केजरी बनाम मीडिया बहस में थानवी ने रख दीं दुखती रग पर उंगलियां, खूब निकला गुबार

 

अपने एफबी वॉल पर आज सुबह जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ताजा मीडिया एक्शन पर गंभीर प्रतिप्रश्न का आगाज कर दिया। उनकी पोस्ट में उठाए गए सवाल पर सहमतियां कम, असहमतियां ज्यादा हैं। और इसी बहाने कारपोरेट मीडिया के चाल-चलन की जमकर लानत-मलामत भी हो रही है। 

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि मैं मीडिया की परवाह नहीं करता। मीडिया में जो चाहे आता रहे लेकिन हमारी सरकार अच्छा काम कर रही है। मीडिया हमें नकारात्मक रूप से पेश करता रहता है लेकिन उसकी चिंता मत कीजिए क्योंकि दिल्ली की जनता खुश है। मीडिया को देखने के बाद भी लोगों ने हमें 67 सीटें दीं। जहां तक मीडिया संस्थान शुरू करने की बात है तो हम वह नहीं करना चाहते। मीडिया में भी अच्छे लोग हैं जो खुश नहीं हैं। यदि कुछ वरिष्ठ लोग साथ आकर खबरिया चैनल या अखबार शुरू करना चाहते हैं, तो सरकार निश्चित ही उनकी मदद करेगी। हम भी ईमानदार मीडिया चाहते हैं जो बस खबर दिखाए। केजरीवाल अपनी सरकार के उस विवादास्पद परिपत्र को लेकर विपक्षी दलों के निशाने पर आ गए हैं, जिसमें किसी भी मानहानिकारक समाचार के लिए मीडिया के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। इससे पहले केजरीवाल ने मीडिया ट्रायल का भी बयान दिया था।

संपादक ओम थानवी लिखते हैं – ‘अरविन्द केजरीवाल को अपनी पार्टी में अनेक अनुभवी पत्रकारों का साथ हासिल है – मनीष सिसोदिया, नगेन्द्र शर्मा, आशीष खेतान, आशुतोष आदि। क्या उन्होंने मीडिया के ‘पब्लिक ट्रायल’ और मानहानि निगरानी आदेश से पहले उन पत्रकारों से मशविरा किया होगा? मुझे संदेह है। किया होता तो उनमें कोई तो उन्हें जरूर आगाह कर देता कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का ऐसा रवैया उन्हें ही भारी पड़ा था।

‘पार्टी में जैसा माहौल है, अपने तईं अब शायद ही कोई केजरीवाल के फैसले पर आपत्ति उठा सकता हो। फिर सार्वजानिक मंच पर अपने सुप्रीमो के फैसलों का बचाव जिम्मेदारी भी बन जाता है, चाहे सहमत हों या नहीं। फिर भी इस अजीबोगरीब फैसले पर मैं सचमुच पार्टी के (पूर्व) पत्रकार नेताओं से उनके निजी विचार जानने को उत्सुक रहूँगा, अगर कहीं वे टकरा जाएँ।’

अमित शर्मा थानवी जी की टिप्पणी पर लिखते हैं- ‘सर आप पत्रकार कुनबे के बड़े हैं और सम्माननीय भी। आम मानस में भी आप की पत्रकारिता का बड़ा आदर है। पर क्या आप सहमत नहीं हैं कि आप की जमात के कुछ ही बचे हैं…रवीश जैसे, बाकि सब वो परोस रहे हैं, जो उनके मालिक उन्हें बोलें। चलिए, यहाँ तक भी ठीक है, कम से कम भाषा की मर्यादा तो रखें। कुमार विश्वास के साथ जो किया गया, वो कहाँ की पत्रकारिता है? अंजना कश्यप, जी-परिवार और इण्डिया टीवी ने तो जैसे सुपारी ही ले रक्खी है AAP को समाप्त करने की। कुछ और चारा बचा है क्या, मीडिया का बहिष्कार करने के सिवाय? कुछ सवाल उनसे भी जरूर पूछियेगा।’

