
संजय कुमार सिंह
आज के मेरे सभी अखबारों में लीड कोलकाता की है। आंदोलनकारी डॉक्टर्स के दबाव में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोलकाता के पुलिस प्रमुख को हटाने के लिए तैयार हो गई हैं। आज मेरे सभी अखबारों में यही लीड है लेकिन अमर उजाला अपवाद है। उसपर आने से पहले बता दूं कि कोलकाता में एक डॉक्टर से बलात्कार और उसकी हत्या के बाद भाजपा की ओर से मामले को राजनीतिक रंग देने के प्रयास हुए और भाजपा के आंदोलन से लगभग अलग हो जाने या उसके शामिल होने की पोल खुल जाने के बाद भी सहयोगी डॉक्टर्स का आंदोलन जारी रहा। उनके लिए यह कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा का मामला था औऱ वही रहा। आंदोलन की जरूरत और उसकी उपयुक्ता के सवालों के बावजूद डॉक्टर अपनी मांग पर अड़े रहे और सुप्रीम कोर्ट की सलाह भी नहीं मानी। मेरा मानना रहा है कोलकाता का समाज हिन्दी पट्टी से अलग है और इस मामले में यह दिखता रहा है। शायद इसीलिए आज यह खबर दिल्ली के अखबारों में भी लीड है। अमर उजाला में नहीं है क्योंकि हिन्दी पट्टी में ऐसी मांग पर ऐसे आंदोलन नहीं होते हैं, मांग पूरी होने की बात ही छोड़िये।
उदाहरण के लिए, राहुल गांधी के खिलाफ बयानों का उल्लेख किया जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि ये राजनीतिक नहीं हैं और कहा जा सकता है कि भाजपा या संघ परिवार के लोग उनकी राजनीति का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं तो उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं और यह पप्पू साबित करने की कोशिशों से काम नहीं होने के बाद की कोशिशें हैं। बेशक, गंभीर मामला है और राजनीति का बेहद घटिया रूप है। लेकिन अखबारों में उसकी खबर नहीं है जबकि अखबारों को ना सिर्फ खबर देनी चाहिये बल्कि यह भी बताना चाहिये कि कानून व्यवस्था औऱ समाज में अमन चैन की स्तिति ऐसी होनी चाहिये कि कोई ऐसे बयान दने की हिम्मत भी नही कर पाये और अगर कोई करे तो पुलिस को स्वयं कार्रवाई करनी चाहिये, स्वयं न करे तो सरकार को कहना चाहिये, सरकार नहीं करे तो अदालत स्वतः संज्ञान ले सकती है। वर्षों बाद सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता मामले में डॉक्टर्स की हड़ताल पर लिया था। नहीं लिया है पर अभी तक वह भी नहीं हुआ है। राहुल गांधी की चिन्ता में कांग्रेस के लोगों ने एफआईआर जरूर करवाई है पर आगे क्या हुआ पता नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसी धमकी आम आदमी को भी दी जाये तो कार्रवाई होनी चाहिये यहां तो विपक्ष के नेता का मामला है।
आप जानते हैं कि ऐसी खबरों से लोगों में भी नाराजगी बढ़ती है और इस बात की आशंका बनती है कि कोई सिरफिरा कानून अपने हाथ में ले और कुछ ऐसा कर दे जो नहीं होना चाहिये। ऐसा होता रहा है और ऐसे ढेरों मामले हैं। कायदे से किसी के खिलाफ गुस्सा फैलाने वाले ऐसा बयान प्रकाशित-प्रसारित नहीं होने चाहिये और कार्रवाई उसपर भी होनी चाहिये। लेकिन प्रचारकों की भूमिका निभा रहे मीडिया से इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती है और टुटुपुंजिये नेताओं के बयानों को भी प्रमुखता दी जा रही है जबकि आपके पास सबूत हो तो उसका उपयोग एफआईआर कराने में किया जाना चाहिये हत्या और कथित ईनाम के प्रचार में नहीं। यह देश समाज के लिए भी बुरा है। गलत संदेश जाता है पर नासमझों की बात छोड़िये मीडिया का भी समर्थन है और उसे जो देश का भला कर रहा होता तो भी एक बात थी। कहने की जरूरत नहीं है कि मीडिया अपने लाभ या सुरक्षा के लिए सरकार के खिलाफ खबरें नहीं देता है और प्रचार में लगा हुआ है।
