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इंदौर प्रेस क्लब चुनाव : अभी तो पार्टी शुरू हुई है, खबर-खबरियों की खाल में छिपे माफियाओं की!

इंदौर : कभी सरस्वती के वरदहस्त के केंद्र के रूप में प्रख्यात इंदौर प्रेस क्लब अपने वास्तविक उद्देश्य और वास्तविक पहचान से लगता है बिलकुल ही गुजर बसा है। बीते कुछ वर्षों में जहां इंदौर प्रेस क्लब नामक यह संस्था पूरी इंदौरी मीडिया का प्रतिनिधित्व करते हुए देश में इंदौर की पत्रकारिता का परचम फहराया करती थी। कुछ दिनों पूर्व एक के बाद एक हुए घटनाक्रम ने इस क्लब की ही नहीं, इंदौर की पत्रकारिता को कलंकित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। इस क्लब के मुखिया की कारगुजारियो से गत दिनों पूर्व ही यह क्लब सुर्खियों में आया था। मसलन करे एक, भुगते सब, की कहावत का चरितार्थ उत्कृष्ट उदहारण हम सबने देखा था।

इंदौर : कभी सरस्वती के वरदहस्त के केंद्र के रूप में प्रख्यात इंदौर प्रेस क्लब अपने वास्तविक उद्देश्य और वास्तविक पहचान से लगता है बिलकुल ही गुजर बसा है। बीते कुछ वर्षों में जहां इंदौर प्रेस क्लब नामक यह संस्था पूरी इंदौरी मीडिया का प्रतिनिधित्व करते हुए देश में इंदौर की पत्रकारिता का परचम फहराया करती थी। कुछ दिनों पूर्व एक के बाद एक हुए घटनाक्रम ने इस क्लब की ही नहीं, इंदौर की पत्रकारिता को कलंकित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। इस क्लब के मुखिया की कारगुजारियो से गत दिनों पूर्व ही यह क्लब सुर्खियों में आया था। मसलन करे एक, भुगते सब, की कहावत का चरितार्थ उत्कृष्ट उदहारण हम सबने देखा था।

खैर मूल खबर पर आता हूं। आगामी 7 अगस्त को क्लब के चुनाव का भोंपू बजा है। भोंपू के गुंजयमान होते ही कथितों की मंडली ने पैर पसारना शुरू कर दिया। पूरे इंदौरी मीडिया का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रेस क्लब का यही दावा क्लब के शिखर पर पहुंचने का दिल में ख्याल रखने वाले कथित तौर पर ख्यात मुखरंजन को लालायित कर उठा। इस शिखर की आस में मुखरंजन ने अपने सारे अनैतिक पंख पसार दिए।

आलम यह हुआ कि मुखरंजन ने अभी क्लब शिखर का नामांकन ही दर्ज किया था कि शराब से सिरमौर पार्टियां आयोजित की जाने लगी हैं। ऐसी ही एक पार्टी का निमन्त्रण पत्रकारों को मिलने लगा है। कलम की धुन में रमे मूल पत्रकार जहां इस तरह की पार्टियों से परहेज कर पत्रकारिता की इस हालत को कोस रहे हैं तो कथित सबसे तेज चैनल का दंभ भरने वाले एक जोंटी (नशे में डूबे) अपनी नशाखोरी को प्रधान रख सबसे पार्टी में शामिल होने की मनुहार कर रहे हैं। खैर प्रेस क्लब चुनाव के नतीजे तो बीते समय की तरह ही संदिग्ध सदस्य (फर्जी वोटर) ही तय करेंगे। हो सकता है मुखरंजन की शराब परोसी पार्टियां उन्हें शीर्ष पर पहुंचा भी दे, लेकिन इस सब के बीच आखिर हार गया वो मूल जमीनी समर्पित पत्रकार जिसके कंधे पर चौथा खंभा टिका है। खैर,  अभी तो पार्टी शुरू हुई है…

जीतेंद्र सिंह यादव ‘जीत’ की एफबी वॉल से.

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