संपादक ओम थानवी ने अमित शर्मा की प्रतिटिप्पणी पर लिखते हैं – ‘आपकी शिकायत उचित है, पर कोई चारा नहीं ऐसा मैं नहीं मानता। पत्रकार समाज और नेताओं के बीच कड़ी का काम भी करते हैं। इसलिए शासक उन्हें लुभाने के हथकंडे भी अपनाते हैं, जिन्हें भी सही नहीं ठहराया जा सकता। पर पत्रकारों का बड़ा समुदाय बेहतर है। क्या उनके साथ केजरीवाल का कोई सहज संबंध है? उनसे मिलने, खुलने, सहज पारदर्शी संबंध बनाने में क्या हर्ज है? इससे उनकी बात भी सामने आती रहेगी, बेईमान मीडिया के सामने मीडिया खुद जा खड़ा होगा। हालाँकि मुझे नेताओं से मिलने का कोई चाव नहीं, लेकिन बताना चाहूंगा कि केजरीवाल अगर कुछ पत्रकारों से (जो उनके दोस्त नहीं तो दुश्मन भी नहीं हैं) से अनौपचारिक मिलते रहे हों मुझे इसकी खबर रहती। मुझे ऐसा कोई संयोग तक याद नहीं पड़ता। (इसका मतलब यह कतई नहीं कि मैं उनसे मिलना चाहूंगा!) जबकि शीला दीक्षित अप्रिय पत्रकारों को भी चाय पर बुलाकर अपनी बात कह लेती थीं। रिश्ते विवेक से खुद बनाए जाते हैं; रिश्ते बिगड़े तो आप होते हैं, बिगाड़ के लिए कोशिश नहीं करनी होती!’

योगेश मित्तल का मानना है, ‘जब भी गलत चीजों पर खुद की जवाबदेही की बात हो तो हर बिरादरी चाहे कोई भी हो जुडिशल, डाक्टर, वकील, अफसर, और तो और लोकतंत्र का चौथा खम्बा मीडिया भी कन्नी काटने लगता है और खुद में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने के बजाय उसका बचाव करता है ! अब जब मीडिया के एक भ्रष्ट तबके पर जब केजरी सवाल उठा रहे हैं और पब्लिक ट्रायल की बात कर रहे हैं तो मीडिया को बुरा लग रहा है ! जब यही केजरी भ्रष्ट नेताओं पर सवाल उठा रहे थे, तब मीडिया को बुरा नहीं लग रहा था और उसे दिन रात दिखा रहा था !’ 

संपादक ओम थानवी की टिप्पणी पर वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार का कहना है – ‘आपकी तरह मैं भी उत्सुक हूँ, लेकिन आशंकित भी कि कहीं वही सच न हो, जो मैं सोच रहा हूँ। यानी कहीं उन्होंने ही ये राह न दिखलाई हो। आख़िर अब वे पत्रकार नहीं, पार्टी और नेता के वफ़ादार सिपाही हैं और उनकी भूमिकाएं राजनीतिक दलों में क्या होती हैं, हम सब जानते हैं।’

विमल माहेश्वरी का कहना है कि केजरीवाल के फैसले पर अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि कैसे अरविन्द केजरीवाल किसी मीडिया हाउस को पहली बार लपेटते हैं। अगर मीडिया सही है तो उसे डरने की जरूरत नहीं। 

उपेंद्र चौधरी की प्रतिटिप्पणी है कि ‘ अगर केजरीवाल में, अपने ही बयानों के अतीत के आईने में झांकने की लोकतांत्रिक कुव्वत बची है तो उन्हें अपनी शख्सियत कीसी होशोहवास खो देने वाले जैसे व्यक्ति की लगेगी। जहां तक उनकी पार्टी में पूर्व पत्रकार बने नेताओं की बात है, तो महत्वाकांक्षा बेबाक रहने देती कहां हैं। वो तो सबसे पहले मौलिकता का ही संहार करती है। वह फायदे का हंसना सिखाती है, पटकथा के मुताबिक रोना समझाती है।’

नंद भारद्वाज लिखते हैं – बशर्ते कि उन पूर्व पत्रकारों में पूर्व के कुछ अवशेष बच गये हों और वे व्‍यक्ति विशेष के प्रभाव से प्रभावित होने की चिन्‍ता न करते हों।

प्रवीण मल्होत्रा का कहना है कि जिन व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है, वे कभी पत्रकार रहे होंगे; अब तो ये अपना आदमी पार्टी (आप) का “कॉकस” है। इन्हे स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया से कोई लेना-देना नहीं है। जो मीडिया इनके पक्ष में लिखे-कहे, वही अच्छा और जागरूक मीडिया है, बाकी सब बीजेपी, कांग्रेस तथा योगेन्द्र-प्रशांत के पिट्ठू है!

