संजय सिन्हा के प्रमोशन से टीवी टुडे ग्रुप के किस साथी को दर्द हो गया…

संजय सिन्हा

Sanjay Sinha

मेरे साथी का दर्द…. पिछले दिनों ऑफिस में मेरा प्रमोशन हो गया। हालांकि मेरे पद का नाम कार्यकारी संपादक पहले से है और कुछ साल पहले तक पत्रकारिता की दुनिया में इसके ऊपर किसी प्रमोशन की गुंजाइश नहीं होती थी। जब मैं जनसत्ता में उप संपादक बना था, तभी मुझे बता दिया गया था कि संपादक बन पाना असंभव होता है। तब किसी अखबार, किसी न्यूज़ चैनल में एक ही संपादक होता था।

पहले जनसत्ता में प्रभाष जोशी जी संपादक थे, और जब कभी-कभी वो हमसे हमारा हाल-चाल पूछ लेते थे, तो लगता था कि कितनी बड़ी बात हो गई। बाद में जनसत्ता के कई एडिशन खुल गए – चंडीगढ़, मुंबई और कोलकाता। तब प्रभाष जोशी जी के पद का नाम प्रधान संपादक हो गया और हर एडिशन में एक-एक स्थानीय संपादक हो गए। दिल्ली में बनवारी जी के नाम के आगे स्थानीय संपादक लिखा जाने लगा।

संजय सिन्हा आपको इतनी कहानी इसलिए सुना रहे हैं क्योंकि वो चाहते हैं कि जो लोग पत्रकारिता की दुनिया से नहीं जुड़े, वो भी इस व्यवस्था के भीतर पद और कद की महिमा को समझ लें, क्योंकि मेरी कहानी आज पद और कद से जुड़ी हुई है। प्रभाष जोशी जी के बाद जनसत्ता में कोई प्रधान संपादक नहीं बना। उसके बाद सबसे बड़े पद का नाम हो गया कार्यकारी संपादक। मतलब कार्यकारी संपादक ही किसी अखबार या टीवी न्यूज़ चैनल में सबसे बड़ा पद हो गया।

मैं चार साल पहले कार्यकारी संपादक बन गया था। अपनी समझ में मैं सबसे बड़ी पोस्ट पर पहुंच गया था। वो मेरे जीवन का सबसे संतोष जनक दिन था, सबसे खुशी का दिन था जब मुझे चिट्ठी मिली थी कि संजय सिन्हा, आप कार्यकारी संपादक बन गए हैं। हालांकि मुझे जब-जब प्रमोशन मिला, मैं बहुत खुश हुआ।

अब बहुत से न्यूज़ चैनल हो गए हैं, लोगों की जल्दी-जल्दी तरक्की होने लगी है तो कई नए पद भी बना दिए गए हैं। मेरे लिए कार्यकारी संपादक मतलब मैं सबसे बड़ी पोस्ट पर पहुंच गया। पर पिछले दिनों मेरा प्रमोशन हो गया। मुझे वरिष्ठ कार्यकारी संपादक बना दिया गया। सोचिए, कोई कितना खुश होगा। आगे से भी आगे।

मेरे साथ दूसरे विभाग में भी कुछ साथियों को प्रमोशन मिला। मैंने प्रमोशन पाए एक साथी को बधाई दी। पर वो खुश नहीं थे। उन्होंने कहा संजय जी, इससे क्या होता है? आप इतने पर उछल रहे हैं, फलां को देखिए वो क्या बन गया है? आप अपनी सैलरी पर कूद रहे हैं, उसके बारे में पता कीजिए, उसकी सैलरी कितनी बढ़ गई है। मैं हैरान था। जिस प्रमोशन पर आदमी को इतराना चाहिए, उस पर मेरा साथी दुखी हो रहा था। जिस प्रमोशन को पाकर मैंने मन ही मन न जाने कितनी बार अपने वरिष्ठों को नमन किया, उसे पाकर भी मेरा साथी उदास है?