आज अमर उजाला की लीड ऐसी ही है। शीर्षक है, नरेन्द्र मोदी ने कहा, जलवायु परिवर्तन पर जो विकसित देश नहीं कर पाये, हमने कर दिखाया है। यह शीर्षक या दावा आज किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। मुझे नहीं पता प्रधानमंत्री के इस दावे का आधार क्या है या किस पैमाना से उन्हें यह नतीजा मिला है। फिर भी मुद्दा यह है कि इस मामले में अगर हम विकसित देशों से आगे हैं और समय से पहले लक्ष्य पूरा कर लिया है तो इसलिए भी कि हमने आंख बंद कर पैसे फूंके हैं। नियम बनाने में खर्च और महंगाई तो छोड़िये आम आदमी की हैसियत का भी ख्याल नहीं रखा गया है। संभव है, बाद में मुफ्त राशन की तरह इसके उपाय भी मुफ्त दिये जायें पर अभी जो हुआ है वह तो परेशान करने वाला है। उदाहरण के लिए, 15 साल पुरानी गाड़ियों को कंडम करने का नियम। इलेक्ट्रीक वाहनों पर जोर और पर्याप्त चार्जिंग स्टेशन के बिना बसें खरीद लिया जाना प्रमुख है। मई में टाइम्स ऑफ इंडिया में नागपुर की खबर थी चार्जिंग संरचना नहीं होने के कारण नई बसें खड़ी हैं। हाल में दिल्ली की भी ऐसी खबर छपी थी। जाहिर है, प्रधानमंत्री का पैमाना खर्च का लक्ष्य हासिल करना होगा पर हालत यह भी है कि सड़क पर पानी भरने से लोग मर रहे हैं और यह राजधानी दिल्ली में भी हो रहा है। सड़क पर पानी भरने के लिए कार्रवाई का पता नहीं चलता है लेकिन बेसमेंट में पानी भरने से छात्र मरें तो कोचिंग इंस्टीट्यूट के खिलाफ कार्रवाई की खबर मिलती है।
ऐसे में मीडिया का पक्षपाती रूप भी इस व्यवस्था के लिये जिम्मेदार है। जहां तक आज की लीड की बात है, इसपर भी अखबारों के तेवर देखने लायक हैं। नवोदय टाइम्स ने लिखा है, ममता ने मानी डॉक्टरों की मांगे इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, “प्रदर्शनकारी डॉक्टर्स ने ममता को पलक झपकाने पर मजबूर किया : पुलिस प्रमुख, शिखर के दो स्वास्थ्य अधिकारियों को शंट किया जायेगा।” एक्सप्रेस में इसके साथ एक और खबर है, “टीएमसी की महिला विधायकों ने स्वीकार किया : कुछ तो गलत हुआ है …. पुलिस को अपना काम करना चाहिये था। उपशीर्षक है, इंडियन एक्सप्रेस ने टीएमसी की 35 महिला विधायकों से संपर्क किया।” मुझे लगता है कि पुलिस प्रमुख (और दूसरे लोगों को भी) बिला वजह बलि का बकरा बनाया गया और यह मामले को राजनीतिक रंग दिये जाने के कारण ही हुआ होगा। वरना पुलिस ने शुरू में ठीक ही काम किया होगा बाद में सीबीआई ने थाना इंचार्ज को ही गिरफ्तार कर लिया। मामला यह है कि अभियुक्त पुलिस का ही आदमी है, थाना इंचार्ज के बिना उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई होगी और पुलिस प्रमुख जिम्मेदार हों या नहीं, पुलिस के आदमी को बचाने के आरोपी नहीं हैं फिर भी उनके खिलाफ कार्रवाई हुई है। सच जब पता चलेगा तब चलेगा पर थाना इंचार्ज की गिरफ्तारी और पुलिस प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई – मतलब दोनों दोषी हैं या सजा मिली जबकि अभियुक्त पुलिस वाले को 12 घंटे में गिरफ्तार कर लिया गया था। अगर उसके खिलाफ सबूत मिटाने या केस कमजोर करने का मामला हो तो कितने मामलों में जांच एजेंसियां अपनी कहानी साबित करके सजा दिला पाती हैं?।
यह बाद की बात थी, इसके लिए भी कार्रवाई का मतलब नहीं है और यह सब ठीक तभी माना जायेगा जब अभियुक्त संजय राय को सजा होगी। उसके बिना जो भी हो, सब राजनीति है। डॉक्टर्स ने भी इस बहाने अपनी सुरक्षा का बंदोबस्त कर लिया है जो भारतीय व्यवस्था में सरकारी डॉक्टर के लिए जरूरी है।