ज्योति सिंह लिखती हैं – आप उनसे मिलें तो पूछ कर हमें अवश्य बता दें कि उन्होंने ऐसा संकुचित मानसिकता वाला फैसला क्यूं किया? वैसे हम ये बता दें कि हम उन लोगों में से हैं जिसने न्यूज़ चैनल देखना बिल्कुल बंद कर दिया था, मीडिया के विचित्र व्यवहार के कारण किन्तु फिर भी आप, रवीश कुमार और ऐसे कई छोटे छोटे पत्रकार का मुक्त व्यवहार इधर उधर से पढ़ते रहते हैं| केजरीवाल ने सबको एक ही थाली का चट्टा बट्टा क्यूं सिद्ध कर दिया? कोई उन्हें बता दे कि जो जनता इतने पक्षपाती मीडिया में से निष्पक्ष को छांट सकती है, वह अच्छे केजरीवाल और संकुचित केजरीवाल में भी भेद कर सकती है।

सुनील कुमार सिंह की प्रतिटिप्पणी है कि मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि जब मीडिया सच्ची और प्रमाणिक खबर दिखाता है तो उसे इस सर्कुलर से डर कैसा ? जो मीडिया संसथान या मीडिया कर्मी अगर पत्रकारिता के आड़ में धंधा करता हो और उसने आप को ख़त्म करने की सुपारी ले रखी हो, उस मीडिया के खिलाफ क्या करना चाहिए ? क्या संविधान के मुताबित कोई कानूनी करवाई करना अनुचित है ? क्या मीडिया अपने आप को कानून से ऊपर समझता है ? अभी कुछ दिन जब अरविन्द ने मीडिया की पब्लिक ट्रायल की बात कही थी तो सभी लोग सलाह दे रहे थे कि अरविन्द को ऐसा नहीं बोलना चाहिए । अगर किसी खबर से कोई शिकायत हो तो उन्हें कानूनी करवाई करनी चाहिए । अब जब अरविन्द संविधान सम्मत भ्रष्ट मीडिया पर कानूनी करवाई की बात कह रहे हैं तो इस पर भी मीडिया को आपत्ति है । सारे लोग एक जुट हो गए जो खुलेआम एक संपादक के 100 करोड़ के डील पर चुप थे ।

राजा जैन का मानना है कि अगर इस तरह की ट्रॉयल होती भी हो तो इसमें बुराई क्या है? सब जानते हैं कि आज कल मिडिया कितना बाजारू हो गया है। पीएम तक यही अलंकरण दे रहे हैं जब कि इसके सबसे बड़े खरीददार वो खुद ही हैं। फिर भी मिडिया बाजारु हो गया है जो ज्यााद कीमत तय करेगा, उसका राग अलापेंगे ये। रही बात इंदिरा जी और राजीव जी की तो वो ज़माने लद गए, तब वास्तव में पत्रकारिता थी और पत्रकारों का ईमान धर्म भी था। आज कल कौड़ियों में बिकते हैं ये लोग। इन्होंने अपना पेशा ही ब्लैकमेलिंग को बना रखा है। एक छोटे से छोटे अखबार या लोकल चैनल का रिपोर्टर luxery गाड़ी menten करता है। रोज रात में होटल में दारू पीता है। क्या ये सब उसकी तनख्वाह से संभव है। सेलेरी से ज्यादा तो उसके बच्चों के स्कूल की फीस है। कहां से लाता है वो ये सब? अब समय आ गया है, ब्लैकमेल करने वाले बिकाऊ और बाजारू पत्रकारिता करने वाले मिडिया हाउसेस पर नकेल कसने का। बहुत हो चुका लोगों को गुमराह करने का काम।

मोहम्मद इमरान खान लिखते हैं – एक बात तो मानी पड़ेगी कि केजरीवाल ने मीडिया और कुछ पत्रकारों को पलीता तो लगा दिया है। केजरीवाल ने पब्लिक ट्रायल के सुझाव पर सिर्फ़ इतना कहा है कि हां ये एक अच्छा सुझाव हो सकता है। उसको मीडिया नें और कुछ पत्रकारो ने ऐसे समझा या यूँ कहें कि फैलाया कि पब्लिक के सामने पत्रकार का फ़ैसला होगा और अगर पब्लिक दोषी बोलेगी तो उसकी गर्दन काट दी जाएगी और बोरी में भर के फेंक दिया जाएगा। 

ओम थानवी के एफबी वॉल से (संयोजन-संपादन जयप्रकाश त्रिपाठी)

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