मैंने अपने पुराने सभी सहयोगियों को, जिनके सानिध्य में मैंने कभी काम किया है, दिल से शुक्रिया कहा कि आपने मुझे इस लायक बनाया कि मैं इस पद तक पहुंचा, उस पर मेरा साथी वियोग कर रहा है? मैंने अपने साथी से कहा कि मन ही मन याद कीजिए, आपके साथ करीयर शुरू करने वाले या आपके कई सीनियर में से भी कितने लोग इस पद तक पहुंच पाए? कई तो असिस्टेंट एडिटर से ऊपर भी नहीं पहुंच पाए। फिर भी आप दुखी हैं? आपको तो जश्न मनाना चाहिए। खुश होना चाहिए।

पर मेरे साथी दुखी ही रहे। कहने लगे फलां की सैलरी इतनी बढ़ी है। फलां को वो सुविधा मिली है। मैंने अपने साथी को बहुत समझाने की कोशिश की। उन्हें बताने की कोशिश की कि अपनी असफलता और सफलता कुछ भी नहीं। आगे बढ़ना और नहीं बढ़ना भी कुछ भी नहीं। असली बात है खुशी को जीना। अगर आप जिंदगी के जश्न नहीं मनाएंगे, तो हर कामयाबी आपको दुख ही देगी। ज़िंदगी पानी का बुलबुला है। बुलबुला जितनी देर हवा में उड़ता है, खुशी से उन पलों को जी लेना चाहिए।

मैंने अपने साथी को बताया कि जब मैं उप संपादक था, कुछ हज़ार रुपए की सैलरी मिलती थी, तब भी मेरी ज़िंदगी शानदार थी। आज जब वरिष्ठ कार्यकारी संपादक बन गया हूं और लाखों रूपए की सैलरी है, तब भी ज़िंदगी बहुत शानदार है। मैंने अपने साथी को याद दिलाया कि आप जब उप संपादक थे, तब भी दुखी थे। आज भी दुखी हैं। खुशी अपने मन के भाव की उपलब्धि से आती है। जो दूसरों की उपलब्धियों में झांकते हैं, वो कभी खुश नहीं रहते।
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ऑन द स्क्रीन… कल मैंने आपको कहानी सुनाई कि ऑफिस में मेरा प्रमोशन हो गया, मेरी सैलरी बढ़ गई, मैं बहुत खुश हो गया। मैंने ये भी बताया कि मेरे एक साथी का भी प्रमोशन हुआ, लेकिन वो खुश नहीं हुआ। वो अपने प्रमोशन का जश्न नहीं मना पाया क्योंकि वो दूसरों के प्रमोशन और उनकी सैलरी में झांकता रह गया। कल बहुत से लोगों ने मेरे पास संदेश भेज कर मुझसे अनुरोध किया कि मैं कुछ पत्रकारीय जीवन के विषय में लिखूं। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि संजय सिन्हा, आप राजनीति पर लिखिए। मैं बहुत देर तक सोचता रहा।

मां रोज़ खाना बनाती थी। वो पिताजी से कभी-कभी पूछती भी थी कि आज आप क्या खाएंगे, तो पिताजी यही कहते थे कि आप जो बना देंगी। पिताजी की पंसद मां के हाथों में छिपी थी। चावल, दाल और सब्जी में नहीं। मुझे भी यही लगता रहा कि मैं जो लिखता हूं, आप उसे पसंद करते हैं। असल में मैं सोच कर नहीं लिख सकता। सोच कर लिखने वाले लोग व्यावसायिक होते हैं। उन्हें कहा जाता है कि आपको इस विषय पर लिखना है, आपको ये कहानी लिखनी है, वो उसी पर लिखते हैं। मैं वही लिखता हूं, जो सुबह मेरे मन में आता है। कई बार मैं ये भी कह चुका हूं कि मैं तो लिखता ही नहीं, कोई मुझसे लिखवाता है।

खैर, राजनीति पर मैं नहीं लिखता क्योंकि मैं खुद को राजनैतिक निष्ठा से दूर रखना चाहता हूं। जिस दिन राजनीति करनी होगी, डंके की चोट पर नौकरी छोड़ कर राजनीति करने उतरूंगा। हालांकि मेरे जैसों के लिए ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है। जितनी मोटी चमड़ी इस ‘धंधे’ के लिए होनी चाहिए, मेरे पास चमड़ी उतनी मोटी नहीं है। पत्रकारिता में ऐसा नहीं है। आप खुद को बचा सकते हैं।

मुझे पत्रकारिता करते हुए तीस साल हो चुके हैं। इन तीस वर्षों में मुझे जब-जब कहीं कुछ ऐसा लगा कि ये मैं नहीं कर सकता हूं तो मैं वहां से मुड़ गया। मसलन, मैं जब ज़ी न्यूज़ में रिपोर्टिंग करता था, एक शाम सोनिया गांधी से मिलने गया तो उनके सेक्रेट्री ने मुझसे कहा कि मैडम कहीं बाहर गई हैं। पर जैसे ही मैं वापस लौटने के लिए मुड़ा एक महिला पत्रकार से उन्हीं सज्जन ने कहा कि मैडम भीतर हैं, आप चलिए। मैं ऑफिस आया और मैंने अपने संपादक से कहा कि मैं अब रिपोर्टिंग नहीं करना चाहता। मुझे डेस्क का काम दे दीजिए। उन्होंने बहुत पूछा, कहा कि लोग तो रिपोर्टर बनने के लिए तरसते हैं और तुम….?

