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मध्य प्रदेश

अधेड़ छिनालों के रैकेट में शामिल दलाल पत्रकारों के नाम खुलने लगे!

मध्य प्रदेश का हनी ट्रैप रैकेट में रोजगार पाए चार पुरुष और तीन महिला पत्रकारों के नाम खुलने लगे हैं. इस रैकेट में शामिल लोगों के कब्जे से कुल 92 लोगों के वीडियो सामने आए हैं. मतलब कि कुल 92 लोगों को ब्लैकमेल किया गया और इनसे अरबों रुपये लिए गए. उगाही और ब्लैकमेलिंग के खेल के दलाल बने पत्रकार. इन पत्रकारों ने नेताओं और वेश्याओं के बीच की कड़ी बन कर अपने दलाली के कर्तव्य को निभाया. मध्य प्रदेश के पत्रकार प्रकाश भटनागर ने एक एफबी पोस्ट लिखकर इशारों इशारों में दलाल पत्रकारों के नाम खोल दिए हैं. आप भी पढ़ें और समझें.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

शहद की बिखरी कड़ियां

प्रकाश भटनागर

कुदरती शहद की एक्सपायरी डेट नहीं होती। मध्यप्रदेश की मधुमक्खियों वाला शहद भी ‘प्रकृति’ की देन ही है। इसलिए उससे जुड़े किसी भी घटनाक्रम को कालबाधित नहीं माना जा सकता। इस शहद की मिठास से खिंचने के बाद उसमें चिपककर फड़फड़ाने वाले कई दिग्गजों के हाल तो बयान हो ही रहे हैं। लेकिन वह कई कलाकार अब भी सार्वजनिक रूप से नंगे नहीं किये जा सके हैं, जो इस न्यूडिटी के जन्मदाता, पालक तथा पोषक हैं। बात उन लोगों की हो रही है, जिन्होंने यह सारा जाल बुना और जो मीडिया जगत से संबद्ध हैं। सभी की प्रगति यात्रा हमेशा से रहस्य का विषय रही है। मसलन, अखबार के हाकर भी अगर आज धडल्ले से किसी न्यूज चैनल के सर्वेसर्वा हैं और लिखना पढ़ना न जानते हुए भी जो कथित सरस्वती पुत्र प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकारों में जगह बनाने में कामयाब ही नहीं हुए बल्कि चैनल मालिक कहे जाने लगे हो तो आज लोकतंत्र के इस मजबूत स्तंभ पर संदेह का वातावरण पैदा हो रहा है तो अचरज कैसा?

एक दौर में अपने वरिष्ठों के लिए भोजन के डिब्बों का इंतजाम करने वाले एक अन्य वर्तमान के सीनियर पत्रकार भी इस कांड की मजबूत कड़ी के मुख्य पात्र के तौर पर उभरकर सामने आये हैं। बता दें कि फिलहाल इन चेहरों पर पंचक की छाया साफ देखी जा सकती है। क्योंकि पुलिस के एक आला अफसर ऐसे कुछ लोगों से शुरूआती पूछताछ कर चुके हैं। पूरी उम्मीद है कि यह सिलसिला एक बार फिर शुरू हो जाएगा। यही वजह है कि कुछ वरिष्ठ पत्रकार अपने इन हमपेशाओं को बचाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका तक में सामने आ गये हैं। जाहिर है कि मामला सहयोग का नहीं, बल्कि खुद की किसी कमजोर रग का ही है। कैलाश विजयवर्गीय अगर कह रहे हैं कि कुछ पत्रकार इस कांड में शामिल हैं और कुछ मध्यस्थता कराने की कोशिश कर रहे हैं तो विजयवर्गीय के रसूख को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि वे कोई गलत बात कर रहे हैं।

