मज़कूर आलम-
ये एक लीगल नोटिस घुमाया जा रहा है तमगे की तरह (तस्वीर में देखें)। जैसे Krishna Kalpit का विरोध कर हमने बहुत बड़ा काम किया है और इसकी क़ीमत अब हम चुका रहे हैं। इसका दम्भ भरा जा रहा है।
कमाल यह है कि यह नोटिस किसी को मिला ही नहीं, फिर भी लोग घुमा रहे हैं। दूसरी बात इंडियन अमेरिकन सोसायटी नाम की कोई लीगल फर्म रजिस्टर्ड ही नहीं है। थोड़ा-सा रिवर्स की-वर्ड चेक से इसे जाना जा सकता है। फिर इसे क्यों लोग शेयर कर रहे हैं और यह बताने में गर्व कर रहे हैं कि इसमें मेरा भी नाम है।
इस घटना को राजनीतिक रंग भी देने की अब कोशिश की जा रही है, जिसकी आशंका मैंने पिछले पोस्ट में ज़ाहिर की थी। मुझे यकीन था पहले से ही, कि इसमें जबरदस्ती पॉलिटिकल एंगल डाला जाएगा और एक-दो पॉलिटिकल पार्टी के शीर्ष नेताओं का नाम डालकर कीचड़ उछालने की कोशिश की जाएगी। वही हुआ। इंसाफ मांगने की मांग पर लीगल नोटिस चिपकाकर शहीदाना रंग देकर अपना पीआर करने वाले लोगों से क्या आप यह उम्मीद कर सकते हैं कि उन्हें पीड़िता को इंसाफ मिले इससे कोई लेना-देना है?
उस पर से बेशर्मी यह कि पीड़िता उनके उकसावे में नहीं आई और सामने आने को तैयार नहीं हुई, एफआईआर के लिए राजी नहीं हुई तो खुन्नस में वे लोग बेशर्मी की सारी सीमाएं लांघ गए। उस लड़की का नाम लिख-लिखकर फेसबुक पोस्ट कर रहे हैं। छोटा-सा एथिक्स भी भूल गए। शायद इनकी मंशा यह है कि अब तो सारे लोग जान ही गए कि वह तुम ही हो। अब तो FIR कर दो। आखिर उन्हें इतनी बेचैनी क्या है? तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है पार्टनर!
इस सब के बीच मनुष्यता का स्वांग करने वालों को इतनी भी चिंता नहीं रही कि उस लड़की की मनोदशा पर इसका क्या असर पड़ेगा। अगर हिंदी समाज के ‘कुछ विशिष्ट मोरल पुलिसों’ द्वारा इस इंसाफ अभियान को ‘घृणित’ स्तर तक ले जाने और अपना पीआर करने के चक्कर में उस संभावनाशील लेखिका ने लिखना-पढ़ना छोड़ दिया तो यह हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति होगी।
यह सब देखकर मैं तो यह भी नहीं कह पा रहा- हे ईश्वर! इन्हें माफ करना! क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। क्योंकि सच में वे जानते हैं कि वे क्या और क्यों कर रहे हैं।
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