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लल्लनटॉप के मालिक सौरभ द्विवेदी नहीं थे, ये इंडिया टुडे ग्रुप का हिस्सा है!

सचिन सिंह गौर-

लल्लनटॉप तो सौरभ द्विवेदी का ही था फिर सौरभ ने छोड़ कैसे दिया? बड़ी संख्या में तो लोग इसी बात को लेकर कंफ्यूज हैं। लल्लनटॉप सौरभ ने ही शुरू किया था लेकिन इंडिया टुडे ग्रुप के डिजिटल एक्सपेंशन प्लान के तहत नाकि अपने स्टार्टअप के तौर पर। सौरभ द्विवेदी इसके फॉउन्डिंग एडिटर थे फाउंडर नहीं।

ये अरुण पुरी का ही ब्रेन चाइल्ड था जो 2016 में समझ चुके थे कि आने वाला समय यूट्यूब का होगा। लल्लनटॉप की ब्रांडिंग सोच समझ कर आजतक और इण्डिया टुडे से अलग रखी गयी ताकि एस्टेब्लिश ब्रांड से अलग एक भदेस दर्शक वर्ग खड़ा किया जा सके। सौरभ का एक अहम रोल था लेकिन उतना ही जितना एक लीडिंग एम्प्लोयी का होगा जिसके पास एक टॉप संस्थान के सभी बेहतरीन संसाधन उपलब्ध हैं। सौरभ ने लल्लनटॉप को नहीं बनाया था बल्कि लल्लनटॉप ने सौरभ द्विवेदी को बनाया था। लेकिन आम लोगों की तरह सौरभ को भी यही लगने लगा था कि हमसे लल्लनटॉप है, लल्लनटॉप से हम नहीं। बस यहीं से उनके जाने की पठकथा लिखनी शुरू हो गयी।

पिछले कुछ समय की मनमानी एक्टिविटी ही सौरभ द्विवेदी के लल्लनटॉप से बाहर जाने का कारण बनी हैं। चाहे वो गिरिजा औक के बार-बार होते बेमतलब इंटरव्यू हों या फिर आमिर खान जैसे लोगों के 7 घंटे के इंटरव्यू हों या फिर बिना इंडिया टुडे की जानकारी और अनुमति के, जावेद अख्तर और नदवी की बहस को लल्लनटॉप जैसा मंच देना, या फिर एक भदेस सामाजिक राजनैतिक प्लेटफॉर्म को फ़िल्मी प्लेटफॉर्म में बदलना हो।

जब संस्थान की ग्रोथ से ज्यादा आपकी निजी इच्छाये बढ़ी हो जाएँगी तब वही होगा जो सौरभ द्विवेदी के साथ हुआ। राजनीति में रूचि से हुई कहानी guest in the newsroom के कारण फिल्मो की तरफ मुड़ गयी और बुंदेलखंड का लड़का सोनाली बेन्द्रे को “मेरी दोस्त” कहने लगा, ठेठ हिंदी पृष्ठभूमि का लड़का फ़िल्मी लोगों को अपनी वाइफ के बारे में बताने लगा कि “hardly watch any Hindi content.” खैर सौरभ द्विवेदी को लल्लनटॉप ने बहुत कुछ दिया है आगे वो खुद बहुत कुछ तलाश लेगा। आप दुखी या परेशान ना हों, सौरभ अवसरवादी है अवसर तलाश लेगा। जैसे वामपंथी चेहरा दिखाकर भाजपाइयों को साध लिया।


कई लोगों को लगता था कि सौरभ द्विवेदी लल्लनटॉप के ऑनर हैं। दरअसल सौरव द्विवेदी नहीं, इंडिया टुडे ग्रुप लल्लनटॉप का मालिक है। सौरभ द्विवेदी लल्लन टॉप के फाउंडिंग एडिटर थे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि लल्लन टॉप को सौरभ द्विवेदी ने एक ब्रांड बनाया है। और साथ-साथ खुद की भी एक इमेज बिल्डिंग की है। सौरभ द्विवेदी एक अच्छे वक्ता जिनकी भाषा पर पकड़ है.. एक अच्छे एंकर, एक अच्छे स्टोरी टेलर जो किसी भी समाचार को एक सरल तरीके से आम जनमानस को समझ आए इस तरह से बोलते थे। सौरभ द्विवेदी पत्रकार नहीं एक अच्छे एंकर है। – रोहित यादव


सौरभ यादव-

सौरभ द्विवेदी ने लल्लनटॉप छोड़ दिया है कई लोग चौंक रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता था कि लल्लनटॉप उनका अपना चैनल है जबकि सच ये है कि वो इंडिया टुडे ग्रुप का हिस्सा है।