द टेलीग्राफ का शीर्षक है, ममता ने मांग मानी पर डॉक्टर्स के लिए यह भी पर्याप्त नहीं है। खबर के अनुसार इसके बावजूद डॉक्टर का काम रोको जारी रहेगा। द हिन्दू का शीर्षक है, ममता ने अधिकारियों को हटाया, जूनियर डॉक्टर्स से काम शुरू करने के लिए कहा। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, डॉक्टर्स, ममता ने आखिरकार बात की कोलकाता के पुलिस प्रमुख हटाये गये। मुख्य खबर के साथ एक और खबर है। इसका शीर्षक है, सीबीआई ने जांच में देरी, छिपाने की कोशिशों के लिए घोष (प्रिंसिपल), बंगाल पुलिस को जिम्मेदार ठहराया। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, डॉक्टर्स से मुलाकात के बाद दीदी ने कोलकाता के पुलिस प्रमुख, दो वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों को शंट किया।
बांग्लादेश से घुसपैठ की जांच डी को
मैंने कल यहां बताया था कि प्रधानमंत्री झारखंड में घुसपैठ की बात करके आये थे। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है कि पहली बार इस मामले की जांच ईडी कर रही है। मैंने बांग्लादेश सीमा का वीडियो देखा है। वहां लोग सीमा पर लगे बाड़ को आराम से पार करके भारतीय सीमा में कूद जा रहे थे। सीमा पर कई जगह ऐसी बाड़ नहीं है और निश्चित रूप से यह सीमा पाकिस्तान से लगने वाली सीमा के मुकाबले शांत है। सच यह है कि अभी पाकिस्तान से ही घुसपैठ नहीं रुकी है और भारत सरकार की तमाम घोषणाओं, दावों तथा कार्रवाइयों के बावजूद कश्मीर में आतंकवाद खत्म नहीं हुआ है लेकिन प्रधानमंत्री उसके अंतिम चरण में होने का दावा कर चुके हैं और उसे प्रचारकों ने लीड के रूप में छाप कर सरकार की सेवा की है। यहां याद आता है कि किसी फिल्म में था कि सीमा पार करने के लिए लोग बाड़ के नीचे इस पार से उस पार तक की सुरंग खोद देते हैं। ऐसे में घुसपैठ रोकने की व्यवस्था सरकार को करनी है। उसके लिए सुरक्षा कर्मी लगाने हैं और यह काम जरूरी था तो 10 साल में किया जाना था। पर प्रधानमंत्री अभी भी पहले की सरकारों को कोसकर और विदेशी ताकतों पर ठीकरा फोड़कर अपना काम चलाना चाहते हैं। अव्वल तो ऐसी खबरें छपती नहीं हैं और छपती हैं तो सरकारी अंदाज में।
सेबी की कहानी
दिलचस्प है कि सरकार घुसपैठ की समस्या को मनी लांडरिंग से जोड़कर ईडी की जांच शुरू कर रही है जबकि सेबी मामले में किसी कार्रवाई की खबर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया में सेबी की भी दिलचस्प कहानी है। सेबी प्रमुख का विवाद तो आप जानते हैं। बीच में कर्मचारियों के आंदोलन की खबर आई थी और तब सेबी ने कहा था कि कर्मचारियों के आंदोलन में बाहर के तत्वों का हाथ है। यह वैसे ही है जैसे भारत सरकार हर बात में विदेशी ताकतों को जिम्मेदार ठहराती है। भले बाद में पूरा वीडियो ही पाकिस्तान का पता चले। उसके बाद सभी प्रचारकों ने चुप्पी ओढ़ ली। वह अलग मुद्दा है, सेबी के बारे में आप जानते होंगे या नहीं जानते हैं तो मैं बता देता हूं कि प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो कर्मचारियों ने आंदोलन शुरू किया। सेबी ने इसके लिए बाहरी ताकतों को जिम्मेदार ठहरा दिया। यहां तक तो बात सामान्य लगी (आजकल यही हो रहा है) इसलिये मैंने चर्चा नहीं की पर आज खबर है सेबी ने अब यू टर्न ले लिया है। यह भी सरकार की विशेष कार्यशैली का भाग है। यह मामला तो जो है सो है, वित्त मंत्री ने यह भी कहा है कि सेबी प्रमुख सभी आरोपों का जवाब दे रही हैं। यह इस सरकार की कार्यशैली का हिस्सा है और खबर सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में।
नो वन किल्ड जेसिका
