अमर उजाला भी बदला-बदला लग रहा है। प्रचार या खबरों की राजनीति को खबर बनाकर समझाने का काम सिर्फ अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ ने किया है। कहा जा सकता है कि हेडलाइन मैनेजमेंट वाली खबरों के प्रति संपादकों का समर्पण कुछ कम होता लग रहा है। खबर को चार कॉलम में फैलाने के लिए अब शायद आदेश ही नहीं, खबर भी वैसी चाहिये! अमर उजाला अपवाद हो सकता है।
संजय कुमार सिंह
आज दो बड़ी खबरें हैं, एक तो सामान्य खबर और दूसरी हेडलाइन मैनेजमेंट वाली खबर। अच्छी बात यह है कि जो सामान्य तौर पर खबर है वह खबर की तरह सामान्य तौर पर छपी हैं लेकिन हेडलाइन मैनेजमेंट वाली खबर को बहुत कम अखबारों ने छोड़ा है पर महत्व कम ही दिया है। एक खबर है, दिल्ली दंगे की साजिश रचने के आरोप में 2020 से गिरफ्तार उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य को कल भी जमानत नहीं मिली। हेडलाइन मैनेजमेंट वाली दूसरी खबर है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह रोना कि उनकी मां को गाली दी गई। मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रोना जानबूझ कर लिख रहा हूं क्योंकि मेरा (और बहुत सारे लोगों का) मानना है कि प्रधानमंत्री की मां को गाली दी गई तो अपराध हुआ है, अपराधी को गिरफ्तार करके उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिये और जो कार्रवाई हो उससे प्रधानमंत्री को संतुष्ट होना चाहिये क्योंकि यही व्यवस्था है और 10 साल उनके सरकार में रहने के बाद है। अगर इंदिरा गांधी से भी ज्यादा समय तक सत्ता में रहने का रिकार्ड बनाने के बाद कोई ऐरा-गैरा उन्हें मां की गाली दे सकता है, वे कुछ नहीं कर पाये या नहीं किया तो रोना व्यर्थ है, नाटक है या संभव है राजनीति हो, वोट बटोरने की अंतिम चाल हो। मैं नहीं जानता क्या है पर हेडलाइन मैनेजमेंट तो है ही। और इसलिये मैंने प्रधानमंत्री का रोना लिखा है। सुर्खियां बटोरने के लिए निजी हमले या मामले में प्रधानमंत्री कार्रवाई नहीं करवा सकें, कोई इसकी हिम्मत करे, इतना अनैतिक हो – यह उनके लिए शर्मनाक है। उनकी दस साल की सत्ता और व्यवस्था पर नालायकी और निकम्मेपन का सबूत है।

हेडलाइन मैनेजमेंट की इस खबर से पहले, आज की वास्तविक खबर – पंकज चतुर्वेदी की पोस्ट के अनुसार, फरवरी 2020 में उत्तर पूर्वी दिल्ली में दंगे हुए, 57 लोग मारे गए। ट्रायल कोर्ट से एक के बाद एक मुजरिम बरी हो रहे हैं। उधर कपिल मिश्रा के खिलाफ शिकायत पर मुकदमा दर्ज करने की अर्जी गवाही होने के बावजूद पांचवी बार टाल दी गई है। शरजील इमाम दिल्ली दंगों से पहले ही गिरफ्तार हो गया था। उसके बाद खालिद सैफी को पुलिस साथ ले गई और निर्मम पिटाई की। मेडिकल में कह दिया कि भागते हुए चोट लगी। इन लोगों की जमानत की अर्जी आज दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा अस्वीकार करना न्याय नहीं, राजनीतिक फैसला हैं। सुप्रीम कोर्ट के अपने आदेशों के खिलाफ है। यह उस सरकार के शासन में है जो 30 दिन जेल में रहने पर इस्तीफे का कानून बनाना चाहती है। विधेयक पेश किया जा चुका है और उसका प्रचार जारी है। यह केस उदाहारण है कि एक बार यूएपीए में फंसा देंगे तो 30 दिन क्या 30 महीने जमानत नहीं होगी। यह उसी व्यवस्था का हिस्सा है जिसमें प्रचारक पत्रकार को एक हफ्ते में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई थी और रिपोर्टिंग करने उत्तर प्रदेश जा रहे केरल के पत्रकार को गिरफ्तार किया गया तो एक साल से ज्यादा जमानत नहीं मिली। मामले का क्या हुआ यह ना तो इस पत्रकार के मामले में पता चला ना उस पत्रकार के मामले में। जहां तक 30 दिन जेल में रहने पर पीएम, सीएम और एमपी का पद