अब अगले चरण की बात करें। इस सारे ताने-बाने की शुरूआत की तरफ जाएं। राज्य का सबसे बड़ा सैक्स स्कैंडल खुलने की शुरूआत वल्लभ भवन से हुई। बात जरा पुरानी है। उसका कालखंड जानना है तो वह तारीख निकाल लाइए, जब यह आदेश दिया गया था कि शाम साढ़े पांच बजे के बाद मंत्रालय में किसी भी पत्रकार को प्रवेश करने नहीं दिया जाएगा। दरअसल, ऐसा उन अफसरों की सहूलियत की खातिर किया गया, जो दिन भर काम निपटाने के बाद वल्लभ भवन के अपने कक्ष में ही ‘थकान उतारने’ लगे थे। इन्हीं दिनों कुछ ऐसा हुआ कि एक अफसर का थकान उतारने का वीडियो वायरल हो गया। मामला भारतीय प्रशासनिक सेवा वाले बड़े बाबुओं का था। लिहाजा इस बिरादरी के सबसे बड़े चेहरे ने इस अफसर को जमकर लताड़ लगायी। लेकिन मातहत भी कच्चा खिलाड़ी नहीं था। उसने अपने आला अफसर को बता दिया कि वह दोनों एक ही हमाम में कपड़ो से वीतराग के लिहाज से एक जैसे ही हैं। अब बातचीत आगे बढ़ी तो समझ आ गया कि हनी का ट्रैप वल्लभ भवन के कई कमरों में करामात दिखा चुका है। यह भी सामने आ गया कि मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों और दर्जनों विधायक भी इस मधुमक्खी के डंक का दंश झेल रहे हैं। इस तरह जब यह साफ हो गया कि बड़ी संख्या में ‘अपने वाले’ ही ‘बेचारों’ की श्रेणी में आ चुके हैं तो फिर इस डंक का इलाज ढूंढने की कवायद शुरू की गयी। पुलिस कमिश्नर प्रणाली को लेकर आमने-सामने आए प्रशासनिक और पुलिस सेवा के दिग्गजों को इस मामले ने एक कर दिया। फंसे हुए में दोनों की बिरादरी के लोग जो थे।

इसके बाद हुआ यह कि जो शिकार हो चुके थे, उन्होंने अपने शिकारियों की जो जानकारी दी, उसके बाद करीब दो महीने तक तमाम नेताओं, अफसरों और ब्लैकमेलिंग के संदिग्धों के फोन कॉल रिकॉर्ड किये गये। इसमें एटीएस की मदद ली गयी। जल्दी ही समझ आ गया कि तमाम दिग्गजों में इंदौर में हरभजन सिंह सबसे कमजोर कड़ी हैं। आला अफसर ने इंदौर का रुख किया। मामला उस सिंह का था, जो इस आला अफसर के वहां कलेक्टर रहते हुए उनके खासे मुंह लगे थे। तीन दिन में आला अफसर ने सिंह को उसकी सुरक्षा का गणित दिया। मामला जेहादी हमले जैसा जुनून भरने वाला था। तरकीब कामयाब रही। अफसर भोपाल लौटे और उसी शाम सिंह ने इंदौर में खुद को ब्लैकमेल किए जाने की एफआईआर दर्ज करवा दी। भले ही जाल बुनकर आरती दयाल और मोनिका यादव को इंदौर में पकड़ा गया लेकिन बाकी शिकारी भी साथ में ही उठा लिए गए। हां, एक संदेह और व्यक्त कर दें। ऐसा होने से पहले उन तमाम अफसरान और नेताओं की अश्लील क्लिपिंग्स और वीडियो नष्ट किए जाने का संदेह हैं, जिन्हें बचाया जाना है। यानी अब जो होता दिख रहा है, वह यह कि मामले में पत्रकारों के पंचामृत सहित उन विषकन्याओं की मुसीबत बढ़ सकती है, जिन्होंने मिल-जुलकर इस कांड को कड़ी दर कड़ी अंजाम दिया और करोड़ों के वारे-न्यारे कर लिए। क्योंकि सारे के सारे हमाम वाले अपना-अपना चेहरा बचाने तथा ब्लैकमेलिंग की अपनी-अपनी खुन्नस निकालने के लिए इनके खिलाफ लामबंद हो चुके हैं। मामले बेहद प्रभावशाली लोगों के है, इसलिए यह लामबंदी कामयाब होने के पूरे आसार हैं। इस मामले में एसआईटी के गठन में जिस तरह की दुविधा सरकार ने दिखाई, वो भी कई संदेहों को जन्म दे रही है।

