डॉ ओम शंकर-
क्या आप जल्दी मरना नहीं चाहते हैं? क्या आप 100 साल जीना चाहते हैं? अगर हां, तो मेरे इस पोस्ट को जरूर पढ़ें! 100 वर्ष से अधिक स्वस्थ जीवन जीना कोई भाग्य या संयोग नहीं है, बल्कि यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध और अनुशासित जीवनशैली का परिणाम है। दुनिया के सबसे अधिक आयु वाले लोगों पर हुए अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि वे कुछ विशेष सिद्धांतों का पालन करते हैं। आधुनिक चिकित्सा, प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी और जीवनशैली विज्ञान के आधार पर एक प्रभावी दीर्घायु जीवन योजना बनाई जा सकती है।
दीर्घायु का मूल सिद्धांत यह है कि मृत्यु को टालना नहीं, बल्कि बीमारियों को देर से आने देना ही वास्तविक लक्ष्य होना चाहिए। हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और मस्तिष्क संबंधी बीमारियाँ यदि 20 से 30 वर्ष तक टल जाएँ, तो 100 वर्ष से अधिक जीना एक वास्तविक संभावना बन जाता है। हृदय स्वास्थ्य इस पूरे ढांचे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक चिकित्सक के रूप में यह स्पष्ट है कि व्यक्ति की वास्तविक उम्र उसकी धमनियों की स्थिति से निर्धारित होती है।
यदि रक्तचाप 120/80 से कम रहे, एलडीएल कोलेस्ट्रॉल 55 mg/dL से कम रहे, आराम की स्थिति में हृदय गति 50 से 65 प्रति मिनट के बीच हो और HbA1c 5.5% से कम रहे, तो हृदय लंबे समय तक स्वस्थ रह सकता है। इसके लिए प्रतिदिन 45 से 60 मिनट तक तेज चलना या व्यायाम करना आवश्यक है, साथ ही ट्रांस फैट और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए तथा मेवे, बीज और अच्छे तेलों का सेवन करना चाहिए।
भोजन की भूमिका दीर्घायु में अत्यंत महत्वपूर्ण है। भूमध्यसागरीय और पारंपरिक भारतीय आहार का संतुलित मिश्रण सबसे उपयुक्त माना जाता है। भोजन में आधी मात्रा सब्जियों की होनी चाहिए, साथ में दालें, फलियां, बादाम और अखरोट जैसे मेवे, तथा सरसों या जैतून जैसे स्वस्थ वसा शामिल होने चाहिए।
कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल लाभकारी होते हैं। इसके विपरीत चीनी, मैदा, सफेद ब्रेड, अत्यधिक नमक और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए। भोजन सीमित समय के भीतर लेना और रात का भोजन जल्दी करना शरीर के चयापचय को बेहतर बनाता है।
मस्तिष्क को सक्रिय और स्वस्थ रखना भी उतना ही आवश्यक है। नियमित रूप से पढ़ना, लिखना, नई चीजें सीखना और सामाजिक रूप से जुड़े रहना डिमेंशिया के खतरे को कम करता है।
प्रतिदिन लगभग 20 मिनट ध्यान करना मानसिक शांति और मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। यह भी सिद्ध है कि अकेलापन धूम्रपान से भी अधिक हानिकारक हो सकता है।
व्यायाम को उम्र बढ़ाने की औषधि माना जा सकता है। इसमें केवल चलना ही नहीं, बल्कि शरीर को मजबूत बनाने के लिए शक्ति प्रशिक्षण, लचीलापन बनाए रखने के लिए योग और संतुलन के अभ्यास भी शामिल होने चाहिए। प्रतिदिन कम से कम 8,000 से 10,000 कदम चलना एक अच्छा लक्ष्य है। मजबूत मांसपेशियाँ उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करती हैं और शरीर को रोगों से बचाती हैं।
नींद शरीर के लिए पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है। प्रतिदिन 7 से 8 घंटे की गहरी नींद आवश्यक है, और रात 11 बजे से पहले सोना अधिक लाभकारी होता है। सोने से एक घंटे पहले स्क्रीन का उपयोग बंद कर देना चाहिए। खराब नींद हृदय रोग के खतरे को बढ़ाती है और जीवनकाल को कम करती है।
40 वर्ष की आयु के बाद शरीर में हार्मोन और मेटाबोलिज्म में बदलाव आने लगते हैं। इसलिए टेस्टोस्टेरोन, थायरॉइड और इंसुलिन रेजिस्टेंस की समय-समय पर जांच करवाना आवश्यक है। मांसपेशियों को बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि मांसपेशियाँ दीर्घायु का आधार मानी जाती हैं।
नियमित स्वास्थ्य जांच को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हर वर्ष लिपिड प्रोफाइल, HbA1c, किडनी और लिवर की जांच, विटामिन D और B12 की जांच करानी चाहिए। आवश्यकता होने पर ईसीजी और इको भी कराना चाहिए। 45 से 50 वर्ष के बाद हृदय की कैल्शियम स्कोर जांच और कैंसर की स्क्रीनिंग भी आवश्यक हो जाती है।
तनाव को एक मौन हत्यारा कहा जाता है। लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव हृदय रोग, कैंसर और अवसाद का कारण बन सकता है। ध्यान, आध्यात्मिकता और जीवन में उद्देश्य का होना तनाव को नियंत्रित करने में सहायक होता है। अनावश्यक विवादों से दूर रहना भी मानसिक शांति के लिए आवश्यक है।
कुछ आदतों से पूरी तरह दूरी बनाना जरूरी है। धूम्रपान बिल्कुल नहीं करना चाहिए, शराब का सेवन न के बराबर या बहुत सीमित होना चाहिए और जंक फूड का सेवन बहुत कम करना चाहिए।
जो लोग 100 वर्ष से अधिक जीते हैं, उनके जीवन में एक विशेष बात होती है—वे अपने परिवार से जुड़े रहते हैं, उनके जीवन में एक उद्देश्य होता है और समाज में उन्हें सम्मान प्राप्त होता है। निष्क्रिय जीवन या बिना उद्देश्य के जीवन जीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
आधुनिक विज्ञान कुछ उन्नत तरीकों की भी चर्चा करता है, जैसे इंटरमिटेंट फास्टिंग, ठंडे वातावरण के संपर्क में आना और शरीर में ऑटोफैगी की प्रक्रिया को सक्रिय करना। कुछ सप्लीमेंट्स जैसे ओमेगा-3, विटामिन D और मैग्नीशियम आवश्यकता अनुसार लिए जा सकते हैं।
अंततः दीर्घायु का सूत्र यह है कि हृदय स्वस्थ रहे, शरीर का चयापचय संतुलित रहे, मन शांत रहे और जीवन में अनुशासन बना रहे। इन सभी बातों का निरंतर पालन ही लंबे और स्वस्थ जीवन की कुंजी है।
यदि कोई व्यक्ति जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से बचता है, शारीरिक रूप से सक्रिय रहता है और मानसिक रूप से मजबूत बना रहता है, तो 100 वर्ष से अधिक तक स्वस्थ जीवन जीना पूरी तरह संभव है।


