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कल्पेश याग्निक दिल की जांच रेगुलर कराते थे, कहीं कोई प्राब्लम न थी

Aditya Pandey : एक ही शब्द में पूरा व्यक्तित्व रखना हो तो मैं कल्पेश याग्निक को ‘उत्साह’ कहता। धोतीकुर्ते में नए घर के उद्घाटन के मौके पर जिस तरह उन्होंने अर्श से फर्श तक की खूबियां गिनाईं तब में उन्हें सुन कम रहा था लेकिन इस पर मेरी नजर टिकी हुई थी कि इस बंदे में उत्साह कितना ज्यादा है। 1998 में मैंने पहली बार भास्कर ज्वाइन किया था और तीन बार यहां काम किया लेकिन सीधे उनके साथ काम महज एक महीना ही किया वह भी एक स्पेशल प्रोजेक्ट में।

कल्पेश की कार्यशैली का मैं कतई हामी नहीं रहा, आतंक पैदा करने के उनके अंदाज से भी मेरा इत्तेफाक कभी नहीं रहा और बिना सही तथ्य पता लगाए निर्णय पर पहुंच जाने की उनकी आदत तो खैर कईयों के लिए मुसीबत ही थी लेकिन इन सबके बावजूद यह मानने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि पत्रकारिता को लेकर उनका जुनून और उत्साह कमाल का था।

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उनका असंभव के विरुद्ध पूरा पढ़ना मेरे लिए असंभव था क्योंकि तारतम्यता के अभाव वाला और लंबा लेखन पढ़ना मेरे बूते की बात कभी नहीं रही लेकिन देशभक्ति से जुड़े मुद्दों पर उनकी राय जानना अलग अनुभव होता था। ‘कथित सेकुलर’ कहलाने से बचने की उनकी कोशिश भी साफ नजर आती थी जो पत्रकारिता जगत में बह रही धारा से उलट ज्यादा लगती रही।

इसी शहर में छात्रनेता से पत्रकार बनना और फिर एक बड़े अखबार का समूह संपादक बनना किसी भी शख्स का सपना हो सकता है जिसे कल्पेशजी ने अपनी मेहनत और बाकी ‘खूबियों’ से पूरा किया लेकिन आखिरी समय में शायद उन्हें भी यह मलाल तो रहा ही होगा कि कभी वे इस सफलता को भरपूर जी नहीं सके। इसे उठाना, उसे बढ़ाना, इसे गिराना, उसे भगाना जैसे चक्करों के अलावा भी कई दबाव जरूर उन पर रहे ही होंगे जो उन्हें लील गए वरना दिल की जांच तो वे नियमित कराते थे।

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पिछले चेकअप के बाद ही बता रहे थे कि डॉक्टर ने कहा है आपका दिल तो ठीक वैसा ही जैसा एक पांच साल के बच्चे का होता है यानी बिलकुल स्वस्थ। अब लगता है कि डॉक्टर का कहा गलत तरीके से समझ लिया गया, डॉक्टर ने यह जरुर कहा होगा कि आपका दिल पांच साल के बच्चे की तरह है लेकिन इसका दूसरा मतलब यह रहा होगा कि आप इस बेचारे पर इतने तनाव मत डालिए जितने आपने डाल रखे हैं।

कल्पेशजी के जाने से एक सबक यह भी मिला कि सफर का मजा लेते रहिए किसी मंजिल पर पहुंचकर मजे का इंतजाम करना बेमानी है। जावेद अख्तर ने लिखा है ‘जिस दिन पिता नहीं रहे उस दिन मेरा बड़ा दुख यह भी था कि मैं अब किससे लडूंगा’ उनके कई विरोधियों के लिए भी यह दिन वैसा ही है। जो भी, जितना भी, जैसे भी हुआ अब वह सब खाक है इसलिए….श्रद्धांजलि।

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पत्रकार आदित्य पांडेय की एफबी वॉल से.

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