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कमलनाथ सरकार ने मीडिया को विज्ञापन देना किया बन्द!

सुना है कि मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने मीडिया को विज्ञापन न देने का फैसला किया है। अपन को लगता है कि यह फैसला गलत नहीं है। मैं पिछले 13 साल से भोपाल में हूं। बाबूलाल गौर के बाद मैंने कभी महसूस नहीं किया कि मीडिया ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका यहां निभाई। विज्ञापनों के बदले में चरण वंदना करने से मीडिया का इकबाल खत्म हो गया है, तो कमलनाथ उसको भाव क्यों दें?

अगर मीडिया ने मीडिया की भूमिका निभाई होती, तो क्या व्यापमं में जो हुआ, वह हो पाता। रिश्वत देकर नौकरी पाने वाले बच्चे जेलों में ठूंस दिए गए और सरकार अपने एक मंत्री, दो-तीन अफसरों, एक-दो दलालों की कुर्बानी देकर पाक-साफ बनी रही, तो बनी रही। कोई एक रिपोर्ट हमें बता दे जिसमें उसकी भूमिका पर सवाल उठाया गया हो? क्या प्रदेश में खनन माफिया और सड़क माफिया पैदा नहीं हुआ, किसने उनके खिलाफ कवरेज किया?

आईपीएस को मार दिया गया, तहसीलदार को रोंदने की कोशिश हुई, रेप के मामले में प्रदेश अव्वल, किसानों की आत्महत्याएं रोजाना की कहानी, लेकिन इस मसलों पर क्या उस तरह से काम हुआ, जैसे होना चाहिए? और भी बहुत कुछ हुआ। जब यह सब हो रहा था, तब हम कहां थे?

तब कोई सरकार हम से क्यों डरे? सरकारें आईनों से डरती हैं, चापलूसों से नहीं…। अब अगर हम आईना बनने की कोशिश भी करें, तो सुधि पाठक इस निष्कर्ष पर पहुंचने में देर नहीं करेगा कि नौटंकी विज्ञापन न मिलने के कारण हो रही है। सो, चुप रहकर अपनी विश्वसनीयता बहाल करने में ही भलाई है।

भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र चतुर्वेदी की एफबी वॉल से।

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