इतनी बड़ी रैली मैंने दिल्ली में ढाई दशक में नहीं देखी है

प्रकाश के रे-

इतनी बड़ी रैली मैंने दिल्ली में ढाई दशक में नहीं देखी है. छिटपुट मामूली झड़पों के अलावा शांतिपूर्ण शक्ति प्रदर्शन भी ऐसा नहीं देखा. धरतीपुत्रों का यह आंदोलन हर दृष्टिकोण से ऐतिहासिक है. यह प्रेरणादायी है, आशाओं व आकांक्षाओं को बल देनेवाला है. किसान आंदोलन ज़िंदाबाद…

सत्येंद्र पीएस-

सत्ता के दलालों को लग रहा है कि ट्रैक्टर से बसें धकेलना, ट्रैक्टर दौड़ाना, बैरिकेड में टक्कर मारना कोई अनोखी घटना है।

लेकिन मैंने हर किसान आंदोलन में यह सब देखा है। बोल्डर हटाने के लिए भी किसान ट्रैक्टर से धक्का देते हैं। यूपी पुलिस वाले तो रोकने के लिए कई कई कुंतल के बोल्डर डाल देते हैं क्रेन से उठवाकर, उनको पता रहता है कि लोहा बांस बल्ली की बैरिकेटिंग का कोई मतलब ही नहीं है किसानों के लिए। बोल्डर हटाना, बैरिकेड में धक्के मारना किसानों के मनोरंजन टाइप है।

भगत सिंह सुखदेव, राजगुरु, गया प्रसाद कटियार, चन्द्रशेखर आजाद की टीम ने अंग्रेजों के शासन में संसद में बम फोड़ा था और कहा कि मेरा इरादा हिंसा नहीं, बहरों को आवाज सुनाना है।

किसानों ने अभी कुछ नहीं किया है। पुलिस ने 5 बजे तक का टाइम दिया था। वह तो अपने साथियों का शव लेकर भी करीब 6 बजते बजते लौट गए। वो केवल वाहन आने के इंतजार में एक घण्टे लेट हुए।

आज अगर कोई किसान इन बहरे लोगों को आवाज सुनाने के लिए संसद में बम फोड़ दे तो क्या कहेंगे? देश में ऐसे हालात क्यों पैदा किए जा रहे हैं? सरकार किसका हित चाहती है?

सलीम अख़्तर सिद्दीक़ी-

सुबह जब आईटीओ पर किसानों और पुलिस के बीच झड़प हो रही थी, तब ही ये कहा जाने लगा था कि किसान लाल किला जा सकते हैं। लेकिन कोई सुरक्षा नहीं बढ़ाई गई, बल्कि ऐसा लगता है, जैसे पूरा मौका दिया गया कि आओ, जो करना है कर लो। मौक़ा दिया क्यों भी नहीं जाता जब झंडा उनके ही आदमियों को फहराना था?

आखिर भाजपा सरकारें सुरक्षा के मामले में ढीली क्यों है? उरी, पठानकोट और पुलवामा हमला ढीलेपन की तस्दीक करती है। गलवां में चीन घुस आया, अरुणाचल प्रदेश में चीन ने गांव ही बसा लिया।

थोड़ा और पीछे जाएं तो 1999 में वाजपेयी सरकार में आतंकवादी हवाई जहाज़ का अपहरण करके कंधार ले जाते हैं। बदले में सरकार मो खूंखार आतंकवादी छोड़ने पड़ते हैं। देश की संसद पर हमला भी वाजपई सरकार के दौर में होता है तो कारगिल भी किया जाता है।

पंकज मिश्रा-

सौ की सीधी बात यह है कि फार्म बिल्स का विरोध किसान इसलिए कर रहे है कि वो genuinely यह समझ रहे है कि यह बिल उनकी खेती खतम कर देंगे | यह नेताओं द्वारा संगठित आंदोलन नही है यह किसानों के लिए जीवन मरण का प्रश्न है वरना सब कुछ सहते हुए , जान देते हुए भी बिल्कुल अहिंसात्मक तरीके से किसान महीनों महीनों डटे नही रहते | यह आंदोलन लॉलीपॉप और दमन से खत्म नही होने वाला है | जो नेता इनकी मूल मांगो से समझौता करेगा उसकी नेतागिरी खतम हो जाएगी |

