
संजय कुमार सिंह
अखबारों में कल जब नागपुर हिंसा की खबर थी तो प्रधानमंत्री अचानक संसद पहुंच गये और मन की बात करके लौट गये। उन्होंने जो कहा वह मेरे आठ अखबारों में आज सिर्फ एक में लीड है। आप जानते हैं कि इनमें सिर्फ एक अखबार, द टेलीग्राफ कोलकाता का है। इसमें यह पहले पन्ने पर तो नहीं ही है दिल्ली के मेरे जिन अखबारों में प्रधानमंत्री का भाषण पहले पन्ने पर है उनमें हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, दि एशियन एज और अमर उजाला हैं। बाकी चार में यह पहले पन्ने पर नहीं है। दि एशियन एज में यह खबर लीड है और फ्लैग शीर्षक दो बुलेट प्वाइंट में है। पहला, राहुल का यह आरोप है कि प्रधानमंत्री (कुम्भ पर बोले लेकिन) मरने वालों को श्रद्धांजलि नहीं दी। दूसरा बुलेट प्वाइंट है, विपक्ष ने सदन छोड़ दिया। खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री के बयान के बाद भारी शोर-शराबे के कारण लोकसभा की कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित कर दी गई। विपक्ष प्रधानमंत्री के बयान पर सवाल पूछना चाहता था। कुल मिलाकर, मामला यह है कि प्रधानमंत्री ने अचानक संसद पहुंच कर मन की बात की और इसमें कुम्भ पर उनके विचार थे। बाद में विपक्ष ने सवाल पूछना चाहा तो लोकसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई। मतलब, प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने और मन की बात करने वाले प्रधानमंत्री ने संसद का भी उपयोग एकतरफा प्रचार के लिए कर लिया। अखबारों में आज यह खबर तो नहीं ही है पर अच्छी बात यह है कि आठ में से चार अखबारों ने इसे पहले पन्ने पर नहीं छापा। दि एशियन एज ने मामला अनूठा होने के कारण लीड बना दिया तो इसके खिलाफ जो बातें हुई उसे भी प्रमुखता दी है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी शीर्षक में ही बताया है कि विपक्ष ने भगदड़ पर चुप्पी को लेकर सवाल उठाया।
अकले अमर उजाला ने इसे सरकार के प्रचार की तरह छापा है और इसके खिलाफ विपक्ष का पक्ष तो छोड़िये, ‘आलोचकों पर साधा निशाना’ शीर्षक से एक छोटी खबर और छापी है। जाहिर है, हेडलाइन मैनेजमेंट के तहत प्रधानमंत्री ने जो कहा (या किया) उसे इस तरह प्रचारित किया जा सकता था पर वह प्रचार नहीं मिला। अकेले ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ ने मोदी जी की फोटो के साथ इसे तीन कॉलम की खबर के रूप में छापा है जिसका शीर्षक है, मोदी ने कहा, “कुम्भ से राष्ट्रीय भावना जागने का पता चला”। मुझे लगता है कि कुम्भ से राष्ट्रीय भावना नहीं, हिन्दुत्व की भावना जागी है और व्यंग में ही सही, सुनीता विलियम्स के लिये कहा गया है कि वे कुम्भ नहीं नहा पाईं। इससे आप समझ सकते हैं कि जिस भावना के जागने की बात प्रधानमंत्री ने कही है वह राष्ट्रीय नहीं, हिन्दुत्व की है। यह अलग बात है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, देवेन्द्र फडणविस ने जो कहा था और जिसे मैंने यहां लिखा था वह धर्म विशेष की भावना जगाने के लिए था। कल मैंने बताया था कि अखबारों ने फडणविस के बयान को वैसे नहीं छापा जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया ने छापा था। इस तरह ज्यादातर अखबारों ने नहीं भी छापा तो टाइम्स ऑफ इंडिया ने छाप ही दिया था। आज जो छपवाना था वह सिर्फ अमर उजाला में छपा है। इस तरह, जो दिख रहा है उसके आधार पर कह सकता हूं कि हेडलाइन मैनेजमेंट की कोशिशों का अपेक्षित असर नहीं हो रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने जो कहा वह सही भी हो तो लोग अब उनकी राजनीति समझ रहे हैं और उसका पर्याप्त विरोध है जो कल संसद में भी दिख गया।
हालांकि, मणिपुर में दोनों इंजन के नाकाम (या निष्क्रिय) साबित होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने टॉप के छह जजों के एक प्रतिनिधिमंडल को वहां भेजने का फैसला किया है और इसके अपने मायने हैं। इस लिहाज से यह बड़ी खबर है और आज की खबरों के बीच यह लीड हो सकती थी पर है नहीं। इस तरह, हेडलाइन मैनेजमेंट पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ है पर पहले के मुकाबले कम जरूर लगता है। इसका पता इससे भी चलता है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने हेट स्पीच के मामले में कपिल मिश्रा को कोई भी राहत देने से मना कर दिया है और 2020 के दिल्ली चुनाव के समय साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण वाले संदेश पोस्ट करने के लिए उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई अभी चलेगी। यह अलग बात है कि मिश्रा अब मंत्री हैं और कार्रवाई कौन चलायेगा, उनका वकील कौन होगा पर खबर तो है और आज इसे प्रमुखता मिली है। इससे भी लग रहा है कि अखबार संतुलित होने की ओर हो सकते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स,में यह खबर दो कॉलम में है। चुनाव आयोग (दरअसल आयुक्त) को अपने काम में सक्रिय दिखाने वाली खबर आज भी है। मतदाता सूची को आधार से जोड़ने की खबर कई दिनों से चल रही थी और चुनाव आयोग ने तय कर लिया था तो उसे होना ही था। आज इस खबर को भी महत्व मिला है।
द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, चुनाव आयोग मान गया, बूथवार मतदान की संख्या बताने की अपील पर सुनवाई करेगा। इन खबरों के मुकाबले आज टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड नागपुर का फॉलोअप है जो आज कई अखबारों के पहले पन्ने से गायब है और योजना कुम्भ की सफलता की एकतरफा घोषणा से दबाने की लग रही है। आज की खबर है कि घायलों में दो की हालत गंभीर है और 50 से ज्यादा गिरफ्तार किये गये हैं, 1200 लोगों के खिलाफ एफआईआर है और 70 लोग घायल हुए हैं। यह सब सिर्फ इसलिए हुआ है कि महाराष्ट्र में बहुमत से चुने गये मुख्यमंत्री, देवेन्द्र फडणविस ने कहा है, सरकार औरंगजेब के कब्र की सुरक्षा के लिए बाध्य, महिमा मंडन न करें…। कल टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर थी, हिंदू संगठन मुगल सम्राट के मकबरे को ध्वस्त करने का आह्वान कर रहे हैं। इसके लिए 21 लाख रुपये का ईनाम है। मुझे लगता है कि दंगे का कारण यह सब हो सकता है और सरकार अपने काम को मजबूरी मान रही है तो लोग ध्वस्त करने के लिए ईनाम घोषित करने के लिए प्रेरित हो रहे होंगे। मैं समझ रहा था इसके लिए फडणविस की आलोचना होगी और उनसे निष्पक्ष कार्रवाई के लिए कहा जायेगा या पद से इस्तीफा ले लिया जायेगा। अभी तक ऐसा कुछ होने की खबर नहीं है और ऐसे में कुंभ पर प्रधानमंत्री का कल का भाषण बता रहा है कि सरकार की रणनीति और राजनीति क्या है। अखबारों को तय करना है कि वे इस सरकार का समर्थन करते रहेंगे या देश के बारे में सोचेंगे।


