संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में सुप्रीम कोर्ट की तीन खबरें हैं कुत्तों का मामला अमर उजाला और देशबन्धु – दो अखबारों में लीड है। द हिन्दू में एक अलग मामला लीड है। एक और खबर पहले पन्ने पर है। इन सबसे अलग भारत के सेना प्रमुख की वार्षिक प्रेस कांफ्रेंस की खबर नवोदय टाइम्स, द टेलीग्राफ और हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है। एशियन एज और टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड ईरान पर अमेरिकी टैरिफ और भारत पर उसके असर की खबर है जबकि इंडियन एक्सप्रेस की खबर द हिन्दू की तरह सबसे अलग, अमेरिका से संबंध सुधारने की कोशिश में विदेश मंत्री एस जयशंकर की अमेरिकी सेक्रेट्री ऑफ स्टेट और नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजर मार्को रुबियो से फोन पर बातचीत की खबर है।
सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची ने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या नागरिकता कानून के तहत यह आवश्यक है कि ईआरओ (मतदाता पंजीकरण अधिकारी) के निष्कर्षों को उपयुक्त निर्णय के लिए भेजा जाए? …. क्या आप केंद्र सरकार के निर्णय लेने तक मतदाता के (वोट देने के) अधिकार छीन सकते हैं? मेरी समझ से इस सवाल का मतलब यह भी है कि अगर कोई मतदाता सूची में नहीं है तो क्या (भविष्य में) उसकी नागरिकता के मामले पर उपयुक्त निर्णय मुद्दा होगा। जाहिर है, यह स्पष्ट होना चाहिए और अभी तक स्पष्ट नहीं है। चुनाव आयोग मतदाता सूची का सघन पुनरीक्षण कर रहा है और इसके तहत अगर कोई मतदाता बनने से रह जाता है तो क्या वह नागरिक नहीं है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है और मतदाता रहने या नहीं रहने से बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर अभी किसी को सिर्फ मतदाता सूची से निकाला जा रहा है और इसी आड़ में भविष्य में नागरिक ही नहीं माना जाए तो जीवन के अंतिम समय में कोई क्या कर पाएगा? कहने की जरूरत नहीं है कि आम नागरिक की तरह रहते हुए वोट देने का अधिकार न हो तो बहुत लोग परेशान नहीं होंगे। मुझे लगता है कि भारतीय जनता पार्टी यही चाहती है। उसका इरादा यह हो सकता है कि समय, शासन या काम के आधार पर वोट देने का फैसला करने वाले लोग अगर वोटर नहीं रहेंगे तो जो वोटर बचेंगे वे इधर या उधर के लोग होंगे और उसे वोट देने वाले हमेशा ज्यादा होंगे या उसके चुनाव हारने की आशंका बहुत कम हो जाएगी। लेकिन यह नागरिकता से जुड़ा हो और भविष्य में जबरन बांग्लादेश भेजा जाना आम होने वाला हो या डिटेंशन कैम्प में रहने की स्थिति हो तो अभी ही लोग अपील करके मतदाता सूची में रहना चाहेंगे। इस लिहाज से चुनाव आयोग का जवाब वैसा ही है जैसा सरकार को पसंद आए। उसने नहीं कहा है कि ऐसा नहीं होगा या उसे केंद्र सरकार के फैसला करने तक मतदान के अधिकार छीनने का हक है या मतदान से पहले सब ठीक हो जाएगा।
द हिन्दू ने उपशीर्षक में बताया है, सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि मतदाता सूची से नाम हटाने के उसके निर्णय के बाद क्या इस बात की जांच हो सकती है कि वे भारत में रहने के हकदार हैं कि नहीं? चुनाव आयोग ने कहा है कि एसआईआर में अलग कर दिए गए मतदाताओं को अपील करने का अधिकार है। इसका मतलब यह भी है कि नागरिकता संदिग्ध होने के शक में जिसे छोड़ा गया है उनके संबंध में (अपील करने पर) फैसला चुनाव आयोग ही करेगा। सरकार की ऐसी कोई योजना नहीं है, जनगणना होने वाली है इसमें ऐसे लोगों का क्या होगा इस बारे में सरकार का कोई निर्णय है कि नहीं या चुनाव आयोग को इसकी जानकारी नहीं है ऐसा कुछ इस जवाब में नहीं है। और सवाल में जो गंभीरता है उसका जवाब नहीं है। लोगों के लिए अपील करने और आगे नागरिक न माने जाने की आशंका के मद्देनजर अभी कोई निर्णय करना