यह भी सच है कि आंदोलनरत किसान , मजदूरों की तरह hand to mouth नही है | यह आंदोलन को sustain कराने की position में है , इन्हें जनसमर्थन भी हासिल है जो इसके sustenance के लिए अनिवार्य भी है | किसान एक संगठित राजनीतिक शक्ति भी है वरना अकाली दल सरकार से बाहर न होता |

इतने महीनों तक बिल्कुल अहिंसात्मक रहते हुए , देशद्रोही , गद्दार , शराबी , आतंकी , खालिस्तानी और भी न जाने कितनी गालियां सुनते हुए , कल्पनातीत संयम और सब्र के बाद आज इन्हें एक रैली का मौका मिला | इसमें जो भी हुआ , इससे बहुत ज्यादा हिंसा की आशंका थी परंतु जितनी हिंसा की चर्चा हो रही है वह इस आंदोलन की व्यापकता और विराट रूप देखते हुए नगण्य है |

यदि अनुपातिक अध्ययन किया जाए तो , मंदिर आंदोलन , आरक्षण विरोधी आंदोलन से तुलना कर के देख ले | तमाम कालेजों और विश्वविद्यालयों में हजार दो हजार के छात्रों के प्रदर्शन को देखिये जिसमे पुलिस हॉस्टलों में रात में घुस घुस कर बेरहमी से छात्रों को पीटती है , छात्र हॉस्टल छोड़ के भागे रहते है और दिन में अनेक ट्रक , बसें जलाई गई होती है , कितने दफ्तरों में तोड़ फोड़ हुई रहती है |

यहाँ तो हजार दो हजार पांच हजार लोग नही , लाखो की संख्या में तो ट्रैक्टर्स ही थे , कारें , बाइक्स , पैदल , लाखो लाख लोग थे | यदि यह आन्दोलन सचमुच हिंसात्मक होता तो पता नही आज क्या अघटित घटा होता | आज चंद एक बसों को छोड़कर और कहीं तोड़ फोड़ नही दिखी , बसें भी वो जिन्हें ट्रांसपोर्ट के बजाय बैरिकेड्स बनाया गया जो खुद में सार्वजनिक संपत्ति का दुरुपयोग है |

पब्लिक को तो फूल बरसाते , स्वागत करते और किसानों से एकजुटता दिखाते देखा गया , आम जन से तो कहीं कोई टकराव न हुआ उनसे कहीं कोई हिंसा न हुई , एक भी दुकान या मकान को टच तक नही किया गया | यह बताता है कि आंदोलन सारतः हिंसक नही था |

आपवादिक हिंसा को प्रातिनिधिक बताना नीयतन की जा रही शरारत है | यह आंदोलन को बदनाम करने के लिए है |

सच यह है कि पुलिस और आंदोलनकारी दोनों ने सब्र से काम लिया है , सरकार ने एक हद तक विवेक से काम लिया और आंदोलनकारियों ने भी | आंदोलन के नेतागण अवश्य अपनी भूमिका में चूकते दिखे ….

जहां तक लालकिले के झंडे की बात है तो वह बात नही बतंगड़ है | चूंकि झंडे के सवाल को आसानी से भावनात्मक tilt दिया जा सकता है लिहाज़ा राई का पहाड़ बनाया जा रहा है | जिस लाल किले की देख भाल यह सरकार नही कर पा रही , वहां एक झंडे लग जाने से भावुक होना कैसे हजम हो सकता है | जब गणतंत्र दिवस की परेड में धार्मिक झाकी चल सकती है वो भी उंस दिन जिस दिन सम्विधान लागू हुआ , वह सम्विधान जो सेकुलर है , उसके लेटर और स्पिरिट दोनों की धज्जियां उड़ाते हुए ऐसे में झंडे को लेकर बवेला जबरदस्ती खड़ा किया बवेला है |

आंदोलन तो राजनीतिक है लिहाजा समझौते में जो गतिरोध के बिंदु है , विमर्श के केंद्र में वह होना चाहिए यानी जो ठोस राजनीतिक प्रश्न है और जिसका समाधान भी ठोस राजनीतिक होगा , भावनात्मक नही ….

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