Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : खबरों के लिहाज से अखबारों की जोड़ी और सांप्रदायिक सद्भाव की खबर का रह जाना

आज जब कोई खास खबर नहीं है, चुनाव आयोग की ‘कारगुजारी’ भी कम दिलचस्प नहीं है लेकिन उसे भी महत्व नहीं मिला। मेरा मानना है कि आयोग पर जब भाजपा के लिए काम करने का आरोप है तब उसका हर काम जनता की नजर में होना चाहिये और किसी भी पत्रकार को यही करना चाहिये लेकिन अमृतकाल की पत्रकारिता भी तो अनुसंधान का विषय है।  

संजय कुमार सिंह

आज अमर उजाला की लीड दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में विद्याथी परिषद की जीत है। नवोदय टाइम्स की लीड राहुल गांधी के जेन ज़ी बयान पर बवाल है तो देशबन्धु की लीड चुनाव आयोग की ‘कार्रवाई’ है। पहली दो खबरें सोशल मीडिया पर थीं लेकिन तीसरी मेरे लिये नई है। द हिन्दू और द टेलीग्राफ की लीड मणिपुर में असम राइफल्स के दो जवानों के शहीद होने की खबर है। दि एशियन एज की लीड राहुल गांधी के वोट चोरी के दावे को दोहराने पर भाजपा-कांग्रेस में भिड़ंत की खबर है तो इंडियन एक्सप्रेस की लीड अमेरिका के साथ व्यापार सौदे से संबंधित वार्ता वापस पटरी पर होने की खबर है। ऐसे में आज हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया दोनों की लीड एक ही खबर है। हालांकि शीर्षक थोड़ा अलग है। हिन्दुस्तान टाइम्स के शीर्षक से इस खबर को लीड बनाने का ‘कारण’ स्पष्ट है। हिन्दी में यह शीर्षक कुछ इस तरह होगा – पाकिस्तान से सौदे के बाद भारत ने सऊदी अरब से अपील की कि वह ‘संवेदनशीलता’ का ख्याल रखे। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक होगा, सरकार ने कहा कि वह रियाद (सऊदी अरब की राजधानी) से आपसी संवेदनशीलता का सम्मान करने की उम्मीद करती है। इनमें से ज्यादातर खबरें दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने पर हैं। सिर्फ एक खबर अपवाद हैं और वह है देशबन्धु की लीड – चुनाव आयोग ने लापता राजनीतिक दलों पर कसा शिकंजा, 474 और दलों को सूची से हटाया। इन खबरों और नौ अखबारों की लीड में एक खबर ऐसी भी है जो सभी अखबारों में पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपनी चाहिये थी पर नहीं छपी है। आज यह खबर द हिन्दू में सेकेंड लीड है।

खबर यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मैसूर के दशहरा समारोह का उद्घाटन मुस्लिम महिला, बानु मुश्ताक से कराये जाने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। अदालत है कहना था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। यह निर्णय न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि वर्तमान सामाजिक और सांप्रदायिक माहौल में एक सशक्त संदेश भी देता है। आज का भारत भयंकर सांप्रदायिक तनाव और धार्मिक ध्रुवीकरण तथा उसकी कोशिशों के दौर से गुजर रहा है। चुनावी राजनीति, सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाली सामग्री, और इतिहास की गलतबयानी — इन सबने मिलकर एक ऐसा वातावरण तैयार कर दिया है जिसमें धार्मिक पहचान को नागरिक अधिकारों से ऊपर रखा जाने लगा है। ऐसे माहौल में जब एक मुस्लिम महिला को केवल उसके धर्म के कारण एक सांस्कृतिक समारोह के उद्घाटन से वंचित करने की कोशिश होती है, तो यह महज एक याचिका नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता पर एक खुली चुनौती बन जाती है। आप जानते हैं कि मैसूर का दशहरा एक शाही परंपरा से जुड़ा त्योहार है जिसकी जड़ें विजयनगर साम्राज्य (14वीं सदी) तक जाती हैं। वोडेयार वंश ने 17वीं सदी में ही इसे बड़े धूमधाम से मनाना शुरू किया था जो अब तक जारी है। यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का प्रतीक भी रहा है। इसमें राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, संगीत, नृत्य, लोक कला और विविधता का उत्सव मनाया जाता है। दशहरा का उद्घाटन हमेशा से किसी समाजसेवी या प्रेरणादायक व्यक्ति द्वारा किया जाता रहा है। इसमें धार्मिक पहचान मुद्दा ही नहीं होना चाहिये।

