रजनीश कहिन : कर्म-फल नहीं बल्कि वृत्ति / संस्कार एक जन्म से दूसरे जन्म तक की यात्रा करते हैं!

सुशोभित-

कर्मफल और वृत्ति…

वर्ष 1969 में एक शिविर के दौरान रजनीश ने कर्मफल, वृत्ति और संस्कारों पर कुछ बातें कही थीं और मैं समझता हूँ वे आधुनिक मनुष्य के लिए- विशेषकर सोशल मीडिया के युग में- बहुत उपयोगी हैं। तो उन पर संक्षिप्त में एक नज़र डालते हैं।

सामान्यतया कर्मफल के बारे में माना जाता है कि उसमें कार्य-कारण विशृंखल हैं। आप आज कर्म करेंगे, फल भविष्य में कभी मिलेगा। आप आज दु:खी हैं तो विगत जन्मों के कर्म होंगे और सुखी हैं तो यह भी विगत का फल। बिना क्लेश के दु:ख भोग लेंगे तो प्रारब्ध गल जाएगा, इससे संघर्ष करेंगे तो अगले जन्मों के दु:खों की व्यवस्था करेंगे आदि इत्यादि। रजनीश ने इसमें यह प्रवर्तन किया था कि यह दृष्टि अतार्किक है। कार्य और कारण संयुक्त हैं। कर्म का फल तुरंत ही भोगा जाता है, उसका कोई हिसाब बाद के लिए नहीं रखा जाता। क्योंकि अगर कर्मों की किश्तें इसी तरह हमारे सिर चढ़ी रहीं तो कोई कभी मुक्त ही न हो सकेगा। नित नए कर्मबंध बँधते ही रहेंगे। जाने कितने लेखापालों को इतने अनंत मनुष्यों के अनगिन कर्मों का लेखाजोखा रखने के लिए नियुक्त करना होगा। उसी से फिर नियंता के रूप वाले ईश्वर की कल्पना भी जन्मेगी।

रजनीश ने स्पष्ट किया है कि जो वस्तु कर्म के बाद हमारे साथ रह जाती है, वह फल नहीं है, वह वृत्ति है। हम जब कुछ करते हैं तो जिस वृत्ति के वशीभूत होकर उसे किया था, उसका अभ्यास करते हैं। अभ्यास से वृत्ति प्रबल होती है, संस्कार बन जाती है। जैसे कोई गाढ़ा रियाज़ करके किसी कला में महारत हासिल कर ले, उसी तरह से यह होता है। ये संस्कार हमारे साथ दूर तक यात्रा करते हैं। एक जन्म से दूसरे जन्म तक भी वो जा सकते हैं। तो मूल चिंता कर्म की नहीं है, वृत्तियों और संस्कारों की है, और इनका शमन करना हमारे हाथ में है। कर्मवाद में तो कुछ भी हमारे हाथ में नहीं, विगत जन्मों के पाप के फल अगर मिल रहे हैं तो उन्हें भोगना ही होगा, यह वाली भाग्यवादी दृष्टि है।

रजनीश ने वृत्ति की व्याख्या लीस्ट-रेज़िस्टेंस के तर्क से की है। जैसे पानी सूखी लकीर पर फिर से बह जाता है, नया रास्ता नहीं तलाशता, उसी तरह चित्त अपनी वृत्ति पर बहता चला जाता है। बार-बार वही चीज़ दोहराए चला जाता है। चित्त के मानचित्र पर असंख्य सूखी लकीरें खिंची हैं। इससे मनुष्य स्वयं को अपनी ही वृत्तियों में बाँध लेता है। जबकि सजग होकर अवलोकन करे तो देख लेगा कि उसने स्वयं ही जिसे आदत बना लिया है और जिससे वह दु:ख भोग रहा है, उसे चाहे तो बदल सकता है।

इसे रजनीश ने एक छोटे-से उदाहरण से समझाया है। मान लीजिये एक व्यक्ति ने दिनभर क्रोध किया है, अपशब्द कहे हैं। फिर वह एक कमरे में आकर सो जाता है। उसी कमरे में एक और व्यक्ति आकर सोता है, जिसने पूरा दिन ध्यानपूर्ण, प्रेमपूर्ण और शांतिपूर्ण बिताया है। दोनों अपनी चप्पलें खाट के नीचे सरकाकर सो जाते हैं। सुबह सफाई करने वाला चप्पलों को बाहर रख देता है। अब जिस व्यक्ति ने कल दिनभर क्रोध किया था, वह सुबह जागेगा और चप्पलें नहीं पाएगा तो बहुत सम्भव है वह गुस्से से भर बैठे और पूछे कि मेरी चप्पलें कहाँ हैं, किसने उन्हें हाथ लगाया? वहीं दूसरा व्यक्ति जागकर देखे कि चप्पलें नहीं हैं तो सोचे कि यहीं कहीं होंगी, कोई ले गया होगा, उसमें कोई ख़ास बात नहीं है।

