नई दिल्ली। देश के कई औद्योगिक शहरों से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि रसोई गैस (LPG) की आपूर्ति में दिक्कतों और बढ़ती लागत के कारण छोटे और मझोले उद्योगों (MSME) पर दबाव बढ़ रहा है, जिसका असर अब मजदूरों पर भी दिखाई देने लगा है।
सूत्रों और स्थानीय स्तर पर मिल रही जानकारियों के मुताबिक Bengaluru के छोटे उद्योगों में उत्पादन घटने की बात सामने आई है। यहां बड़ी संख्या में काम करने वाले मजदूरों के बीच अस्थिरता बढ़ी है। बताया जा रहा है कि कुछ यूनिट्स ने उत्पादन 40–50% तक कम कर दिया है, जिससे रोजगार पर असर पड़ा है।
इसी तरह Pune के पिंपरी-चिंचवड़ औद्योगिक क्षेत्र और Surat के टेक्सटाइल हब से भी उत्पादन में गिरावट और यूनिट्स बंद होने की सूचनाएं सामने आ रही हैं। सूरत में कपड़ा उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि लागत बढ़ने और गैस आपूर्ति की अनिश्चितता के चलते कई इकाइयों ने काम सीमित कर दिया है।
पंजाब के Ludhiana से भी इसी तरह की स्थिति की खबरें हैं, जहां उद्योगों में सुस्ती के कारण मजदूरों का काम प्रभावित हुआ है।
इन परिस्थितियों के बीच कुछ इलाकों से मजदूरों के अपने गांवों की ओर लौटने की खबरें भी सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि शहरों में काम कम होने और खर्च बढ़ने के चलते मजदूर गांव लौटकर खेती या मनरेगा जैसे विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक कोई व्यापक आधिकारिक आंकड़ा या देशव्यापी पुष्टि सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि MSME सेक्टर पर दबाव कई कारणों से हो सकता है—जिनमें ऊर्जा लागत, कच्चे माल की कीमत और बाजार में मांग की स्थिति शामिल हैं।
इसके बावजूद, अलग-अलग शहरों से मिल रही ये सूचनाएं यह संकेत जरूर दे रही हैं कि जमीनी स्तर पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है और इसका असर मजदूर वर्ग पर पड़ रहा है।
फिलहाल, यह मुद्दा स्थानीय स्तर पर उभरती चिंता के तौर पर सामने है, जिस पर व्यापक और आधिकारिक तस्वीर आने का इंतजार है।
LPG की कमी के कारण कोविड काल की तरह मजदूरों का पलायन शुरू हो चुका है। बेंगलुरु के छोटे और मझौले उद्योगों में 20 लाख से ज्यादा मजदूर काम करते हैं। MSME ने 40–50% उत्पादन कम कर दिया है।
पुणे के पिंपरी–चिंचवड़ ओर सूरत में भी यही हाल है। सूरत में उत्पादन 60% कम होने से 70% NSME बंद हो चुके हैं।
पंजाब के लुधियाना और बेंगलुरु में भी भारी पलायन की खबरें हैं। ये सभी अपने गांव लौट रहे हैं, जहां चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी है। खेतों में काम करेंगे। कुछ मनरेगा में।
अगर बारिश अच्छी न हो तो इनके भूखे मरने की नौबत आएगी। भारत की पालतू गोदी मीडिया के कुकुर इस पर चुप हैं। -सौमित्र राय, पत्रकार



Shailesh Srivastava
March 22, 2026 at 9:08 pm
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