याचिका में एक एतराज यह भी था कि हिन्दुओं की पूजा मुसलमान से कैसे कराई जा सकती है। इस पर अदालत ने कहा कि यह एक सरकारी कार्यक्रम है, कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं। सरकार किसी को पूजा करने या किसी आयोजन में शामिल होने से केवल उनके धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं नहीं कर सकती है। याचिका के अनुसार, अपील में कहा गया था कि 22 सितंबर को चामुंडेश्वरी मंदिर में दशहरा उत्सव के उद्घाटन के दो पहलू थे – “फीता काटना”, जो एक धर्मनिरपेक्ष गतिविधि थी और फिर मंदिर की देवी के समक्ष उद्घाटन पूजा, जो मूलतः एक हिंदू धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधि है। उद्घाटन पूजा में देवी चामुंडेश्वरी के गर्भगृह के समक्ष दीप प्रज्वलित करना और देवी को फूल और अन्य पारंपरिक वस्तुएँ अर्पित करना शामिल था। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया, “उन्हें आमंत्रित करना राज्य की ओर से एक विशुद्ध राजनीतिक कार्य था।” याचिका में तर्क दिया गया था कि एक हिंदू गणमान्य व्यक्ति द्वारा पूजा करवाना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित आवश्यक धार्मिक प्रथा का हिस्सा है। सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए इस बात पर प्रकाश डाला कि विचार और आस्था की स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व राष्ट्रीय एकता के मूल आदर्श हैं। अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह कार्यक्रम कर्नाटक राज्य द्वारा आयोजित किया गया था, जो धर्मनिरपेक्ष है और ‘अपना कोई धर्म नहीं रखता।’ याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उद्घाटन पूजा हिंदुओं के लिए आरक्षित एक धार्मिक प्रथा है। अदालत ने दोहराया कि सभी धर्मों के प्रति राज्य का तटस्थ रवैया उसे ‘समानता के अधिकार में बाधा डालने वाली प्रथाओं को समाप्त करने’ में हस्तक्षेप करने से नहीं रोकता।

बुकर पुरस्कार विजेता बानु मश्ताक एक समाजसेवी हैं। ने कर्नाटक में महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए उल्लेखनीय कार्य किए हैं। ऐसे में उनका उद्घाटनकर्ता चुना जाना न केवल उनकी उपलब्धियों का सम्मान है, बल्कि इस बात का भी संकेत है कि दशहरा जैसे पर्व सभी नागरिकों की भागीदारी से समृद्ध होते हैं। उनके खिलाफ याचिका यह दर्शाती है कि किस तरह समाज के एक वर्ग द्वारा सांस्कृतिक आयोजनों को भी ‘हम बनाम वे’ की राजनीति में धकेला जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करता है, बल्कि एक सकारात्मक नज़ीर भी स्थापित करता है। निश्चित रूप से यह आने वाले समय में ऐसे प्रयासों को हतोत्साहित करेगा जो भारत की विविधता और लोकतंत्र को खंडित करना चाहते हैं। इस पूरे प्रकरण ने भारत की मौजूदा सांप्रदायिक स्थिति की गहराई को उजागर किया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक रोशनी की तरह है जो बताता है कि भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएँ अब भी संविधान की मूल भावना के साथ खड़ी हैं। मैसूर दशहरा, जो भारत की साझा सांस्कृतिक धरोहर का उत्सव है, उसमें सभी नागरिकों की भागीदारी ही उसकी आत्मा को जीवित रखती है। बानु मश्ताक जैसे समाजसेवी चेहरों की उपस्थिति उसी समावेशी परंपरा को आगे बढ़ाती है।

