रकार थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा स्थापित नेशनल हेराल्ड के लखनउ संस्करण के वे संपादक थे।
डंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन की स्थापना 28 अक्टूबर 1950 को नई दिल्ली में की गयी थी। कई सालों तक के चलपति राव इसके अध्यक्ष रहे। चलपति राव ने देशभर के पत्रकारों को एक मंच पर लाने का काम किया। उनके निधन के बाद डॉ. के विक्रम राव को उसका अध्यक्ष चुना गया।
वे मुझसे अकसर कहा करते थे कि झारखंड में हमारी यूनियन की स्थिति अच्छी नहीं है। तुम इसे संगठित करने का पुनः प्रयास करो लेकिन चूंकि मेरी दिलचस्पी यूनियनबाजी में कभी नहीं रही इस कारण मैंने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया।
आज डा. राव जब दुनिया छोडकर चले गये तो ऐसा लगता है कि पत्रकारों ने अपने लिए संघर्ष करने वाला एक सच्चा मसीहा खो दिया।
कार्यकारी संपादक, दैनिक रांची एक्सप्रेस, रांची
संपर्क- 9334966328ए 9470106515
ये भी पढ़ें…