बहुत मजे की बात यह कि सत्तारूढ़ दल के एक ऐसे वरिष्ठ नेता इस मामले में मुखर हो उठे हैं, जो खुद भी इस तरह के हनीट्रैप के जीवन भर के लिए शिकार बने। बाकियों की बोलती बंद है। मौन में बहुत ताकत होती है। यह ताकत फिलहाल उस गैंग को उलझाने के लिए खर्च की जा रही है, जिसमें ऊपर बताये गये पांच पत्रकारों सहित टीवी चैनल्स की कुछ खलनायिकाएं भी शामिल थीं। इन सभी के बीच खलबली मची है, क्योंकि जाल बिछाने में जिनकी सेवाएं ली गयीं, वे सभी विषकन्याएं पुलिस के सामने इनका कच्चा चिट्ठा खोल चुकी हैं। यहां हम बता दें कि ब्लैकमेलिंग के स्तंभ को जिस प्रतिष्ठान में सहारा दिया गया, मामले की एक आरोपी के किसी समय वहां मजबूती से तार जुड़े थे। इसी तरह से पत्रकारों और इन महिलाओं के बीच नैक्सस बना तथा लगातार मजबूत होता चला गया। परिणाम सामने है। राज्य की तमाम रसूखदार चेहरों पर दाग नजर आने लगे हैं। बहुत बुरा यह कि वल्लभ भवन के गलियारे अब इतने अपवित्र कर दिये गये हैं कि इस भवन के दोष निवारण की कोई सूरत अब नजर नहीं आ रही है।

सवाल यह है भी है कि ‘शिकार’ करने के अपराधी तो सामने आते जा रहे हैं लेकिन जो ‘शिकार’ हुए, उन पर क्या कम सवाल हैं? आखिर राजीखुशी से ‘हनी के ट्रेप’ में आने के पहले ‘हनी को ट्रेप करने’ की कीमतें भी तो चुकाई गई हैं। करोड़ों के ठेके, टैंडर, एनजीओ को पैसा, यह सब पैसा क्या इनके बाप का था, आखिर जनता की गाड़ी कमाई को अपनी एैयाशी पर लुटाने वालों की कोई सजा तो तय होना ही चाहिए। अब जिस तरह इंदौर में हरभजन सिंह को जिस आधार पर निलंबित किया गया है, क्या वो आधार कोर्ट में चल पाएगा। और अगर पीडी मीणा को सिर्फ लूप लाइन में डाला गया तो हरभजन को निलंबित करने में दौहरा मापदंड किसलिए? जांच तो इस बात की भी होनी चाहिए कि अब तक हरभजन सिंह ने ब्लेक मैल की कीमत के तौर पर जो पैसा ब्लेकमैलर को चुकाया या जो फायदे पहुंचाएं, वो पैसा सरकारी वेतन पर चुकाने की उसकी क्षमता थी क्या? नहीं थी तो जांच होना चाहिए कि यह पैसा उसने या ब्लेकमैल हो रहे तमाम लोगों ने कैसे कमाया? कुल मिलाकर धोखा और ज्यादती सिर्फ जनता के साथ हो रही है। और क्या ताज्जुब हैं कि हम सिर्फ तमाशा देखने के लिए अभिशप्त हैं।

हनी के ट्रैप में पत्रकारिता भी!

कांदा (प्याज) और फंदा (यहां हनी ट्रैप के संदर्भ में) कोई तालमेल नहीं है लेकिन एक विचित्र संयोग है। प्याज लगातार महंगी हो रही है। परत दर परत खुलने वाली इस खाद्य सामग्री की कीमत आसमान छूने लगी है। इधर हनी ट्रैप वाला फंदा भी लगातार भारी-भरकम कीमत वाले खेल के तौर पर सामने आ रहा है। परत-दर-परत नये-नये नाम (अघोषित रूप से) सामने आ रहे हैं। अभी किसी छिलके पर किसी राजनेता की तस्वीर दिख रही है तो कहीं कोई अफसर भी नजर आ जा रहा है। लेकिन एक छिलके में कोशिकाओं की तरह छिपी उन असंख्य तस्वीरों का सामने आना अभी बाकी है, जो इस सारे घटनाक्रम की जड़ हैं। जिनका सहारा लेकर इस घिनौने काम को बीते लम्बे समय से अंजाम दिया जा रहा था। किस्सा हनी-मनी कांड में मीडिया खासकर टीवी मीडिया की भूमिका का है।