द हिन्दू में प्रमुखता से छपी इस खबर को पढ़कर मुझे लगा कि सुप्रीम कोर्ट को मामला दायर करने वाले पर जुर्माना भी लगाना चाहिये था। मैंने चैट जीपीटी से उसकी राय जाननी चाही तो न सिर्फ उसने इसका समर्थन किया बल्कि कुछ उदाहरण भी दिये। पेश है एआई की सलाह और उदाहरणों का संपादित रूप। एआई के अनुसार, आपकी (मेरी) यह राय कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसी याचिका दायर करने वालों पर जुर्माना लगाना चाहिए — पूरी तरह से संवैधानिक और न्यायसंगत है। जुर्माना न केवल न्यायालय के समय की रक्षा करता है, बल्कि इस सार्वजनिक विश्वास को भी बनाए रखता है कि संविधान की रक्षा की जरूरत सभी के लिए है, न कि कुछ विशेष हितों या पहचान के लिए। भारतीय अदालतों ने पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) या जनहित के मुकदमों के लिए भी याचिकाकर्ता पर जुर्माना, लागत या खर्च देने के आदेश दिये हैं। ये मामले यह दिखाते हैं कि न्याय व्यवस्था में समय बर्बाद करने वाले या जिनका उद्देश्य सार्वजनिक हित की बजाय प्रचार या निजी लाभ हो उन्हें न्यायपालिका कैसे रोकती है। मुकदमों के लिए जुर्माना या कॉस्ट (खर्च) लगाने के कई मामले हैं। उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने अशोक पांडे नाम के एक वकील पर ₹5 लाख का “कॉस्ट” लगाया था क्योंकि उन्होंने एक पीआईएल दायर करके दावा किया गया कि बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने शपथ लेते समय ‘आई’ यानी ‘मैं’ शब्द नहीं कहा। इस तरह के मामले को न्यायपालिका ने फ्रिविलस यानी बेमायने मानता है। एक वकील ने “औपनिवेशिक कानूनों” पर व्यक्तिगत रूप से पीआईएल दायर की थी। इसमें उन्होंने  कहा था कि सभी औपनिवेशिक कानून समाप्त किए जाएँ। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिका अस्पष्ट थी और कोर्ट का समय बर्बाद हो रहा है। तब ₹1 लाख का जुर्माना लगाया गया था। बिहार के विधायक रवीन्द्र सिंह पर फ्रिविलस जनहित याचिका दायर करने के लिये सुप्रीम कोर्ट ने ₹10 लाख का जुर्माना लगाया था। पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने भी फ्रिविलस याचिका दायर करने वाले पर ₹50,000 का “खर्च” लगाया था।

आज हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम की एक खबर दिखी – “ट्रम्प, शी ने तीन महीने बाद बात की; अक्तूबर में मिलने की योजना”। यह खबर इसलिये महत्वपूर्ण है कि अमेरिका के टैरिफ लगाने के बाद भारत जब चीन के पाले में चला गया (अखबारों ने ऐसा ही दिखाया) तो चीन के साथ अब क्या चल रहा है उसकी खबरें नहीं हैं। दूसरी ओर अमेरिका से संबंध सामान्य होते दिखाये जा रहे हैं और आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड ऐसी ही है। ऐसे समय में अगर ट्रम्प और शी ने तीन महीने बाद बात की, अगले महीने मिलने की योजना है तो खबर बड़ी है लेकिन वैसे नहीं छपी है जैसी है या होनी चाहिये। इसी तरह, देशबन्धु की लीड, चुनाव आयोग ने लापता राजनीतिक दलों पर कसा शिकंजा, 474 और दलों को सूची से हटाया भी महत्वपूर्ण खबर है। एक तो इसलिये कि चुनाव आयोग आजकल खबरों में है, दूसरे हाल में खबर आई थी कि गुजरात के करीब 10 अनाम से राजनीतिक दलों को 4300 करोड़ रुपये का चंदा मिला है। उसकी जांच कौन करेगा, हुई या नहीं – ये सब खबर नहीं है लेकिन राजनीतिक दलों को सूची से हटाने की खबर कितनी महत्वपूर्ण है या सूची से हटाना क्यों, कितना जरूरी है। यह सब समझने जानने के लिए ये खबर महत्वपूर्ण थी पर यह भी अखबारों में वैसे नहीं छपी है जैसे छपनी चाहिये।

