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आज के अखबार : न्याय व्यवस्था का हाल सबरीमाला का मकसद केजरीवाल की अपील और ‘इश्तेहार’ का सच

दि इंडियन एक्सप्रेस की फोटो – अंग्रेजी में मैनिफेस्टो, हिन्दी में घोषणा पत्र और बांग्ला में इश्तेहार। 

संजय कुमार सिंह

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर बता रही है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सबरीमाला मंदिर मामले में नौ जजों की पीठ बनाई है जिसमें सभी धर्म के और एक महिला जज भी हैं। खबर कहती है कि यह, ‘न्याय होना ही नहीं चाहिए, होते हुए दिखना भी चाहिए’ के मूल सिद्धांत से प्रेरित है। मेरा मानना है कि धर्म का मामला धर्म के लोगों पर छोड़ देना चाहिए। लेकिन प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को औपचारिक नोटिस जारी करके उनके शंकराचार्य होने के दावे पर स्पष्टीकरण मांग चुका है। यह तब हुआ जब सरकार द्वारा प्रकाशित स्मारिका में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य कहा गया था। हालत ऐसी हो गई थी कि स्वामी अवमुक्तेश्वरानंद को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपना पक्ष रखना पड़ा था। यह स्थिति तब हुई जब सरकार राहुल गांधी की ब्रिटिश नागरिकता का मामला नहीं निपटा रही है, मामला अदालत में है। दूसरी ओर, कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कल प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाया कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की पत्नी, रिनिकी भुइयां सरमा के पास तीन पासपोर्ट हैं। तीनों पासपोर्ट अभी वैध हैं, एक्सपायर या खारिज नहीं हुए हैं। यह पर्याप्त गंभीर आरोप है लेकिन आज दि एशियन एज में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम और देशबन्धु के अलावा यह खबर किसी भी अन्य अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। दि एशियन एज ने भी यही लिखा है कि सरमा ने आरोपों को खारिज किया और कहा कि वे एक आपराधिक अवमानना याचिका दायर करेंगे। खास बात यह है कि आरोप सिर्फ पासपोर्ट का नहीं, विदेश में संपत्ति होने और उसकी सूचना चुनावी शपथपत्र में नहीं देने का भी है।

सबरीमाला मंदिर विवाद आप जानते हैं और तथ्य है कि 2018 के संविधान पीठ के फैसले की समीक्षा हो रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के आलोक में यह बताना उचित होगा कि आज ही इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी खबर के अनुसार, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अदालत से अपील की है कि दिल्ली हाईकोर्ट की जज न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा उनका मामला न सुनें। आप जानते हैं कि केंद्र सरकार, उसके प्रतिनिधियों और सरकारी एजेंसियों ने दिल्ली की आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ मामला बनाया जिसमें कई नेता जेल हो आए हैं। बाद में दिल्ली के राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने 27 फरवरी 2026 को दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति 2021-22 से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य 23 आरोपियों को बरी कर दिया। न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने सीबीआई के “साजिश” के सिद्धांत को खारिज करते हुए कहा कि नीति निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बनाई गई थी और प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है। अदालत ने माना कि यह नीति परामर्श और विचार-विमर्श का परिणाम थी, न कि किसी आपराधिक साजिश का। अदालत ने सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच के निर्देश भी दिए हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार का काम है नीति बनाना, वह सही, गलत, जनहित में या जनहित के खिलाफ हो सकती है। संभव है कि इसके लिए रिश्वत ली या दी जाए। जांच भी होनी चाहिए लेकिन निर्वाचित मुख्यमंत्री को जेल में रखकर सबूत जुटाने की बजाय सबूत मिल जाए तो गिरफ्तारी की जा सकती है। पर यहां मामला दूसरी तरह से चल रहा था। दूसरी ओर, भाजपा नेताओं के खिलाफ आरोपों की जांच नहीं हुई है। यही नहीं, जो आरोपी भाजपा में शामिल हो गए उनके खिलाफ भी नहीं हुई है। ऐसे में मामला शीशे की तरह साफ है। फिर भी जो कानूनी प्रावधान हैं उसका उपयोग किया जा रहा है और यह केंद्र सरकार द्वारा अदालत पर दबाव बनाने जैसा भी है। भले ही ऐसा नहीं किया जाए तो गाज सीबीआई अधिकारियों पर गिरेगी।

आप जानते हैं कि केंद्र की भाजपा सरकार ने आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं को इस मामले के जरिए बदनाम किया, चुनाव हराने के लिए और भी उपाय किए तथा अंततः भाजपा जीत गई। अब नरेन्द्र मोदी पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में अपनी पार्टी को विजयी बनाने के लिए काम कर रहे हैं। इस क्रम में एसआईआर जैसे हो रहा है, आप जानते हैं। हाल में मालदा में लोगों ने न्यायिक अधिकारियों का घेराव किया था और मामले की जांच केंद्र सरकार की एजेंसी एनआईए कर रही है। केरल सोना तस्करी मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) कर रही है। इसमें मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के तत्कालीन प्रधान सचिव एम शिवशंकर से पूछताछ की गई थी। मुख्य आरोपी स्वप्ना सुरेश के मुख्यमंत्री कार्यालय के शीर्ष अधिकारियों के साथ संदिग्ध संबंध और रसूख सामने आए थे। इससे इस हाई-प्रोफाइल मामले में गंभीर संलिप्तता का संदेह पैदा हुआ। राजनयिक सामान के रूप में की गई सोने की तस्करी से जुड़ी आरोपी स्वप्ना सुरेश आरएसएस से संबद्ध एक एनजीओ में नौकरी कर रही हैं। सुरेश ने पत्रकारों से कहा कि उन्हें एक साक्षात्कार के बाद एनजीओ में निदेशक, महिला सशक्तिकरण और सीएसआर के रूप में नियुक्त किया गया, न कि इसलिए कि उनका आरएसएस या भारतीय जनता पार्टी से कोई जुड़ाव था। जुलाई 2020 का केरल सोना तस्करी मामला अभी भी कानूनी और राजनीतिक दांव-पेंच में उलझा हुआ है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मामले को केरल से कर्नाटक स्थानांतरित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। उसका मानना है कि राज्य में निष्पक्ष सुनवाई संभव नहीं है और आरोपियों के सत्ता से गहरे संबंध हैं।

