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आज के अखबार : खून करने के बदले पानी नहीं देने की राजनीति का समर्थन और उसे स्थापित करते लग रहे हैं 

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों की कई खबरों में एक प्रमुख खबर है, एक बूंद भी पानी पाकिस्तान न जाये…. ऐसी तैयारी। यह अमर उजाला का शीर्षक है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड भी लगभग यही है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, सरकार जब सिन्धु नदी के पानी पर तीन विकल्पों को टटोल रही है तब जल शक्ति मंत्री ने कहा, पाकिस्तान को एक बूंद पानी भी नहीं। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड भी यही है, मंत्री ने कहा, पाकिस्तान की ओर पानी का प्रवाह रोकने की योजनाओं पर काम कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार ने जब कहा कि वह सिन्धु जल संधि स्थगित कर रही है तो बहुतों ने यह कहा कि नदी का पानी रोकना संभव नहीं है तो संधि स्थगित करने का क्या मतलब। वैसे भी पानी रोक लिय तो उसे रखेंगे कहां? उसका करेंगे क्या? ऐसे में सरकार और उसका प्रचार करने वाला  मीडिया यह साबित करने में लग गया है कि सरकार पानी रोक कर रहेगी।

कहने की जरूरत नहीं है कि असंभव कुछ नहीं होता है और लोग इंतजार करते हुए मर जाते हैं। पुलवामा के दोषी अभी पहचाने नहीं गये पहलगाम के लिए पाकिस्तान की जनता को पानी से वंचित किया जायेगा। नरेन्द्र मोदी तो नामुमकिन को मुमकिन करने ही आये हैं और इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिये कि पानी रोकना संभव है। पर सवाल है कि किस कीमत पर और क्या यह व्यावहारिक होगा। रोक पायेंगे और इतना आसान है तो इतने साल में बिहार में हर साल तबाही मचाने वाली बाढ़ को क्यों नहीं रोका गया और अंगर पाकिस्तान जाने वाले सिन्धु नदी के पानी को रोका जा सकता है तो बिहार में बाढ़ को भी रोका जाना चाहिये था। दूसरी ओर, अगर रोकने के तमाम उपाय करके, लाखों-करोड़ों खर्च करके पानी रोक भी दिया गया तो क्या रुका रहेगा और पाकिस्तान नष्ट हो जायेगा? कोई वैकल्पिक उपाय नहीं कर लेगा, भारत पर पानी छोड़ने के लिए दबाव पड़ेगा ही। जाहिर है, ऐसे में पानी रोकना विकल्प नहीं है। सरकार को क्यों यही विकल्प लगता है वह उसे बताना चाहिये, मीडिया का काम है पूचे, समझाये – लेकिन अब वह सब नहीं होता।

इसी तरह आज की दूसरी खबर है, अमित शाह ने सभी मुख्यमंत्रियों से कहा सुनिश्चित कीजिये कि सभी पाकिस्तानी लौट जायें। दि एशियन एज में पांच कॉलम की इस खबर का जो हिस्सा पहले पन्ने पर है उसमें यह नहीं बताया गया है कि यह आदेश सिर्फ मुसलमानों के लिए हैं या पाकिस्तानी हिन्दुओं के लिए भी। ऐसा नहीं हो सकता है कि पाकिस्तान से वीजा लेकर सिर्फ मुसलमान आते होंगे और उनमें कोई हिन्दू नहीं होगा। अब अगर हिन्दुओं को भी वापस भेजा जा रहा है तो नाम पूछकर गोली मारने का जवाब कहां हुआ? अगर पाकिस्तान से आने वाले सिर्फ मुसलमान ही होते थे और उन्हीं का वीजा रद्द किया गया है तो सवाल उठता है कि पुलवामा के बाद इन्हें क्यों नहीं रोका गया और अब रोक देने से क्या हो जायेगा। वैसे भी आतंकी वीजा लेकर तो आते नहीं होंगे और जब केंद्रीय गृहमंत्री कई बार कह चुके हैं कि आतंकवाद खत्म हो गया तो अब क्यों सुनिश्चित करना चाह रहे हैं कि सभी (धर्मों के) पाकिस्तानी वापस चले जायें। जो हैं वो आतंकवादी हो ही नहीं सकते। वैसे भी वारदात करने लिये आतंकी वीजा लेकर नहीं आते होंगे जाहिर है दोनों आदेश समझ में नहीं आने वाला है पर कोई सवाल नहीं है।     

