दरअसल, जब हमारी मान्यताएँ यथार्थ से टकराती हैं तो भीतर एक संघर्ष जन्म लेता है। उस टकराव से उपजी पीड़ा को कम करने के लिए व्यक्ति व्यंग्य का सहारा लेता है। लेकिन यह व्यंग्य आत्म के गहरे छेद को भर नहीं सकता, वह केवल उसे और स्पष्ट कर देता है…

त्रिभुवन-
मैं स्तब्ध हूँ। सोशल मीडिया पर कुमार विश्वास की बेटी को जिस तरह से ट्रोल किया जा रहा है, वह अंतर्मन को विचलित कर देने वाला है। कुमार विश्वास मेरे कई मित्रों के बहुत अच्छी और क़रीबी मित्र हैं; लेकिन मैं उनकी राजनीतिक शैली और कविता का कतई प्रशंसक नहीं हूँ और गाहे-बगाहे उन्हें लेकर टिप्पणियां भी करता रहता हूँ।
लेकिन यह परिचय और पहचान की बात नहीं है। यहाँ प्रश्न एक पिता और उसकी बेटी के बीच के उस सम्बन्ध का है, जो हर युग में आश्रय, उत्तरदायित्व और स्वप्न का पर्याय रहा है।
कोई पिता, भले ही वह किसी भी वैचारिक, सामाजिक या राजनीतिक पृष्ठभूमि से क्यों न हो, अपनी संतान, विशेषकर बेटी के लिए उच्च शिक्षा का निर्णय लेता है तो वह महज़ एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना के विकास की ओर एक कदम होता है। यह उस अनादि-अनंत प्रवाह का अंश है, जिसमें सभ्यता का गत्यात्मक मन स्वयं को विकसित करता है। ऐसे निर्णयों पर की गई टिप्पणियाँ या उपहास दयनीय हैं। ऐसे लोग वास्तव में समाज के भीतर छिपे उस अचेतन अंधकार को उजागर करते हैं, जो गहरे पैठा हुआ है। ख़ासकर महिलाओं को लेकर। वे अवचेतन कुंठाएँ जो हम सबके भीतर, किसी न किसी रूप में दबा दी गई हैं, हमें बहुत बार पदों या सम्मान की परवाह किए बिना भी हमारे भीतर से बाहर आती रहती हैं।
यह विरोध केवल बाह्य नहीं है; यह आत्म की गहराई में धँसे उस ‘छाया’ तत्व का प्रतिरूप है, जिसे कार्ल युंग ने शैडो कहा था। इस छाया का मारा इनसान उस कभी भी स्वस्थ पुरुष नहीं होता। इसीलिए जब लड़कियां अपने परिश्रम और अपने साहस से उछलकर ऊपर पहुंचती हैं तो प्रो-विमिन का अहंकार रखने वाले भी यह नहीं मानते कि कोई लड़की वहाँ पहुंची है, वे कहते हैं बेटियों की कामयाबियां या फिर उसे शब्द देते हैं मातृशक्ति! तू माँ है तो तेरी शक्ति वंदनीय है; लेकिन अगर तू पत्नी या सहकर्मी है तो तेरी ऐसी तैसी! इसीलिए हम देखते हैं कि जितने भी मातृशक्तिवादी या बेटीवादी हैं, औरत राजनीतिक विरोध पर उतरे तो उसका बलात्कार करने पर उतारू हो जाते हैं। आप ट्विटर देखिए!
ख़ैर। हालांकि निजी जीवन या आदर्श रूप में कुमार विश्वास भी इसी जीवन धारा में बहते एक लोकप्रिय कवि हैं; लेकिन उनके अपनी बेटी को इतनी उच्च शिक्षा दिलाने के मामले में आज सोशल मीडिया पर जो भाव तैर रहा है, वह है ईर्ष्या है, डाह है और घृणा है। वह गहन और ख़तरनाक़ मौन विष है, जो आत्महीनता के गर्भ से उपजता है।
मैंने जब पत्रकारिता का शिक्षण शुरू किया तो मुझे अपने सुयोग्य साथियों से कई तरह की थियरीज़ सीखने का सुअवसर मिला। इनमें सोशल कैंपेरिज़न थियरी भी एक थी। इन थियरीज़ का पता था; लेकिन युवा लड़के-लड़कियों के बीच इंट्रेक्शन से जो सीखने को मिला तो उसमें कार्ल युंग अचानक मेरे सामने आ खड़े होते थे। इतनी लड़कियों के बीच जब यह जानने की कोशिश करते कि समाज कैसा है तो पता चलता कि यह ईर्ष्या और स्त्री विरोध से भरा हुआ है।
यह ईर्ष्या एक आकिटाइप यानी archetype बन जाती है यानी वह आदिम प्रवृत्ति, जो हमें दूसरों की कामयाबियों या अच्छाइयों में अपनी विफलता का प्रतिबिंब दिखाती है।