बात शुरू से शुरू करते हैं। कहानी को कुछ ऐसे समझें। इस काम को सहारा देने का समय तब आया, जब कई मीडिया हाउस भयावह मंदी की चपेट में आ गए हैं। कुछ एक रीजनल टीवी चैनल तो अपने मालिकों के पापों को पिछले लंबे समय से भोग रहे हैं। यहां तक कि मनु वादी कहे जाने वाले मीडिया समूह के कर्मचारियों तक को तो इसलिए ही लंबे समय से वेतन के लाले हैं। घोर संकट का समय। दूसरी जगह नौकरी मिलने की संभावनाएं भी कम थी। तब प्रिंट मीडिया की पीत पत्रकारिता को मात देने वाले ये हनी-मनी टाईप के ट्रेप की कोमल सी कठोर आकांक्षाए रची गई जिसके तार दिल्ली तक जुड़ गए। योजनाबद्ध तरीके से ब्लैकमेलिंग के ताने बाने रचे गए। मीडिया से जुड़ी आधी आबादी के अति महत्वाकांक्षी कुछ हिस्से का इसमें चतुराई से उपयोग किया गया। अलग-अलग समूहों में कुछ लोगों की फौज मछली के चारे के तौर पर तैयार की गयी। इनमें उन तितलियों को सहारा लिया गया जो कम समय में बड़ा नाम ना सही दौलत बनाने सरकारी लाभ कमाने की ख्वाहिशमंद थी, जो केवल ग्लैमर के लालकालीन पर अपने पैर बढाती मीडिया इंडस्ट्री में आई थीं। रात के अंधेरे में जो करना है, उसकी भूमिका सुबह की रोशनी में बनायी जाती। टारगेट पहले से ही तय रहते। महिला पत्रकार उनके पास बाइट लेने के नाम पर पहुंचतीं। यह औपचारिकता पूरी करने के बाद क्वालिटी समय बिताने की बात छेड़ी जाती। शाम ढले किसी खास जगह पर, किसी छिपे हुए कैमरे के सामने मामला शराब से शबाब के सेवन तक पहुंचता। इसके बाद ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू किया जाता। भोपाल/इंदौर तक नये शिकार की तलाश में जुट जाते। पुराने शिकार से डील करने का काम दिल्ली के स्तर पर होता। इसके बाद होने वाली हिस्सा-बांट की व्यापकता इस बात से समझी जा सकती है कि कई मीडिया हाउस में असंख्य कर्मचारी लम्बे समय से तन्ख्वाह न मिलने के बावजूद एक दिन के लिए भी आर्थिक तंगी के शिकार नहीं हो पाये। बल्कि उनके संसाधन ऐसे तमाम पत्रकारों से कई गुना ज्यादा बेहतर हैं, जो नियमित रूप से वेतन पाने के बावजूद आर्थिक संतुष्टि की परिधि से कोसो दूर हैं।

मामला बेहद संजीदा होता जा रहा है। लिहाजा कुछ पल के लिए माहौल हलका कर देते हैं। ‘अनुरोध’ फिल्म का एक गीत है, ‘तुम बे-सहारा हो तो, किसी का सहारा बनो…’ तो यहां भी ऐसा ही हुआ। बे-सहारा और सहारा का ऐसा घालमेल बना, जिसने कि पीत पत्रकारिता को भी कई सदियों पीछे धकेल दिया। यह प्रीत पत्रकारिता बन गयी। प्रीत, पैसे के लिए। संसाधनों के लिए। प्रीत के जरिये लोगों को फंसाया गया और फिर ‘भय बिन होय न प्रीत…’ की तर्ज पर भयग्रस्त लोगों से इस प्रीत की तगड़ी कीमत वसूली गयी। इस कांड के नाम पर आपको अखबार तथा सोशल मीडिया पर जिन महिलाओं की तस्वीरें दिख रही हैं, वो तो महज मुखौटा हैं। कठपुतली हैं। जिनकी डोर कई अन्य लोगों के हाथ में थी। जबकि मुख्य डोर दिल्ली से खींची जाती रही।

