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हिन्दी में ऐसी फिल्में नहीं बनती हैं इसलिए देख जाइए!

अभिषेक श्रीवास्तव-

भीतर के तालिबान के रेचन के लिए दो अद्भुत फिल्में… सौ ग्राम तालिबान अपने भीतर भी है। चूंकि पढ़ना बहुत कठिन है, तो ये आसान वीकेंड सलाह मानिए- Kuruthi और Home दो बेहद संजीदा फिल्में आयी हैं। दोनों मलयाली हैं, दोनों प्राइम पर हैं, अंग्रेजी सब-टाइटल के साथ। हिन्दी में ऐसी फिल्में नहीं बनती हैं इसलिए देख जाइए। इन्हें देखना एक करीबी अनुभव से गुजरना है। दस ग्राम ज्यादा मनुष्य बन कर निकला जा सकता है देखने के बाद।

Kuruthi मनुष्य की धार्मिक पहचान और उसके सांप्रदायिकता में बदलने की मनोदशा पर केंद्रित है। इसे देख कर शायद हम चालू सांप्रदायिकता और कथित धर्मनिरपेक्षता के बीच समरूपता और महीन फ़र्क को समझ पाएं और इस दुई के दैनिक दुष्चक्र पर क्रिटिकल तरीके से सोच पाएं।

Home रुलाने वाली फिल्म हो सकती है, इमोशनल दर्शक के लिए। एक परिवार में तीन पीढ़ियों का साथ होते हुए भी बीच में टेक्नोलॉजी की दीवार के चलते परस्पर दूर होना और इससे पैदा हुए alienation को बड़े सहज ढंग से ये फिल्म समझाती है। सबसे बड़ी बात ये कि अपनी पूंछ का पीछा करने वाली समकालीन पीढ़ी को थोड़ा रिफ्लेक्शन का मौका मुहैया करवा सकती है और घर-परिवार का कारोबार आसान कर सकती है।

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