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साहित्य

‘समास 25’ में खालिद जावेद : अब ऐसे लोग नहीं रहे जिनके भीतर एक दुनिया समाई होती थी

दिनेश श्रीनेत-

‘समास 25′ मिली. बहुत कुछ उल्लेखनीय है. पठनीय है. सबसे बड़ा आकर्षण खालिद जावेद के साथ उदयन बाजपेयी की बातचीत है. करीब 86 पृष्ठों में फैली इस विस्तृत बातचीत का फ़लक इतना बड़ा है कि लगता है कि हम किसी एपिक उपन्यास के पन्नों को तेजी से पलट रहे हों. इतिहास, परिवार की स्मृतियां, शहर से जुड़े किस्सों, नदियों और बियावानों का वर्णन, विदेशी उपन्यास, दुनिया जहान के लेखक, आलोचना, रचना-प्रक्रिया, पुरानी भुतैली यादें और जाने क्या-क्या.

इसे पढ़ते हुए मेरे मन में लगातार वो लोग कौंध रहे थे, जिनके भीतर एक पूरी दुनिया समाई होती थी. अब ऐसे लोग नहीं रहे. बचपन में मेरा वास्ता ऐसे तमाम लोगों से होता था, जिनके भीतर जाने कितनी कहानियां, किस्से, किरदार और कहें तो महाकाव्य बसे होते थे. बचपन में गांव से मेरे रिश्ते के भतीजे अक्सर घर पर आते थे. वे जब पुरानी बातें छेड़ते तो लगता था हम ‘महाभारत’ या ‘वार एंड पीस’ जैसे किसी उपन्यास का अंश सुन रहे हों.

उनके उन आख्यानों में घटनाएं होती थीं, हर घटना कोई पूर्व परिप्रेक्ष्य होता था, उस बीत गए अतीत में लोगों की आपसी रंजिशें होती थीं, भरोसा होता, छल और टकराहट होती थी. हर कथा की जाने कितनी उपकथाएं होती थीं और हर उपकथा किसी न किसी मुख्य कथा से जाकर जुड़ जाती थी. गर्मियों की छुट्टियों में गांव जाने पर ऐसे जाने कितने किस्से सुने हैं. बचपन में जब बिजली नहीं होती थी तो रात के अंधेरे में जैसे कोई रहस्यमय संदूकची खुल जाती थी. पेंडोरा के बॉक्स की तरह जाने कितनी आत्माएं निकलकर हवा में डोलने लगती थीं.

हम स्मृतियों के मामले में दरिद्र हुए हैं. सिर्फ यथार्थ ने हमारी कल्पना को छीन लिया है. अब आभासी यथार्थ की थोड़ी बहुत यादें रहती हैं, जब वह आभासी यथार्थ नहीं था तो हकीकत पर हम जादुई मुलम्मा चढ़ा लेते थे. इसी तरह की कहानियों ने सुदूर आराकाटका में गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ की कल्पनाओं को जगा दिया था. एक लेखक का संसार बहुत बड़ा होना चाहिए. वह एक पूरा ब्रह्मांड भी हो सकता है और सूक्ष्मदर्शी से देखे जाने वाली छवि भी हो सकती है.

मैं हमेशा इस उलझन में रहा कि ऐसा क्या है कि जॉन स्टेनबैक, तोलस्तोय, आस्कर वाइल्ड जैसे लेखक मुझको अभी बहुत पठनीय लगते हैं, जबकि कुछ नई किताबें तमाम संभावनाओं के बावजूद कुछ ही देर में उकताहट पैदा कर देती हैं. शायद सबसे बड़ी वजह यह है कि लेखक का संसार बहुत छोटा हो गया है और दृष्टि बहुत सीमित. मैं हमेशा इस बात से चकित होता रहा कि अज्ञेय भाषा के माध्यम से बाहरी दुनिया को देखने के कितने तरीके खोज सके, मुझे हमेशा मोहन राकेश के किरदारों से लगाव रहा, जैसे कि वे जीवन के किसी पड़ाव पर मिले हों.

इतनी इंटेसिटी, इतनी वास्तविकता तभी हासिल होगी जब आप दुनिया को अपनी सारी संवेदनाओं के साथ महसूस करेंगे. खालिद जावेद अस्तित्ववादी दर्शन के प्रति अपने रुझान के बावजूद कहीं से भी अजनबियत के शिकार नहीं रहे, वे जिंदगी को भरपूर महसूस करते हैं, बिना किसी नारे या जुमले के. जब आप खालिद के उपन्यास पढ़ते हैं तो महसूस होता है कि दुनिया को देखने का हमारा नजरिया कितना सीमित है. कितना कुछ हम अनदेखा कर जाते हैं. क्योंकि हमने धारणा बना ली है कि यह असुंदर है, यह बदसूरत है.

खालिद पुराने किस्सागो और आधुनिक शहरी नागरिक का अद्भुत मेल हैं. शायद वे अपने किस्म के अनूठे शख़्स हैं, जिसने तारीख बदलते कैलेंडर से स्मृतियों की धूल झाड़ने की बजाय उसके पुरानेपन को संजोकर रखा. उनका बयानिया हमें सतह से ऊपर ले जाता है और दुनिया को देखने की एक नई समझ प्रदान करता है.

‘समास’ में प्रकाशित बातचीत यह समझने की कुंजी है कि कैसे लेखक का संसार विस्तार लिए बिना बेहतर रचना नहीं प्रस्तुत कर सकता.

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