इसका यह अर्थ नहीं कि उनमें से एक व्यक्ति बुरा है और दूसरा भला है। इसका यह अर्थ है कि एक ने क्रोध का अभ्यास किया था, दूसरे ने शांति का अभ्यास किया था। जो जिस वस्तु का अभ्यास करेगा, वह उसकी वृत्ति और संस्कार बन जावेगी। वैसे में अगर वह क्रोधी व्यक्ति चिंतनशील है तो वह देखेगा कि मुझे तो चप्पलें नहीं देखकर क्रोध आया, किन्तु इस दूसरे व्यक्ति को नहीं आया। वैसा क्यों हुआ? अगर वह सजग होकर अवलोकन करेगा तो पाएगा कि उसके भीतर क्रोध की वृत्ति है, जिसे उसने नियमित अभ्यास से साधा है। इतना ही नहीं, उसने इसमें गर्व भी किया है कि मैं तो बड़ा क्रोधी हूँ, ग़ुस्सा मेरी नाक पर रहता है। अगर वह मननशील हुआ तो अगली बार से अपने क्रोध की वृत्ति का अवलोकन करेगा और अवलोकन से वृत्तियाँ दुर्बल होती चली जाती हैं।

रजनीश इस अवलोकन को ही ध्यान कहते हैं, साक्षी-बोध कहते हैं, स्थिर प्रज्ञा कहते हैं। इससे वृत्तियाँ तिरोहित नहीं हो जाएँगी, क्योंकि वह जन्मों-जन्मांतरों का आपका परिग्रह है, चित्त लीस्ट-रेज़िस्टेंस के पथ पर चल-चलकर रूढ़ हो गया है। लेकिन एक बार आपको यह पता चल जाए कि आप अपनी वृत्तियों के दास हैं तो इससे जाग्रति की यात्रा आरम्भ हो जाती है। वह यात्रा आपको कहाँ ले जाएगी, कब मुक्ति मिलेगी, वह दूसरी बातें हैं। पर एक बार यात्रा तो शुरू हो, अचेतावस्था तो टूटे।

रजनीश की यह बात आज के मनुष्य के लिए मैंने इसलिए समीचीन पाई है, क्योंकि वृत्तियाँ तो समाज में सदैव से थीं, किन्तु सोशल मीडिया उन वृत्तियों का जैसे दोहन करता है, उनसे अपना व्यापार चलाता है, वह मनुष्यता के इतिहास की दुर्लभ घटना है। सोशल मीडिया का काम है मनुष्य की निकृष्ट से निकृष्ट वृत्ति को उभारना, फिर चाहे यौनवृत्ति हो, कुंठाएँ हों, हीन-भावनाएँ हों, अधैर्य हो, आक्रोश हो, घृणा हो या सतही कौतूहल हों। सुबह से शाम तक मीडिया और सोशल मीडिया इन्हीं विषबेलों को पोसता रहता है। आप जब कर्म और फल को संयुक्त देखते हैं और भाग्यवाद से मुक्त हो जाते हैं, और अपनी वृत्तियों और संस्कारों के प्रति सचेत हो जाते हैं, तो चीज़ें बदलने लगती हैं। जहाँ अवलोकन आया, वहाँ जाग्रति आई और जहाँ जाग्रति आई, वहाँ विवेक का उदय हुआ।

रजनीश की ये बातें सारभूत हैं। उन पर मनन करना उपयोगी होगा। 1969 के जिस शिविर का मैंने ऊपर हवाला दिया, वह कश्मीर में हुआ था। और चर्चा चल रही थी भगवान महावीर पर, जिन्होंने कर्मों, वृत्तियों और संस्कारों पर बड़ी सूक्ष्म दृष्टि दी है। इस अमृत से स्वयं को वंचित क्यों करें?



भड़ास का ऐसे करें भला- Donate

भड़ास वाट्सएप नंबर- 7678515849



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *