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दिल्ली

यह देश की राजधानी का हाल है… 25 साल का कमल बाइक समेत 14 फुट के खुले गड्ढे में गिरा, रात भर चिल्लाता रहा, सुबह लाश मिली!

मौत का गड्ढा : पहले नोएडा, अब दिल्ली!

मनोज अभिज्ञान-

दिल्ली के जनकपुरी इलाके में जल बोर्ड द्वारा खोदे गए लगभग 14 फुट गहरे गड्ढे में गिरकर 25 वर्षीय कमल की मौत हो गई। रात के समय ऑफिस से घर लौटते वक्त उनकी बाइक खुले और बिना घेराबंदी वाले गड्ढे में समा गई। न तो सड़क पूरी तरह बंद थी, न चेतावनी बोर्ड थे, न पर्याप्त रोशनी का इंतज़ाम। हादसे के बाद परिवार को समय पर सूचना नहीं मिली, तलाश में देरी हुई और प्रशासन व पुलिस के बयान भी बदलते रहे। इससे पहले नोएडा में इसी तरह के गड्ढे में एक युवक की मौत हो चुकी थी। इस घटना ने शहरी विकास एजेंसियों की लापरवाही, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और जवाबदेही की कमी को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

गड्ढे ज़मीन में नहीं, व्यवस्था में हैं।

यह उस शहर की तस्वीर है जहां विकास का काम इंसान की ज़िंदगी से सस्ता समझा जाता है। सड़कें खोदी जाती हैं, पाइप डाले जाते हैं, केबल बदली जाती हैं, लेकिन यह मान लिया जाता है कि आम आदमी खुद रास्ता निकाल लेगा। शहरों में काम ऐसे होते हैं जैसे इंसान कोई बाधा हो। ठेकेदार, विभाग, सब-कॉन्ट्रैक्टर, सबके बीच ज़िम्मेदारी इतनी बँटी होती है कि मरने के बाद भी कोई दोषी नहीं मिलता।

ऐसे हादसे अक्सर रात में, मजदूरों, डिलीवरी बॉयज़, निजी कर्मचारियों या छोटे इंजीनियरों के साथ होते हैं। वे लोग जो दिनभर काम करके थके होते हैं, जिनके पास महंगी गाड़ी नहीं, ड्राइवर नहीं, और जिनकी आवाज़ सत्ता तक नहीं पहुंचती। सड़क उनके लिए जोखिम बन जाती है। बजट में पुल, फ्लाईओवर और विज्ञापन के लिए पैसा होता है, लेकिन बैरिकेड, रिफ्लेक्टर, चेतावनी लाइट और निगरानी के लिए नहीं। क्योंकि ये चीज़ें चमकदार नहीं होतीं, इनसे तस्वीरें नहीं बनतीं, और इनसे किसी बड़े व्यक्ति का नाम नहीं जुड़ता।

क्या यह मौत रोकी जा सकती थी? जवाब साफ है—हाँ। फिर भी हर बार यही गलती दोहराई जाती है, क्योंकि मौत का बोझ उस वर्ग पर पड़ता है जिसे व्यवस्था पहले से ही खर्च योग्य मान चुकी होती है।

सड़क पर चलना, काम पर जाना, घर लौटना—ये सब अब जोखिम बन चुके हैं। जब तक विकास का मतलब केवल तेज़ निर्माण और कम लागत रहेगा, तब तक ऐसे गड्ढे बनते रहेंगे—सड़कों पर भी, और समाज की नैतिक ज़मीन में भी।


शीतल पी सिंह-

यह देश की राजधानी का हाल है… जहां प्रधानमंत्री संसद में भी असुरक्षित होने का नाटक खेलते हैं (जिनकी सुरक्षा पर हमारा गरीब देश दुनिया के अमीर से अमीर देश के बराबर खर्च करता है) लेकिन देश के 90% साधारण लोगों की यह दशा है!

हमारा “विकसित भारत” का सपना इसी तरह का है? क्या यही सपना था हमारा—कि हर शाम घर लौटते वक्त कोई मां-बाप इंतजार करते रहें, और उनका बेटा कभी न लौटे?

कल रात, जनकपुरी के जोगिंदर सिंह मार्ग पर कमल ध्यानी (25 साल, पौड़ी उत्तराखंड का बेटा) अपनी बाइक से घर की ओर था।

BA पूरा किया था। HDFC बैंक के कॉल सेंटर में नौकरी। परिवार की आंखों का तारा, भविष्य की पूरी उम्मीद। तीन साल पहले अपने जन्मदिन पर खरीदी अपनी प्यारी Apache RTR 200 बाइक पर सवार था—जो उसके लिए सिर्फ बाइक नहीं, सपनों की सवारी थी।

रात 11:30 बजे फोन किया था मां-बाप को… ”बस 10-15 मिनट में घर पहुंच रहा हूं… ठंड बहुत है, जल्दी आ रहा हूं।” उसकी आवाज में थकान थी, लेकिन खुशी भी—घर पहुंचने की। पर वो 10 मिनट कभी खत्म नहीं हुए।

दिल्ली जल बोर्ड ने सीवर/पाइपलाइन के नाम पर 15-20 फुट गहरा गड्ढा खोद रखा था—पूरी तरह खुला, अंधेरा, कोई बैरिकेड नहीं, कोई चेतावनी बोर्ड नहीं, कोई लाइट नहीं, कोई रिफ्लेक्टर नहीं। सिर्फ लापरवाही का काला साया!

कमल सीधे उस मौत के कुएं में गिर गया। बाइक उसके साथ। पूरी रात वो वहां फंसा रहा—ठंड में, अंधेरे में, मदद की पुकार लगाता रहा… लेकिन कोई नहीं आया। सुबह उसकी लाश और बाइक बरामद हुई।

उसकी मां की चीखें आज भी गूंज रही हैं। भाई-बहन रो-रोकर थक गए। पिता का चेहरा सूना… क्योंकि उनका बेटा अब कभी नहीं लौटेगा।

ये कोई हादसा नहीं है—ये सरकारी हत्या है! क्रिमिनल नेग्लिजेंस है! भ्रष्टाचार है! पूरी व्यवस्था का पतन है! और ये अकेली कहानी नहीं। कुछ हफ्ते पहले ही नोएडा सेक्टर 150 में 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार पानी भरे गड्ढे में गिर गई। वो घंटों मदद मांगता रहा—“बचाओ… पानी में डूब रहा हूं…” लेकिन कोई नहीं आया। वो डूबकर मर गया। वो गड्ढा सालों से खुला था—सैटेलाइट इमेज भी यही गवाही देती हैं। कोई सबक नहीं सीखा गया।

देशभर में मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा:

  • MoRTH के आंकड़े चीख रहे हैं: 2023 में 2,161 मौतें सिर्फ पॉटहोल्स से—16.4% बढ़ोतरी! 5,840 एक्सीडेंट, 5,300+ घायल।
  • 2019-2023 तक लगभग 10,000 मौतें। 2017 में तो 3,597 मौतें।
  • उत्तर प्रदेश में अकेले आधे से ज्यादा मामले—रोज़ 3-4 मौतें सिर्फ UP में!
  • 2025 में भी सिलसिला जारी: बेंगलुरु में 26 साल की प्रियंका पॉटहोल से बचते हुए ट्रक के नीचे कुचल गई—भाई के सामने!
  • मुंबई में Ghodbunder Road पर 2025 में 18 मौतें सिर्फ पॉटहोल्स से।
  • भिवंडी में 19 साल का लड़का, 17 साल का बच्चा—सब मौत के मुंह में।
  • दिल्ली में ही 2023 में अजित शर्मा (51) का ऑटो 12 फुट गहरे गड्ढे में गिरा और मौत।

ये युवा हैं—सपने देखने वाले, कमाने वाले, परिवार संभालने वाले। मां-बाप की लाड़ली, बहनों के भैया, बच्चों के पापा। और हर बार यही कहानी: ठेकेदार काम छोड़ देता है, अफसर रिश्वत लेकर आंख मूंद लेता है, पुलिस/प्रशासन “जांच” का नाटक करता है, और परिवार अकेला रोता रह जाता है।

सरकार से सवाल—दिल से पूछो:

  • कब तक “FIR दर्ज, जांच के आदेश” का ढोंग चलेगा?
  • कब तक कोई इस्तीफा नहीं देगा, कोई जेल नहीं जाएगा?
  • क्यों हर बार “सस्पेंशन” और “मुआवजा” का वादा करके फाइल बंद कर देते हो?
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