यह भारत सरकार द्वारा लाखों शेल कंपनियां बंद करवाने की तरह तो नहीं है? आप जानते हैं कि सरकार ने इसका घोषित मकसद यही बताया था कि इनके जरिये देश का काला पैसा विदेशों से आकर भारतीय कंपनियों में निवेश हो जाता है। पर इसके एक बड़े मामले की जांच ही नहीं हुई या जो जांच हुई उससे कोई फायदा नहीं हुआ। पहले तो यह प्रचार होता रहा है कि इतनी शेल कंपनियां बंद कराई, उतनी बंद हुई आदि और फिर अंत में कह दिया गया कि शेल कंपनियों की परिभाषा ही तय नहीं है। जो भी हो, शेल कंपनियां बंद कराने के फायदे तो नहीं मालूम हुए पर नुकसान यह हुआ कि कम से कम 2,50,000 कंपनियां बद करवाना माना जाये तो भिन्न बैंकों में चल रहे इतने ही चालू खाते बंद हो गये होंगे। इनमें प्रत्येक की न्यूनतम बचत 5,000 रुपये भी होती तो बैंकों में कितने पैसे होते। आप कह सकते हैं कि इससे क्या फर्क पड़ता है लेकिन तथ्य है कि बैंकों के बचत खाते में न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने पर पहले कोई जुर्माना नहीं लगता था। मोदी राज में लगने लगा और जाहिर है यह गरीबों के साथ ही होगा कि उनके खाते में न्यूनतम राशि भी न हो। इस तरह सरकार के काम से नुकसान तो मालूम है, नफा मालूम नहीं है और जो बताया जाता है वह अविश्वसनीय है।

इसी तरह टैरिफ से हो रही परेशानी का मामला है। सरकार ने उद्योग धंधों की रक्षा और विकास के लिए क्या किया यह तो नहीं पता लेकिन ऐसी खबरें छपती रहती हैं जो बताती हैं कि अमेरिकी टैरिफ से निर्यातक परेशान हैं। सरकार स्वदेशी का प्रचार कर रही है जबकि स्वदेशी टैरिफ से होने वाले नुकसान का बचाव नहीं है। खबरों से यह दिखाया जा रहा है कि स्थिति ठीक हो रही है संभव है हो जायेगी। लेकिन लाखों के निवेश से काम करने वाले दो उद्योग धंधे रोज कई लाख का काम करते हैं माल बेचते हैं, कर्ज की किस्त और ब्याज चुकाते हैं वे एक दिन काम नहीं करें तो उनका खर्च नहीं रुकता है और कई बार यह खर्च इतना ज्यादा होता है कि इसकी भरपाई करने में कई दिन लग जाये। नोटबंदी के समय छोटे-बड़े सभी व्यापारियों व्यवसाइयों के साथ ऐसा हुआ था। कुछ लोग इसलिये भी किस्तें नहीं चुका पाये और विदेश भाग गये, फंस गये या गरीब हो गये। सरकारी नीतियों से ऐसा होता है लेकिन उसका ध्यान कभी नहीं रखा गया। पर खबरें ठीक से छपती और छपवाई जाती रही हैं। आज भी इंडियन एक्सप्रेस की लीड यही बताती है कि अमेरिका से डील हो जायेगा। वार्ता चल रही है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन