
संजय कुमार सिंह
युद्ध बढ़ने की खबरों के बीच आज अखबारों में गैर युद्ध की खबरें बहुत कम हैं। जो एक खबर सभी अखबारों में है वह है, उपचुनाव के नतीजे। केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी जिस तरह चुनाव लड़ती जीतती या हारती है उसमें भाजपा का चुनाव जीतना नहीं, हारना महत्वपूर्ण है। लेकिन प्रचारक मीडिया जीतने की खबर तो ठीक देता है हारने की खबर को छिपाने, दबाने, ढंकने या कमजोर करने के लिए तमाम जतन करता है और यह किसी एक व्यक्ति या नेता की चाहत नहीं होती है। हर किसी का प्रयास नजर आता है। आज भिन्न अखबारों के शीर्षक देखकर लग जाता है कि भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है और कुछ छिपाया जा रहा है। इसे समझने के लिए पहले कुछ शीर्षक देखिये –
1. इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अंदर होने की सूचना जरूर है और उसका शीर्षक है, उपचुनाव : आप ने गुजरात, पंजाब में सीटें बचाईं, कांग्रेस केरल में जीती। इसका मतलब यह भी है कि भाजपा केरल में भी हारी। हालांकि, केरल में उसके जीतने की संभावना कम थी इसलिए हारी खबर नहीं है और यह शीर्षक गलत नहीं है। पर इसमें यह छिपाया गया है कि आम आदमी पार्टी से विधानसभा की एक सीट छीनने की भाजपा की कोशिश का क्या हुआ। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भाजपा ने हर संभव कोशिशों से दिल्ली का विधानसभा चुनाव हाल में जीता था।
2. टाइम्स ऑफ इंडिया आम आदमी पार्टी ने गुजरात, पंजाब उपचुनाव में दो सीटें बचा लीं, भाजपा ने गुजरात में एक सीट बचाई, टीएमसी ने बंगाल में एक सीट बचाई। यह सामान्य शीर्षक है और सामान्य उपचुनाव के लिए ठीक हो सकता है। लेकिन गुजरात का एक उप चुनाव तो आम आदमी पार्टी के विधायक के दल बदल के कारण ही हुआ है। इसलिए यहां दल बदल कर आप विधायक ने जिस दल की शरण ली उसका हारना-जीतना महत्वपूर्ण है। यहां यह दल भाजपा है और वह हार गई है इसलिए शीर्षक में उसके हारने का उल्लेख नहीं है।
3. हिन्दुस्तान टाइम्स : उपचुनावों में आप को फायदा, कांग्रेस, भाजपा को सीटें मिलीं। इसमें आम आदमी पार्टी को लाभ हुआ और उसका जिक्र है तो सामान्य माना जा सकता है लेकिन भाजपा की कोशिशों के बावजूद आप ने गुजरात में अपनी सीट बचाई लिखने का अलग महत्व होता।
4. द हिन्दू : उपचुनाव की चार सीटें पार्टियों ने बचा ली; केरल में एलडीएफ कांग्रेस से एक सीट हारी। यहां भी भाजपा हारी उसका जिक्र नहीं है पर मुद्दा यही है कि उपचुनाव दल बदल के कारण हुआ और इसलिए भाजपा का हारना आप के जीतने से कम महत्वपूर्ण नहीं है।
5. दि एशियन एज : केरल में कांग्रेस के एक सीट जीतने से एलडीएफ को झटका।
6. द टेलीग्राफ : पंजाब, गुजरात में आम आदमी पार्टी जीती, सिंगल कॉलम की खबर है। बंगाल में टीएमसी की जीत हुई है लेकिन विजय मार्च के दौरान एक बम से 11 साल की बच्ची की मौत हो गई। इसलिये यह खबर दो कॉलम में है।
7. अमर उजाला : विधानसभा उपचुनाव पांच में दो सीटें आप, एक भाजपा को।
8. नवोदय टाइम्स : आप को लुधियाना समेत दो सीटें। केरल में कांग्रेस, बंगाल में तृणमूल, गुजरात में भाजपा को एक-एक सीट।
मुझे लगता है कि भाजपा के अलावा किसी भी पार्टी के हारने का उल्लेख शीर्षक में पर्याप्त होता है। आज भी पार्टी के जीतने और सीटें बचा लेने का उल्लेख तो है, पर छीनने की कोशिश में हारने का नहीं है। कुल पांच विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आये हैं। भाजपा को सिर्फ एक सीट मिली है और यह गुजरात की कड़ी सुरक्षित सीट है। यहां उसे सबसे ज्यादा 59.39 प्रतिशत वोट मिले हैं। लेकिन सब उपाय करके भी वह विसावदर की सीट नहीं जीत पाई और यह आप के पास ही रह गई। यहां उसे 55.15 प्रतिशत वोट मिले हैं। विसावदर सीट आम आदमी पार्टी के विधायक भूपत भायाणी के इस्तीफा देने और सत्तारूढ़ भाजपा में शामिल होने के बाद खाली हो गई थी। उन्होंने दिसंबर 2023 में आम आदमी पार्टी छोड़ी थी। आम आदमी पार्टी के गोपाल राय का कहना है कि बीजेपी ने विसावदर के निर्वाचित विधायक से इस्तीफ़ा दिलवा कर, डेढ़ साल तक उपचुनाव नहीं होने दिया था, जिससे वहाँ विकास का काम ठप रहा। उपचुनाव के लिए अरविन्द केजरीवाल ने विसावदर से अपने प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया को उम्मीदवार बनाया और बीजेपी को चुनौती दी कि गोपाल को खरीद कर दिखाए। जनता ने भी गोपाल इटालिया को ऐतिहासिक जीत दिलाई है। पार्टी के लिए लुधियाना की जीत भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा जिस तरह चुनाव लड़ती है उसमें प्रतिद्वंद्वी को हराने से महत्वपूर्ण होता है किसी तरह जीतना। उसमें अनिल मसीह जैसे अधिकारियों की भी भूमिका होती है। ऐसे में आप को समर्थन मिलना और उसके उम्मीदवार के जीतने से साबित हो गया कि जनता आप और उसके काम के साथ है। भाजपा को पहचान रही है। राज्य में अपने प्रभुत्व के बावजूद, भाजपा 2007 से विसावदर सीट नहीं जीत पाई है। पार्टी नेताओं को इस बार 18 साल के दुर्भाग्य से उबरने की उम्मीद थी। 2022 के पिछले विधानसभा चुनाव में आप के भूपत भायाणी ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हर्षद रिबादिया को 7,063 मतों से हराया था। इस बार भूपत भायाणी ही भाजपाई हो गये थे। पर उम्मीदवार किरीट पटेल थे और वो भी बड़े अंतर से हार गये। वैसे तो यह सीट आप के पास ही थी पर इसे जीतने के लिए ही भाजपा ने पूरा जोर लगाया फिर भी हार गई। इसलिए खबर और शीर्षक तो यही है। वैसे भी उपचुनावों मे सत्तारूढ़ दल का पलड़ा भारी माना जाना है, और डबल इंजन का मामला वैसे भी अलग है। यह अलग बात है कि इसीलिए आज ह तरह की खबर और शीर्षक है सिर्फ वह नहीं जो यहां है।
अखबारों ने यह जरूर लिखा है कि आप के सामने इस सीट को बचाने की चुनौती थी। यह नहीं लिखा है कि भाजपा की जीतने की कोशिश दांव पर थी। यही नहीं, यह भी कहा गया है कि दिल्ली की हार के बाद प्रतिष्ठा दांव पर थी जबकि तथ्य यह भी हो सकता है दिल्ली की हार जैसे हुई या भाजपा को जैसे मिली वैसे विसावदर में नहीं मिली, कोशिश करके भी, स्थितियां अनुकूल होने पर भी। इसलिए भाजपा की हार महत्वपूर्ण है। आम आदमी की सीट तो थी ही और चुनौती भी भाजपा ने ही दी थी। यह अलग बात है कि खबरों के अनुसार अरविन्द केजरीवाल ने गोपाल इटालिया को खरीद कर दिखाने की चुनौती भाजपा को दी थी। उल्लेखनीय है कि आम आदमी पार्टी ने उपचुनाव की घोषणा से पहले ही विसावदर सीट से उम्मीदवार की घोषणा कर दी थी। ऐसे में बीजेपी में उम्मीदवार को लेकर आखिर तक जद्दोजहद रही। नतीजा यह हुआ कि डबल इंजन के बाद भी बीजेपी चुनाव प्रचार में पिछड़ी रही। आम आदमी पार्टी के विधायक रहे भूपत भायाणी ने गुजरात विधानसभा की सदस्यता छोड़ने के साथ खुद को राष्ट्रवादी व्यक्ति बताया था और कहा था कि आम आदमी पार्टी राष्ट्रवादी नहीं है, इसलिए उन्होंने पार्टी और विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। भायाणी ने कहा था कि आगे का निर्णय वे कार्यकर्ताओं से पूछकर लेंगे। विधानसभा अध्यक्ष शंकर चौधरी को इस्तीफा देने के बाद भूपत भायाणी ने दावा किया था कि वह पहले से बीजेपी में हैं। इस्तीफा देने के बाद भाजपा में शामिल होंगे कि नहीं पूछने पर उन्होंने यह जवाब दिया था। एक खबर के अनुसार 2022 में बीजेपी से टिकट नहीं मिलने पर भूपत भायाणी आप से लड़े थे और फिर विसावदर से जीतकर विधायक बने थे। इससे पहले, एक्स पर उन्होंने लिखा था, “मैं मूर्ख नहीं हूं कि आप छोड़कर किसी दूसरी पार्टी में जाऊंगा”। इससे पहले न्यूजक्लिक ने एक्स पर लिखा था, भाजपा से ‘आप’ में आए, जीते, और फिर भाजपा की माला जपने लगे… हम बात कर रहे हैं गुजरात आम आदमी पार्टी के विधायक भूपत भयाणी की। जिनका तन तो आप में है, लेकिन मन भाजपा में ही है।
कहने की जरूरत नहीं है कि अगर यही भाजपा की राजनीति नहीं है तो उसका एक रूप जरूर है। भले अखबारों में इसकी छिटपुट चर्चा होती रही है लेकिन दलबदल से खाली हुई सीट पर सत्तारूढ़ पार्टी उपचुनाव नहीं जीते तो खबर यही है। भले सीट बचा लेना भी खबर है लेकिन डबल इंजन वाला सत्तारूढ़ दल अगर दलबदल करवाये या वैसी स्थितियां नजर आयें तो खबर यही है।