दूसरी प्रवृत्ति है पितृसत्ता का वह गाढ़ा अवचेतन, जिसे हमने युगों से पोसा है। भारतीयतावादी को यह बात शायद ही कभी समझ में आए; क्योंकि यह हमारी उस पूरी सभ्यता को ही उलट-पलट देती है। इसलिए इसके भीतर एक गहरा नकार है। इसीलिए यह सोच कि बेटियाँ सीमित रहें, यह सोच स्वयं में सामूहिक अचेतन का वह अंश है जो स्त्री को स्त्री न रहने देकर उसे मातृतत्त्व से जोड़कर पुरुष अहंकार से बचाने की कोशिश करती है। यह भयभीत पुरुष का एक आवरण होता है। स्त्री की स्वतंत्रता को भयावह मानने वाली चेतना, दरअसल अपनी असुरक्षा में बंधी हुई चेतना है।
तीसरा तत्व है कॉग्निटिव डिसॅनॅन्स। इसे युंगीय लफ़्ज़ों में हम इन्नर कनफ़़लिक्ट या आत्मसंघर्ष कह सकते हैं। दरअसल, जब हमारी मान्यताएँ यथार्थ से टकराती हैं तो भीतर एक संघर्ष जन्म लेता है। उस टकराव से उपजी पीड़ा को कम करने के लिए व्यक्ति व्यंग्य का सहारा लेता है। लेकिन यह व्यंग्य आत्म के गहरे छेद को भर नहीं सकता, वह केवल उसे और स्पष्ट कर देता है।
चौथा तत्व है : इंटरनैलाइज़्ड मिसोज़िनी या कि Internalized Misogyny यानी आत्मविरोधी स्त्री चेतना। लेकिन इसे साफ़-साफ़ कहें तो स्त्री विद्वेष। युंग ने कहा था, “वह जो अपने भीतर ही भीतर अपनी आत्मा से कट जाता है, वह बाहर दूसरों को दोष देता रहता है।” कई बार महिलाएँ भी ऐसी बातें कहती हैं, जो स्वयं उनके भीतर के पितृसत्तात्मक ढाँचे से उपजी होती हैं। वे स्वयं अपने स्त्रीत्व से इतनी दूर कर दी गई होती हैं कि अगली पीढ़ी को भी उसी बेड़ियों में देखना उन्हें सहज लगता है। इसीलिए कुमार विश्वास की बेटी को लेकर बहुत सारी सुशिक्षित स्त्रियों के कमेंट भी हैरान नहीं करते।
लेकिन सार रूप में कहें तो मूल बात प्रोजेक्शन मेकैनिज़्म की है। हमारे भीतर के उस अंधकार की, जो दूसरों की रोशनी से चिढ़ता है। जब कोई बेटी आगे बढ़ती है, जब वह अपने पंख खोलती है तो कुछ लोगों को अपनी टूटी उड़ानों की टीस महसूस होती है। वे अपनी पीड़ा को आलोचना में बदल देते हैं, जैसे कि किसी दीपक को फूँक मारकर बुझाया जा सकता है। लेकिन उजाला भीतर से आता है और वह किसी आलोचना से नहीं रुकता।
बेटियों को शिक्षा देना, उनके भविष्य को बेहतर बनाना या उन्हें उन्मुक्त जीवन जीने देना एक बेहतर इन्सानी ख़याल है। लोग बेटों को भी इस तरह की शिक्षा देते हैं; लेकिन नहीं। यह सच नहीं है। बेटियों का उपहास उड़ाने वाला समाज बेटों को शिक्षित नहीं करता। वह उनमें निवेश करता है। हर बीमार और कुंठाग्रस्त पिता अपने बच्चों को नियंत्रित करने की कोशिश करता है। उनकी खेलने और जीने की आज़ादियों को। उनकी वित्तीय आज़ादियों को। उनकी सांस लेने और खानेपीने की स्वतंत्रताओं को।
कुछ समय पहले हमने देखा कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला की बेटियों का उपहास उड़ाया जा रहा है। अब कुमार विश्वास की बेटी को ट्रोल किया जा रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन के साथ तसवीर डालकर गंदी बातें करने वाले ट्रोलरों की कुंठाएं और ये कुंठाएं एक ही स्रोत से आती हैं।
कोई कवि, कोई राजनेता या कोई इतिहास पुरुष अपनी बेटी या बहन को पढ़ाता है या आगे बढ़ाता है तो यह मात्र व्यक्तिगत निर्णय नहीं, यह उस सामूहिक यात्रा का संकेत है जिसमें मानवता स्वयं को अधिक सशक्त, स्वतंत्र और आत्मजागरूक बनाती है। ऐसे निर्णयों पर उठती उंगलियाँ, केवल हमारी सामाजिक चेतना की अपरिपक्वता को ही नहीं दर्शातीं, बल्कि यह भी दिखाती हैं कि हमें अभी भी बहुत-सा अंधकार झेलना है, बहुत-सी छायाओं से गुजरना है; ताकि हम अपने भीतर के उजाले तक पहुँच सकें। अभी हमें अपने मनोरोगों के अंधेरों से बाहर आकर एक नई सुबह का नया सूरज उतारना है।