जाने की बात है, पीएम के खिलाफ तो कोई मामला ही नहीं है, चुनाव आयोग शपथपत्र की जांच भी शायद शपथपत्र के साथ शिकायत मिलने पर ही करेगा। हालांकि, तमाम मामलों की जांच नहीं की है तो इसमें करेगा इसकी भी उम्मीद नहीं है। फिर भी देश के मीडिया का बड़ा हिस्सा सरकार का प्रचार करने में लगा है और हेडलाइन मैनेजमेंट की खबरों से गंभीर मुकाबले के बाद ही खबरों को पहले पन्ने पर जगह मिलती है। आज ये दो खबरें बेहद स्पष्ट उदाहरण हैं। इस सरकार ने विपक्षी, आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री समेत कई मंत्रियों को बिना सबूत महीनों जेल में रखा, इनमें एक के खिलाफ अदालत के आदेश से मामला बंद हो चुका है। झारखंड के मुख्यमंत्री के साथ भी ऐसा ही हुआ। भले उन्होंने गिरफ्तारी से पहले इस्तीफा दे दिया था। इसके बावजूद सरकार 30 दिन जेल में रहने पर पद जाने वाला विधेयक लेकर आई है। मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी, पहले से सार्वजनिक डिग्री को निजी दस्तावेज मान लिये जाने और अब पांच साल से ज्यादा समय से गिरफ्तार लोगों (युवा छात्रों) को जमानत नहीं मिलने जैसे नामुमकिन मुमिकिन होने के बावजूद उदाहरण इंदिरा गांधी की इमरजेंसी में ज्यादाती का दिया जाता है और अखबार कोरस गाते हैं।
ऐसी व्यवस्था वाली सरकार के मुखिया चुनाव जीतने के लिए जाने जाते हैं। अब उनपर चुनाव चोरी का आरोप है। इस बार के बिहार चुनाव की तैयारी में पहलगाम की वारदात के बाद पुलवामा व डोकलाम की ही तरह पर उससे ज्यादा गंभीर, राजनीतिक और नाटकीय ऑपरेशन सिन्दूर की चाल चली गई। इससे बात नहीं बनी और वोट चोरी का गंभीर व ठोस आरोप लगा तो कार्रवाई और सुनवाई तो छोड़िये, प्रधानमंत्री को गाली दी गई और यह प्रधानमंत्री या व्यवस्था के लिए चाहे जितना शर्मनाक हो, प्रधानमंत्री को तुंरत सख्त कार्रवाई का आदेश देना चाहिये था या उसकी आलोचना करके उसके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई (या पिटाई आदि) नहीं करने का निर्देश भी दिया जा सकता था पर जो भी होता, तुरंत होने देना चाहिये था या फिर बिहार में अपने समर्थन वाली सरकार की कार्रवाई का इंतजार करना चाहिये था। प्रधानमंत्री ने क्या किया पता नहीं लेकिन सार्वजनिक तौर पर उन्होंने कुछ किया या बोला ऐसा मुझे मालूम नहीं है। आप जानते हैं कि गाली देने की घटना एक ऐसे मंच से हुई जो राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा के दौरान आयोजित एक राजनीतिक रैली के लिये तैयार की गई थी। इस अपमानजनक टिप्पणी का आरोपी मोहम्मद नौशाद को बताया गया है। घटना के बाद, संभवतः 27 अगस्त 2025 को उसे गिरफ्तार कर 14 दिनों के न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है। कुछ अखबारों ने उसे कांग्रेस का कार्यकर्ता बताया है जबकि सोशल मीडिया पर उसे भाजपा नेताओं का करीबी कहा गया है, फोटो भी है। गिरफ्तारी के बावजूद इस संबंध में जानकारी स्पष्ट नहीं है और भ्रम है तो कारण समझा जा सकता है। संभव है, दोनों जानकारी सही हो या दोनों गलत हो पर व्यवस्था जो है वह आप समझ सकते हैं। आखिर इसे स्पष्ट क्यों नहीं किया गया और क्यों कोई गलत खबर दे पा रहा है या किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है।
वैसे भी क्या यह संभव है कि गाली देने वाले का संबंध कांग्रेस या राजद से हो और सोशल मीडिया पर ऐसा नहीं बताया जाये या सिर्फ उलटा रहे। जो भी हो, घटना के कई दिनों बाद प्रधानमंत्री ने कल उसकी चर्चा की जिसे उनका रोना कहा जा रहा है और प्रियंका गांधी का ऐसा एक वीडियो कल निकल आया था। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री अब इस गाली का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में हैं और कल इसकी चर्चा हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग है। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री को गाली दी गई और उसकी उन्होंने चर्चा की तो खबर बनती है और भले देर से की पर खबर का महत्व कम नहीं होगा पर खबर कुछ अलग होनी चाहिये थी और वैसी खबर आज सिर्फ द टेलीग्राफ में है। अखबार ने इस खबर (या प्रधानमंत्री की चाल) से जुड़ी खबर को मदर ऑफ ऑल कार्ड्स यानी तुरुप का पत्ता कहा है। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, चुनाव से पहले नरेन्द्र मोदी ने गालियों के लिए विपक्ष पर निशाना साधा। अखबार में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं मिलने की खबर इसके साथ ही सिंगल कॉलम में है। कोई दो राय नहीं है कि आरोपी की गिरफ्तारी के इतने समय बाद प्रधानमंत्री इसके लिए कांग्रेस या राजद को दोषी बतायें और तब तक यह स्पष्ट नहीं हुआ हो कि आरोपी किस पार्टी का समर्थक है या विरोधियों का है तो इसका खुलकर उल्लेख न करें और पुलिस के समक्ष उसके बयान का हवाला देकर यह साबित नहीं करें कि गाली देने के इस मामले में कांग्रेस या राजद का हाथ है।
खासकर तब जब राहुल गांधी की ओर से यह कहा जा चुका है और प्रचारित है कि गाली देने के खिलाफ काले झंडे दिखाने वालों से राहुल ने बात की और यह स्पष्ट कर दिया है कि वह उनका आदमी नहीं था, उनसे संबंध नहीं है और जब गाली दी गई तब राहुल या तेजस्वी वहां नहीं थे। इसलिए यह मुद्दा नहीं है और मुद्दा बनाने के लिए जरूरी है कि आरोपी को कांग्रेस या राजद या राहुल अथवा तेजस्वी का करीबी बताया जा सके। इसके बिना आरोप का कोई मतलब नहीं है। इसके बावजूद आज यह खबर दि एशियन एज में लीड है। मुख्य शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा – “हर किसी की मां का अपमान हुआ है : मोदी ने कांग्रेस राजद की आलोचना की”। फ्लैग शीर्षक है, मैं अपनी मां को गाली देने वालों को माफ कर सकता हूं पर लोग नहीं करेंगे। प्रधानमंत्री ने बिहार की महिलाओं के लिए जीविका निधि की शुरुआत की। गाली सुनने और उसे भुनाने वाले प्रधानमंत्री के शासन में पांच साल से ज्यादा समय से गिरफ्तार धर्म विशेष के पांच लोगों को जमानत नहीं मिलना भी बड़ी खबर है। लेकिन दि एशियन एज में आज यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। कल दिन में भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय का यह आरोप चर्चा में था कि कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के दो एपिक कार्ड हैं और मतदाता सूची में उनका नाम दो जगह है। इसपर पवन खेड़ा ने कहा था कि हमें मांगने पर भी डिजिटल मतदाता सूची नहीं दी जा रही है जबकि चुनाव आयोग ने भाजपा को दे रखी है। इसके साथ उन्होंने यह भी कहा था, हम भी यही कह रहे हैं। वे हमारे साथ आयें तब हम मिलकर चुनाव आयोग से काम कराएंगे। दि एशियन एज में इसके बाद की खबर है ताकि अमित मालवीय के पास डिजिटल मतदाता सूची होने की खबर को ज्यादा महत्व न मिले।
द हिन्दू में पहले पन्ने पर आधे पन्ने से कम लेकिन विज्ञापन है। इसमें प्रधानमंत्री की मां को गाली दिये जाने की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। दूसरी ओर, 2020 के दंगों के लिए उमर खालिद और अन्य को हाईकोर्ट से जमानत न मिलने की खबर अंदर होने की सूचना पहले पन्ने पर है। इंडियन एक्सप्रेस में जमानत नहीं मिलने की खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। खबर के साथ उमर खालिद और शरजील इमाम की फोटो भी है। खबर टॉप पर फ्लैग शीर्षक और तीन लाइन के शीर्षक के साथ है। इसके मुकाबले हेडलाइन मैनेजमेंट वाली प्रधानमंत्री