द टेलीग्राफ में यह मामला बिजनेस पन्ने पर है। इसमें ‘एक नजर’ में बताया गया है कि 6 अगस्त को 500 सेबी कर्मचारियों ने वित्त मंत्रालय को लिखा कि संस्थान में काम करने की संस्कृति बहुत खराब है। 4 सितंबर को सेबी ने बयान जारी कर कहा कि अधिकारियों (कर्मचारियों) का पत्र कतिपय बाहरी तत्वों से प्रेरित था। 16 सितंबर को सेबी ने अपना बयान वापस ले लिया और कहा कि कर्मचारियों का मामला आंतरिक तौर पर तय समय में निपटाया जायेगा। यह संयोग ही होगा (प्रयोग भी संभव है) कि कल ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री डॉक्टर्स के भारी दबाव में कोलकाता के पुलिस प्रमुख को हटाने के लिए तैयार हो गईं। सीबीआई ने थाना इंचार्ज को पहले ही गिरफ्तार कर लिया है और अभियुक्त एक पुलिस वाला है। देखना है कि पुलिस वाला फंसता है या बच जाता। भारत में यह बहुत आम है कि अपराध हो जाता है अपराधी नहीं पकड़े जाते। इस पर एक फिल्म बनी थी,’नो वन किल्ड जेसिका’। और यह तब हुआ था जब मीडिया संस्थान पत्रकारिता करते थे। अब तो फिल्म भी नहीं बन पायेगी और जो बनती है वो आप जानते हैं। किताबें लिखने का मामला पता ही है। छोड़िये, इमरजेंसी बहुत बुरी थी।
इंडियन एक्सप्रेस में प्रचार और नवोदय टाइम्स
यहां मामला अमर उजाला की तरह नहीं है। लेकिन फोटो कैप्शन का शीर्षक है, विपक्ष ने मेरा मजाक उड़ाया मैं चुप रहा। इसमें बताया गया है कि तीसरे कार्यकाल के 100 दिन में विपक्ष उनका मजाक उड़ाता रहा पर वे चुपचाप काम करते रहे। इस मामले को समझने के लिए नवोदय टाइम्स का शीर्षक उल्लेखनीय है, “मोदी बोले – 100 दिनों में प्रगति पर ध्यान; कांग्रेस बोली – यू टर्न के कीर्तिमान”। कल ही मैंने लिखा था कि राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी की बातें तो भाजपा के बयान और प्रतिक्रिया के साथ ही छपती है जबकि नरेन्द्र मोदी कुछ भी बोलें उसे घोषणा और प्रचार मानकर शीर्षक के रूप में तान दिया जाता है। आप समझ गये होंगे कि मोदी जी तीसरे कार्यकाल के 100 दिन का हिसाब बता रहे हैं क्योंकि चुनाव हैं और 10 साल में जो किया है उसमें कुछ कहने, बताने, याद करने लायक होता तो उसी के आधार पर वोट मांगते। जानते हैं कि जो किया है उससे वोट नहीं मिलते हैं। ‘करूंगा’ – के लिए मिल सकते हैं। उदाहरण कश्मीर को दो हिस्से में बांटना है। उसके लिए और उसके बाद की मांग नहीं सुनने के लिए तो वोट मिलने से रहे अब उसे फिर राज्य का दर्जा देने की घोषणा पर मिल सकते हैं। इसलिए इस काम के लिए अपनी ही योग्यता बताना मजबूरी हो या नहीं, 56 ईंची राजनीति का एक तरीका तो है ही।
जम्मू कश्मीर में आतंकवाद हिन्दुस्तान टाइम्स में आज अमित शाह का दावा है। चुनाव प्रचार में उन्होंने जम्मू कश्मीर में आतंकवाद खत्म करने का दावा किया है। यही शीर्षक है। आप जानते हैं कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करना भाजपा के चुनावी घोषणाओं में था और 2019 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद उसकी मजबूरी थी कि वह इसे हटाये (वैसे तो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा भी देना था और नहीं देने का असर आप देख रहे हैं)। 370 हटाने से कुछ नहीं होना था इसलिए हटा भी दिया और बाकी कोई काम नहीं किया। उसका असर यह है कि चुनाव में हालत खराब है। प्रचार तो यह था कि कश्मीर में लोग प्लॉट खरीद पायेंगे पर जो गोलगप्पे बेचने गये मारे गये। दूसरे शब्दों में उससे कोई फायदा नहीं हुआ है और मामला ऐसा है कि 370 हटाने के नाम पर वोट नहीं मांग सकते। इसलिए अब ऐसे समय में 10 साल और एक पुलवामा के बाद इस तरह के आश्वासन पर काम चलाना पड़ रहा है। चूंकि सबको पता है कि इससे वोट मिलने की उम्मीद नहीं है तो 370 वापस लाने का डर और उसे वापस नहीं लाया जा सकता है जैसी बातें भी की जा रही हैं। पहले पन्ने पर छप जाये तो हींग लगे ना फिटकरी रंग भी चोखा वाली बात है।