आज की तीसरी खबर है दो वांछित अपराधियों के घर उड़ा दिये गये। द टेलीग्राफ ने लिखा है कि यह सब उस दिन हुआ जब सेना प्रमुख गीता का संदेश लेकर कश्मीर पहंचे। अगर सरकार ब्रज भूषण सिंह जैसे सांसदों को संरक्षण देती है, तमाम आंदोलनों और विरोध से उनका कुछ नहीं बिगड़ा तो क्या पाकिस्तान की शह पर भारत में आतंकी गतिविधि चलाने वाले का यही एक घर होगा और उसे पाकिस्तान में संरक्षण नहीं मिला होगा? घर तोड़ने की खबर या आज की तीनों खबरें हेडलाइन मैनेजमेंट नहीं तो और क्या हैं? हिन्दी पट्टी के गांवों में आम मुसलमानों को डराने के लिए चलाये जा रहे गैर कानूनी बुलडोजर न्याय से क्या पाकिस्तान डर जायेगा और डरना होता तो क्या रीता बहुगुणा जोशी डर गई हैं जो कांग्रेस नेता हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी हैं। 2009 में लखनऊ में उनका घर जला दिया गया था। पुरानी खबरों के अनुसार, रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष थीं। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ टिप्पणी की थी। इससे नाराज, बसपा कार्यकर्ताओं ने लखनऊ के अति सुरक्षित इलाके में स्थित उनके घर में आग लगा दी थी। घर बर्बाद होने से अगर एक नेता नहीं डरा (भले अब भाजपा में हैं) तो आतंकी क्यों डरेगा? लेकिन सरकार को कुछ करते हुए दिखना है। इसलिए यह सब किया जा रहा है।      

पहलगाम मामले में एक और मुद्दा था, नाम (धर्म) पूछकर गोली मारी – खबर नहीं है। मैंने उस दिन लिखा था कि हिन्दी अखबारों ने हिन्दू होने का अपना धर्म निभाया जबकि अंग्रेजी अखबारों में यह बात प्रमुखता से नहीं थी। लेकिन यह व्हाट्सऐप्प पर घूमने लगा था और चूंकि सरकारी मामला था या सरकार के लिए ही था इसलिए रोकने की जरूरत ही नहीं रही और सब सार्वजनिक हो गया। कुछ लोगों ने इसे गलत भी बताया और भले आतंकियों ने नाम पूछकर मारा हो, मरने वालों में मुसलमान भी हैं और स्थानीय कश्मीरियों ने पर्यटकों की खूब रक्षा की। दूसरी ओर, किसी मुसलमान को नाम पूछकर उसके धर्म के लिए छोड़ने का उदाहरण अभी तक नहीं मिला है। फिर भी आज टाइम्स ऑफ इंडिया (मुंबई में भी) पहले पन्ने पर एक और खबर है, 20 पीड़ितों की पैंट नीचे थी, जिप खुले थे। जाहिर है, नाम पूछकर और धर्म पक्का कर मारा गया लेकिन जब धर्म पूछकर किसी को छोड़ा नहीं गया, मरने वालों में मुसलमान भी है तो इस खबर का क्या मलतब?

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार हिन्दू मुसलमान चाहती है और अखबार वही कर रहे हैं। इसे ना कोई देखने वाला है और ना रोकने वाला। इन खबरों के फेर में आज वक्फ कानून पर सरकार ने जो कहा है वह बताना छूटा जा रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स, द हिन्दू में यह सेकेंड लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड है, अमेरिका पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई में भारत का समर्थन कर रहा है। आज की एक और खबर है जो नवोदय टाइम्स में सिंगल कॉलम में है, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने मानी टेरर फंडिंग की बात।

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