सोने की तस्करी के 2020 के इस मामले में संयुक्त अरब अमीरात के वाणिज्य दूतावास के जिन राजनयिकों का नाम सामने आया था, वे घटना के बाद भारत से चले गए। मुख्य आरोपी स्वप्ना सुरेश (पूर्व यूएई वाणिज्य दूतावास कर्मचारी) और सरिथ पीएस को बाद में भारत में ही एनआईए  द्वारा गिरफ्तार किया गया था, जबकि राजनयिक भारत से निकल गए थे। तस्करी यूएई वाणिज्य दूतावास के कूटनीतिक बैग के जरिए की गई थी। इस कारण राजनयिकों की संलिप्तता की जांच की जानी चाहिए थी, लेकिन वे भारत से बाहर चले गए हैं। भारत में सुप्रीम कोर्ट न्यायिक अधिकारियों को लगाकर एसआईआर करवा रहा है। 2018 के फैसले की समीक्षा करवा रहा है और अमर उजाला की खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री ने कहा है – मालदा घेराव तृणमूल का महाजंगलराज, जीत के बाद गुनाहों का चुन-चुन कर हिसाब (करेंगे)। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है – जहां जज सुरक्षित नहीं वहां आम आदमी कैसे सुरक्षित रहेगा। आप जानते हैं कि सीबीआई के जज लोया की संदिग्ध मौत की जांच नहीं हुई। बार-बार मांग करने पर भी और यह भी कि जज को चुनाव लड़ने के लिए भाजपा का टिकट दिया जा चुका है। अधिवक्ता के रूप में सेवा दे चुके लोगों को जज बनाने के भी उदाहरण हैं। फिर भी अपना काम बताने की बजाय विपक्ष पर आरोप लगाने का प्रधान सेवक का प्रधान प्रचार जारी है।

हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड के अनुसार, मालदा में घेराव और घोषणापत्र के नाम पर प्रधानमंत्री ने टीएमसी को निशाना बनाया। खबरों के अनुसार, प्रधानमंत्री ने टीएमसी के घोषणा पत्र को हिन्दी में इश्तेहार कहने के लिए टीएमसी की आलोचना की है। मोदी के अनुसार, 1905 में ढाका के नवाब कलीमुद्दीन मुल्ला ने मुस्लिम समाज को भड़काने, हिन्दुओं के प्रति विद्वेष फैलाने के लिए जिस शब्द का इस्तेमाल किया था वह इश्तेहार था। हिन्दी के इश्तेहार का अर्थ बताने की जरूरत नहीं है। हर पर्चा इश्तेहार हो ही सकता है। हिन्दी में यह मुस्लिम समाज को भड़काने या हिन्दुओं के प्रति विद्वेष फैलाने के लिए उपयोग किया गया कोई ‘विशेष’ शब्द नहीं है। ढाका के नवाब कलीमुद्दीन मुल्ला ने इस्तेमाल किया था तो बांग्ला या उर्दू अथवा फारसी का भी शब्द हो सकता है। नरेन्द्र मोदी और भाजपा हिन्दी, अंग्रेजी या गुजराती अर्थ की बात करते तो चलता लेकिन मामला है तो बांग्ला का और बात बांग्ला अर्थ की ही की जानी चाहिए। नहीं तो तमाम शब्दों का अनर्थ किया जा सकता है। तथ्य यह है कि अंग्रेजी के (इलेक्शन) मैनिफेस्टो जिसे हिन्दी में चुनाव घोषणा पत्र कहते हैं उसे बांग्ला में इश्तेहार कहते हैं। इसलिए यह मुद्दा बाल की खाल निकालने लायक भी नहीं है। दि इंडियन एक्सप्रेस की फोटो देखिए – अंग्रेजी में मैनिफेस्टो, हिन्दी में घोषणा पत्र और बांग्ला में इश्तेहार। लेकिन प्रधानमंत्री को जो कहना था कह गए। आज छप भी गया है। इसके अलावा, देशबन्धु की एक खबर के अनुसार, अहमदाबाद विमान हादसे के पीड़ितों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि उन्हें मुआवजा नहीं, हादसे का सच चाहिए। खबर के अनुसार, हादसे के 10 महीने बाद पीड़ितों के परिवारों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर और ब्लैक बॉक्स का डेटा जारी करने का आग्रह किया है। द हिन्दू की खबर और फोटो बताती है कि एलपीजी की आपूर्ति से संबंधित चिन्ता के बीच प्रवासी मजदूर घर जा रहे हैं। यह सरकार के इस प्रचार और आश्वासन से उलट है कि देश में एलपीजी की कोई किल्लत नहीं है। हालांकि, जैसे कोविड से निपटे थे वैसे इस संकट से निपटना है तो निकल लेने में ही भलाई है – ऐसा लोग समझ गए हैं।     

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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