उसी तरह मुश्किल बना हुआ है और यह एसआईआऱ कराने या उसे नहीं रोके जाने के कारण है। अभी इसमें जो खर्च हो रहा है (देश को) उसके लाभ की जानकारी नहीं है और जो स्थितियां हैं उसमें संभव है कि मतदाता सूची में रखने से लेकर नागरिकता तय करने के लिए सरकार को फिर खर्त करना पड़े, संसाधन लगाने पड़ें और फिर यही सब नागरिकता तय करने के लिए भी करना पड़े। पहले की व्यवस्था में हर निवासी (अगर वह घोषित और स्वीकार्य तौर पर विदेशी नहीं है) तो वोटर और नागरिक था। अगर कोई वोटर या नागरिक नहीं है लेकिन निवासी है तो आधार कार्ड वाला हो सकता था लेकिन अब ऐसे निवासियों का एक बड़ा वर्ग होगा जिनकी नागरिकता तय नहीं होगी और सरकार को इनके मामले में अलग से सोचना खर्च करना होगा। इसका कारण यह भी है कि करोड़ों की संख्या में जो लोग मतदाता सूची से बाहर किए गए हैं उनके लिए तय समय में मतदाता बनना व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं है। अपवादों की बात अलग है। जो स्थितियां हैं उसमें अगर किसी कारण से मध्यावधि चुनाव हो जाए तो मतदाता सूची भाजपा के पक्ष में तैयार है। अगर 2029 में सामान्य ढंग से चुनाव होंगे तो अगली बार उसका जीतना तय है। जाहिर है, बाकी के काम बाद में किए जा सकेंगे और इनमें हिन्दू राष्ट्र घोषित करना और जैसा संघ प्रमुख ने कहा है, होकर रहेगा। जो दिख रहा है वह यही है हालांकि मैं गलत हो सकता हूं और इसका कारण मेरा पूर्वग्रह हो सकता है।
इस गंभीर खबर को आज अखबारों में महत्व नहीं मिला है। देश, नागरिक और सरकारी नीति से संबंधित सुप्रीम कोर्ट की एक और खबर द हिन्दू में है। इसके अनुसार, लोक सेवकों के खिलाफ कार्रवाई की मंजूरी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में मतभेद है। भ्रष्टाचार विरोधी कानून में एक प्रावधान की कानूनी वैधता को लेकर यह फैसला आया है। एक राय यह थी कि इस संबंध में फैसला लोकपाल या लोक आयुक्त जैसे स्वतंत्र प्राधिकार को करना चाहिए। दूसरी राय यह थी कि किसी प्रावधान के दुरुपयोग की संभावना (आशंका) मात्र इसे असंवैधानिक घोषित करने का आधार नहीं हो सकती है। तर्क यह था कि अगर ऐसा प्रावधान होगा ही नहीं तो तत्काल यह असर होगा कि आधिकारिक निर्णय लेने में भ्रष्टाचार के आरोप पर तुरंत पुलिस की जांच शुरू हो जाएगी। मुझे लगता है कि ऐसा ही होना चाहिए और पुलिस को सबूत मिले तो मंजूरी के बाद कार्रवाई होनी चाहिए और पुलिस के सबूत अपर्याप्त (या दोषपूर्ण) पाए जाएं तो पुलिस के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। अभी होता यह है कि कुछ मामलों में मंजूरी दी जाती है और कार्रवाई व गिरफ्तारी तक हो गई लेकिन मामला लटका रहा और इसमें निर्वाचित प्रतिनिधि भी रहे जो पांच साल के लिए ही चुने जाते हैं। उसपर भी सरकार यह कानून बनाना चाहती है कि कोई एक महीने से अधिक जेल में रह जाए तो उसका पद स्वयं चला जाए। इससे जो अव्यवस्था हो सकती है उसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। लोक सेवकों को निर्वाचित प्रतिनिधियों से अलग करना भी मुद्दा है और चुनाव आयुक्तों को मिली सुरक्षा तो मुद्दा है ही। इस लिहाज से यह भी गंभीर मुद्दा है लेकिन अमर उजाला तथा देशबन्धु ने सुप्रीम कोर्ट के दूसरे आदेश को लीड बनाया है।
अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, कुत्तों के काटने पर देना होगा भारी मुआवजा खाना खिलाने वाले भी जवाबदेह : सुप्रीम कोर्ट। उपशीर्षक है – शीर्ष अदालत ने कहा, लावारिस कुत्तों की ज्यादा चिन्ता करने वाले उन्हें अपने घर में रखें। इसके साथ छपी संबंधित खबरों के शीर्षक हैं, इतनी लंबी बहस कभी इंसानों के लिए नहीं सुनी, (कुत्तों को) सार्वजनिक जगहों पर रहने देने का आधार नहीं और यह भी कि क्या सारे जज्बात कुत्तों के लिए ही हैं, इन्सानों के लिए नहीं। इसमें एक महत्वपूर्ण सूचना यह है कि गुजरात के एक वकील को पार्क में कुत्ते ने काट लिया। नगर निगम के अधिकारी जब जानवर को पकड़ने गए तो खुद को कुत्ता प्रेमी बताने वाले वकीलों ने उनपर हमला कर दिया। पीठ चार दिनों से दलीलें सुन रही है और कार्यकर्ता व गैर सरकारी संगठन उसे मामले में आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं। यह समाज की स्थिति है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला जो भी होगा इन तथ्यों के आलोक में होगा। लेकिन सोशल मीडिया में तरह-तरह की नाराजगी है। किसी ने लिखा है, गाड़ियां तो सड़कों पर रहती हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि वे बंधी (लॉक) होती हैं। कुत्ते खुले होते हैं। गाड़ियों से परेशानी चाहे जो होती हो, वे काटती नहीं हैं लेकिन कुत्तों के साथ ऐसी बात नहीं है। वैसे भी गाड़ियों के मामले में तय नियम और बीमा हैं। कुत्तों के बारे में भी होना चाहिए और हम उसी ओर बढ़ते लग रहे हैं। देशबंधु का शीर्षक है, कुत्तों के काटने पर देना होगा मुआवजा। उपशीर्षक है – सुप्रीम कोर्ट ने कहा, पिछले पांच साल में नियमों को लागू करने के लिए कुछ नहीं किया। कहने की जरूरत नहीं है कि कुत्तों का मामला भी बड़ा है लेकिन मामला जब कुत्तों को गली में रहने देने का और नागरिकों (या इनसानों) को देश में रहने देने या नहीं रहने देने से संबंधित हो तो दूसरा वाला महत्वपूर्ण है और अखबारों में इसी को महत्व मिलना चाहिए था। वैसे भी अखबार तो मनुष्यों के लिए है, कुत्तों या उनके लिए परेशान रहने वालों के लिए नहीं। सुप्रीम कोर्ट की इन तीन खबरों के अलावा आज जो बड़ी खबरें हैं या जो मेरे हिसाब से लीड बन सकती थीं उनमें राहुल गांधी का यह आरोप भी है कि, देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला हो रहा है और निर्वाचन आयोग जैसी संस्था चपेट में है। (देशबन्धु)
देश के आम नागरिकों के मतलब की इन खबरों से अलग, आज नवोदय टाइम्स की लीड सेना प्रमुख की वार्षिक प्रेस कांफ्रेंस की खबर है। इसका शीर्षक है, (पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के) सक्सगाम घाटी में निर्माण कार्य अवैध हैं। खबर के अनुसार, सेना प्रमुख ने कहा है, आठ आतंकी कैम्प सक्रिय हैं, सेना नजर रख रही है। मुझे इसके बराबर में छपी भारत की खबर ज्यादा महत्वपूर्ण लगी। इसके अनुसार कश्मीर में राज्यपाल मनोज सिन्हा ने आतंकी सपोर्ट सिस्टम पर प्रहार किया है और लश्कर ए तैयबा, हिज्बुल मुजाहीद्दीन से संबंध के आरोप में पांच सरकारी कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया है। अखबार ने इन पांचों के नाम प्रमुखता से प्रकाशित किए हैं और यह सब तब है जब 2019 का चुनाव ‘घुस कर मारूंगा’ की घोषणा से जीता गया था। कश्मीर चुनाव से पहले यह दावा किया गया था कि आतंकवाद खत्म हो गया है। पहलगाम के बाद ऑपरेशन सिन्दूर के नाम पर विशेष किस्म का युद्ध छेड़ा गया जो अचानक बंद हो गया। कारण आज तक नहीं बताया गया। अब सेना प्रमुख ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है, ऑपरेशन सिन्दूर जारी। पूरी खबर प्रेस विज्ञप्ति से बनी लगती है। प्रेस कांफ्रेंस की तरह कोई सवाल-जवाब हुआ ऐसा नवोदय टाइम्स या किसी दूसरे अखबार की खबर से नहीं लग रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स और द टेलीग्राफ की लीड भी आज यही खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया और दि एशियन एज की लीड ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर ट्रम्प के 25 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ की खबर है। दि एशियन एज का शीर्षक है, ईरान पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ का भारत पर असर न होना संभव है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