तीन दशक से अधिक की पत्रकारिता में मैंने पीत पत्रकारिता के कई अध्याय देखे हैं। तब ऐसा करने वालों पर क्रोध आता था। आज उन पर दया आ रही है। क्योंकि वे सार्वजनिक रूप से ऐसा करने के लिए बदनाम थे। पढ़ने-लिखने वाले मीडिया के बीच वे शर्मिंदगी के भाव से घिरे नजर आते थे। लेकिन हनी ट्रैपनुमा पत्रकारिता वाले तो इस पेशे के रसूखदार लोगों में गिने जाते रहे हैं। पद, प्रतिष्ठा और सम्मान की उन्हें कभी भी कमी नहीं आयी। यहां तक कि इस घटनाक्रम का खुलासा होने के चार दिन बाद भी पुलिस तथा कानून के हाथ उन तक नहीं पहुंच सके हैं। यह हमारे सिस्टम की कमजोरी तो नहीं, मजबूरी जरूर हो सकती है।क्योंकि इतना बड़ा माफिया भारी-भरकम बैकिंग के बगैर कतई संचालित नहीं किया जा सकता। तो अब इंतजार इस बात का है कि इस सबको पीछे से मिल रहा सहारा कब हटे और कब असली गुनाहगारों का चेहरा सामने लाया जाएगा। फंदे में बड़े भारी भरकम लोग हैं, इसलिए संभावना कम है।

मामले की गंभीरता एक खयाल से और बढ़ जाती है। जो शिकार बने, वे सभी सरकारी तंत्र के असरकारी नाम बताये जा रहे हैं। जाहिर-सी बात है कि ब्लैकमेलर्स ने इन लोगों से उनके पद का दुरूपयोग भी करवाया होगा। कहा जा रहा है कि कई वरिष्ठ अफसरों सहित सत्तारूढ़ दल और प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा के जन प्रतिनिधि भी बड़ी संख्या में इस सबके मजे से शिकार हुए हैं। तो क्या यह नहीं पता लगाया जाना चाहिए कि इन सभी ने मायाजाल से बाहर निकलने के लिए किस-किस तरह के गलत कामों को अंजाम दिया होगा। यह जांच हुई तो निश्चित ही यह भी पता चल जाएगा कि ऐसे गुनाहगारों को सहारा प्रदान करने वालों ने गलत तरीके से सरकारी काम करवाने का ठेका भी ले रखा था। देर-सबेर यह सच सामने आकर रहेगा। नाम चाहे सार्वजनिक न हो पाएं। डर है कि पहले ही किसी पतित-पावन को तरस रही पत्रकारिता के दामन पर इसके बाद और कितने दाग नजर आने लगेंगे। इस सबकी इबारत उसी दिन लिख दी गयी थी, जब पत्रकारिता को ग्लैमर से जोड़ने का महा-गुनाह किया गया। ऐसा पाप करने वालों की फौज अब गुजरे कल की बात हो चुकी है, लेकिन उनके द्वारा रोपा गया विषवृक्ष का बीज आज इस पूरी बिरादरी में भयावह प्रदूषित हवा का संचार कर रहा है। यह हवा दमघोंटू है। इससे बचने के लिए नई खिड़कियां खोलने की संभावनाएं कोई और नहीं मीडिया में ही लोगों को तलाशनी होगी। प्रिंट मीडिया तक तो विश्वसनीयता बाकी थी लेकिन इलेक्ट्रानिक, डिजीटल और सोशल मीडिया के दौर में पत्रकारिता की आत्मा ‘विश्वसनीयता’ घायल पड़ी हुई है। इसलिए खबरें बेअसर हो रही हैं। ताजी हवा का यह प्रसार पत्रकारिता के मूल्यों की दोबारा स्थापना से ही संभव हो सकेगा। माना कि यह बहुत दुश्वारी वाला काम है, लेकिन इस पेशे में सिर उठाकर चलने का दौर वापस लाने के लिए इस कड़ी मेहनत के अलावा और कोई चारा बाकी नहीं रह गया है। तो जो ये दमघोंटू माहौल है, इससे बाहर आने खिड़की खोलिए…..रोशनी आएगी तो चेहरे भी साफ साफ दिखाई देंगे…..और डिओडरेंट की खुशबूओँ में छिपाई गई दुर्गन्ध भी बाहर होगी…..

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