मैंने इतना ही कहा था कि भविष्य में रिपोर्टिंग हम जैसे लोग नहीं कर पाएंगे। दिल्ली में रह कर राजनैतिक रिपोर्टिंग का दर्द मैं महसूस कर रहा था। मैं देख रहा था कि हम जैसे लोग आने वाले दिनों में सिर्फ बाइट कलेक्टर बन कर रह जाने वाले हैं, या फिर किसी की मंशा के गुलाम। मैं डेस्क के काम में लग गया। खुद रिपोर्टिंग करने की जगह मैंने लोगों के लिखे को ठीक करना शुरू कर दिया।

खैर, मेरी कहानी आपने सुनी है। पिछले दिनों भोपाल के मेरे साथी ब्रजेश राजपूत ने एक पुस्तक मेरे पास भेजी। पुस्तक का नाम है-ऑफ द स्क्रीन ‘टीवी रिपोर्टिंग की कहानियां’। ब्रजेश भोपाल में एबीपी न्यूज़ के साथ जुड़े हैं और रिपोर्टिंग करते हैं। उनके पास रिपोर्टिंग का बहुत लंबा अनुभव है। उनकी जो रिपोर्ट टीवी पर आ जाती है, वो तो सबके सामने है, पर जो रिपोर्ट नहीं आ पाती, उसे उन्होंने किताब में पिरो दिया है। मैंने पूरी पुस्तक एक सांस में पढ़ ली।

पुस्तक एक पत्रकार की गैर सिलसिलेवार डायरी है। कई बार सत्ता से टकराव की कहानी है तो कई बार सत्ता से दुलार की भी कहानी है। ब्रजेश कहानीकार नही हैं, न लेखक। वो खांटी पत्रकार हैं। उनके लिखे को पढ़ कर कई बार मन किया कि माइक उठाऊं, खुद वीओ (वायस ओवर) करूं और टीवी पर रिपोर्ट चला दूं।

इस पुस्तक में ब्रजेश ने सिर्फ नेताओं से मुलाकात की कहानियां नहीं लिखीं, बल्कि भूत और मौत से मुलाकात की कहानियां भी लिखी हैं। एक रिपोर्टर को सबसे मिलना होता है। जिन लोगों को टीवी न्यूज़ को देख कर कोफ्त होती है कि क्या बेवकूफी भरी खबरें दिखलाते हैं, ब्रजेश उन्हें आसानी से बता देते हैं कि कैसे टीवी में नॉन न्यूज़ भी न्यूज़ होती है।

कुल मिला कर ये हमारे संसार की कहानी है। वो कहानियां जो अनकही रह जाती हैं। मैंने समय-समय पर पत्रकारिता में अपनी दुविधा की कई कहानियां यहां फेसबुक पर लिखी हैं। मैं कई बार चाहता हूं कि आपको अपने अनुभव की ढेरों कहानियां सुनाऊं, पर कहा न लिखने वाला मैं कोई हूं ही नहीं। पर इतना तय है कि जब भी लिखूंगा, सच लिखूंगा, पूरा लिखूंगा।

फिलहाल तो ब्रजेश राजपूत बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने अपने ‘धंधे’ का सच उड़ेल कर रख दिया है किताब में। आप में से जो लोग पत्रकारिता के ‘ऑफ द स्क्रीन’ सच को जानना चाहते हैं, उन्हें ब्रजेश की किताब पढ़नी चाहिए। मेरे पास कुछ भी ऑफ द स्क्रीन नहीं है। मैंने ज़िंदगी में कभी उन बातों का दुख मनाया ही नहीं, जो छूट गया या मुझे नहीं मिला। मैं तो अपने लिए खुश रहने का नया बहाना हर रोज़ ढूढ लेता हूं और सब कुछ ऑन द स्क्रीन लेकर आपके सामने चला आता हूं।

टीवी टुडे ग्रुप में वरिष्ठ पद पर कार्यरत, फेसबुक के चर्चित लेखक और स्टोरी टेलर संजय सिन्हा की एफबी वॉल से साभार.

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