बाकि सौरभ को लल्लनटॉप जैसा एक अच्छा प्लेटफॉर्म खड़ा करने के लिए याद किया जाएगा जहां हमें कई बेहतरीन इंटरव्यू सुनने और देखने को मिले कई जानकारियों भरे वीडियो मिले…बाकि जैसे कुमार विश्वास को कुछ लोग कवि समझते हैं वैसे ही सौरभ द्विवेदी को कुछ लोग पत्रकार समझते हैं जबकि ना कुमार विश्वास कवि हैं और ना सौरभ पत्रकार…सौरभ एक अच्छे होस्ट हैं अच्छे एंकर हैं भाषा अच्छी है लेकिन पत्रकार…


समर्थ-
पत्रकार का मतलब होता है वह जनता की समस्याओं पर जनता के सवाल सरकार या उसके प्रतिनिधियों पूछे, क्योंकि जन प्रतिनिधि से जनता चुनाव के बाद आसानी से मिल नही पाती है।

चुनाव जीतने के बाद जन प्रतिनिधि ज्यादातर समय अपने गुंडों से घिरा रहता है जिनके सामने एक आदमी अपनी सुविधा या मुश्किलों को लेकर सवाल नहीं कर सकता। पत्रकारिता को क्रांतिकारियों के जमाने से बहुत कठिन और संघर्ष का पेशा माना जाता है।

नरेंद्र दत्त-
इसमें कोई दो राय नहीं कि सौरभ द्विवेदी क़ा प्रस्तुतिकरण व भाषा विन्यास निसंदेह काबिलेतारीफ था. इंडिया टुडे ग्रुप का ये प्रोग्राम लल्लन टॉप सिर्फ और सिर्फ सौरभ द्विवेदी के कारण ही लोकप्रिय हुआ है. हाँ, लोकप्रिय होने के बावजूद भी उनपर बीजेपी समर्थक होने का ठप्पा तो लग ही चुका है।

धीरेंद्र गुप्ता-
इनके बोलने का अंदाज लाजवाब है। काफी बार ऐसा हुआ कि बेमन से देखना शुरू करता था पर इतनी शानदार प्रस्तुति होती थी कि पूरा इंटरव्यू देखे बिना मन नहीं मानता था। वैसे उम्मीद है कि वो जल्द एक नई पारी शुरू करेंगे।

वो बहुत काबिल और बेहतरीन पत्रकार हैं. क्यूंकि आपने सिर्फ़ उनके इंटरव्यू शोज़ देखे कभी सौरभ के आजतक की कॉपीज़ पढ़िए जब वो लिखते थे. कभी उनकी संपादकीय समझिये. आपका भ्रम टूट कर चूर हो जाएगा.- आर्यन

सतीश यादव-
पत्रकार कैसे भी हों मगर सच तो यही है कि लोगों ने इनको बहुत स्नेह दिया। कई मौकों पर हम इनकी पत्रकारिता पर रत्ती भर शक नहीं कर सकें। सौरव एक होस्ट के तौर पर lallantop को उसकी ऊंचाई तक ले गए थें, अब lallantop शायद ही इस ऊंचाई तक कायम रहे!

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3 Comments

3 Comments

  1. Gopal Jat

    January 7, 2026 at 10:57 pm

    ये किसने कहा कि सौरभ जी बीजेपी के समर्थक थे
    नहीं
    वो तो कट्टर कांग्रेसी हैं
    जरा ध्यान से देखो उनके वीडियो

  2. राज

    January 8, 2026 at 8:07 am

    Brainchild कमलेश किशोर सिंह का था. अरुण पुरी का नहीं. सौरभ ने उसे नर्चर किया.

  3. Vijay Saraf Meenaghe

    January 8, 2026 at 12:06 pm

    इसमें अचरज की कोई बात नहीं। यह तो हमेशा अधिक धन वाले व राजनीति से जुड़े लोगों की सांठगांठ से देश चलता है। बाकी कोई भी टेंलेंट किसी भी व्यक्ति का इनके रहमो कर्म पर इस्तेमाल होता है। हां,अगर टेंलेंट वाले व्यक्ति के पास कहीं से धन आ जाए। तो उसका रूप भी मौजूदा सरकार की तरफ किसी न किसी वजह से हो जाता है। जैसे अभी के इंडिया टुडे के आडिटर व रिपब्लिक के आडिटर इनका अन्दाज़ अन्दर से कुछ व बाहर कुछ होता है। जो कि लोगों को साफ दिखता है। सारे अखबार व टेलिमिडिया सरकार ही के रहमोकरम पर चलता है। अभी सोशल मीडिया की तरफ से इनमें फ़र्क आया है। परन्तु इन सभी के बावजूद आम व्यक्ति को बहुत कम लाभ मिला है। मैंने नहीं देखा कोई आम व्यक्ति किसी भी चैनल पर कोई इन्टरव्यू दे रहा हो। अधिकतर राजनीति लोगों, फिल्मों लोगों व अधिक धन वालों की बात होती है। आजकल रुतबा,धन व ऐयाशियां प्रधान हैं। सौरभ भी मिला जुला कहीं फंस कर रह गया है।

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