की मां को गाली की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। जमानत न मिलने की खबर के साथ संबद्ध खबर अंदर होने की सूचना भी है। प्रधानमंत्री की अब मणिपुर जाने की योजना भी बड़ी खबर है। इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर के साथ बताया है कि प्रधानमंत्री ने मां के अपमान के लिए राजग कांग्रेस की आलोचना की, शीर्षक खबर अंदर पेज छह पर है। हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की लीड दिलचस्प है। हिन्दी में यह कुछ इस प्रकार होगा – प्रधानमंत्री ने कहा आर्थिक स्वार्थीपने के बावजूद भारत बुलंदियों पर है। अंग्रेजी में शीर्षक पढ़कर मुझे लगा कि अपने स्वार्थीपने को बताने या स्वीकार करने की क्या जरूरत है। और प्रधानमंत्री ने ऐसा क्यों कहा है। खबर पढ़ने से पता चला कि वे दूसरे देशों के स्वार्थीपने की बात कर रहे हैं और शीर्षक में अंग्रेजी के शब्दों का खेल भी है। आप जानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नरेन्द्र मोदी की (और इस तरह भारत की भी) नाक में दम कर रखा है। राहुल गांधी चुनौती दे चुके हैं कि मोदी एक बार संसद में कह दें कि ट्रम्प युद्ध विराम कराने का दावा करते हुए झूठ बोल रहे हैं। पर यह सब नहीं हुआ है। आज हिन्दुस्तान टाइम्स के इस शीर्षक में ट्रम्फिंग शब्द का इस्तेमाल किया गया है और भावार्थ किया जाये तो शीर्षक में स्वार्थीपने का अर्थ ट्रम्प के बावजूद भी हो सकता है। हालांकि, अगर यह ट्रम्प से मजे लेने के लिए नहीं है तो विचित्र है कि किसी देश को आर्थिक मामलों में स्वार्थी क्यों नहीं होना चाहिये और क्या भारत या नरेन्द्र मोदी स्वार्थी नहीं हैं। अगर आर्थिक मामलों में हमारा देश स्वार्थी नहीं है और पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट करके भी कीमत कम नहीं की जा रही है तो यह देश भक्ति नहीं है। भले स्वार्थी न होना हो। दूसरे देश के मामले में आप उदारता दिखायें और देशवासियों से मिलावट करके भी वही वसूली करें तथा पूर्व में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी तेल की कीमत कम होने पर टैक्स बढ़ाकर जनता से वसूली की गई है।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने मोदी की महानता बताने वाली इस खबर के साथ विपक्ष पर उनके हमले की खबर भी छापी है और लिखा है, मां को गाली के मुद्दे पर मोदी ने विपक्ष पर हमला किया कहा, बिहार माफ नहीं करेगा। इसी पन्ने पर कुछ नीचे दो कॉलम की एक खबर बताती है कि उमर खालिद, शरजील इमाम और सात अन्य को जमानत नहीं मिली। खबर के साथ उमर खालिद और शरजील इमाम की आधे-आधे कॉलम की फोटो भी है। मतलब हेडलाइन मैनेजमेंट ऊपर, खबर नीचे। टाइम्स ऑफ इंडिया में मामला उल्टा है। यहां जमानत नहीं मिलने की खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड है। शीर्षक है, “दंगों की ‘साजिश’: उमर, शरजील को जमानत नहीं”। इंट्रो है, आठ अन्य के लिए भी कोई राहत नहीं, सभी पांच साल से ज्यादा समय से जेल में है। इसके मुकाबले हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक देखिये और समझिये कि खबर लिखने में ही नहीं शीर्षक लगाने और अखबार में जगह तय करने वालों की भी विचारधारा होती है या होने का असर होता है। इसके मुकाबले प्रधानमंत्री की मां को गाली और हेडलाइन मैनेजमेंट की खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में पन्ने के बीच में है और प्रधानमंत्री की फोटो आधे कॉलम की है।
हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर दोनों खबरें हैं। मां के अपमान की खबर दो कॉलम में, दो लाइन के शीर्षक के साथ पर छोटी है। बीच में यह भी हाईलाइट किया गया है कि एनडीए की महिला शाखा ने कल पांच घंटे के बिहार बंद का अह्वान किया है। शीर्षक है – मोदी ने कहा, मां के अपमान को बिहार की जनता माफ नहीं करेगी। अगर ऐसा है तो सत्तारूढ़ एनडीए की महिला शाखा को पांच घंटे का बिहार बंद करने की क्या जरूरत है? वैसे भी मां का अपमान केवल महिला शाखा का नहीं होना चाहिये और विरोध में आरोपी को गिरफ्तार किये जाने के बाद पांच घंटे के प्रतीकात्मक बंद का मतलब राजनीति ही है अपमान या उसका बदला लेना नहीं। जो भी हो, अखबार में खबर ऐसे ही है। इसके मुकाबले उमर खालिद की खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक है – उमर खालिद,शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज। देशबन्धु में यह खबर टॉप पर सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, दिल्ली हाईकोर्ट ने (उमर) खालिद, शरजील (इमाम) की जमानत ठुकराई। दैनिक भास्कर में उमर, शरजील समेत 9 की जमानत याचिका खारिज शीर्षक से यह खबर तीन कॉलम में है। लेकिन मां को गाली वाली खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अमर उजाला में पहले पन्ने पर साढ़े छह कॉलम की टॉप खबर का शीर्षक है, देश में बनी छोटी चिप दुनिया में लाएंगी सबसे बड़ा बदलाव : मोदी। भले इससे खबर दी जा रही हो कि भारत में अब चिप बनने लगे हैं पर यह इस बात की भी सूचना है कि अभी तक नहीं बनते थे। 90 के दशक में जब भारत में मोबाइल फोन लांच हुए थे तब मैंने पहली बार चिप के बारे में जाना था और बताने वाले ने बताया तथा मैंने यही समझा था कि चिप हाथ के अंगूठे के नाखून के बराबर होते हैं और वही मोबाइल की जान होती है या उसी से उसका दिल धड़कता है। बाद में जब मोबाइल खरीदा और सिम कार्ड लिया तो वैसा ही पाया। उसके बाद शायद दो बार सिम छोटे हुए हैं और बदलना पड़ा है। इस बीच कभी ख्याल नहीं आया कि ये चिप भारत में नहीं बनते हैं। कारों की प्रेस विज्ञप्ति का अनुवाद करने के दौरान एक खबर पढ़ने को मिली थी कि चिप न होने के कारण अब कारों की एक ही चाभी दी जायेगी और दूसरी चाभी बाद में दी जायेगी। कोविड के बाद यह सामान्य हो गया था।
मुझे कभी नहीं लगा कि सामान्य दिखने वाले इतने महत्वपूर्ण चिप भारत में नहीं बनते हैं। दूसरी ओर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में लगने वाले सर्किट बोर्ड भी समय के साथ छोटे हुए हैं। और मुझे उन्हें बनाना मुश्किल लगता था। पर वे भारत में जमाने से बनते रहे हैं। एक सरकारी कंपनी में जाकर मैं इनका निर्माण भी देख आया था। जो भी हो, यह सब ये बताने के लिए चिप निर्माण जितना महत्वपूर्ण हो, इतनी बड़ी खबर कहीं नहीं दिखी। अमर उजाला में मां की गाली वाली खबर पहले पन्ने पर नहीं है। आज पहले पन्ने पर विज्ञापन भी ज्यादा (कम से कम आधा पन्ना तो अक्सर होता है) नहीं है। ऐसे में मुझे दूसरे पहले पन्ने की उम्मीद नहीं थी। इसलिये उत्सुकता हुई की अमर उजाला ने मां की गाली वाली खबर नहीं छापी क्या? पता चला यह दूसरे पहले पन्ने पर वैसे ही सात कॉलम में है। मुझे नहीं लगता इससे ज्यादा कुछ बताने की जरूरत है। फिर भी, यह बताना जरूरी लगता है कि अखबार का उपशीर्षक है, राजद-कांग्रेस के मंच से अपशब्दों पर पीएम मोदी की पहली प्रतिक्रिया। प्रधानमंत्री ने बिहारियों को खुश करने के लिए यह भी कहा है और अमर उजाला ने उसे भी छाप दिया है, समृद्ध परंपरा वाले राज्य में जो हुआ, कल्पना नहीं थी। मुझे याद आया कि मोदी जी शादी पर महिलाओं द्वारा बारातियों के सम्मान में गाये जाने वाले गीत सुनलेंगे तो समृद्ध परंपरा के बारे में क्या कहेंगे। खासकर तब जब ये गाने लाउडस्पीकर पर सुनें। हे राम!

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


