दिल्ली पुलिस में पदस्थ आईपीएस अफसर ने इंस्पेक्टर को पीटा, शिकायत प्रधानमंत्री तक पहुंची

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के इंस्पेक्टर कर्मवीर ने गृहमंत्री, उपराज्यपाल, पुलिस आयुक्त से गुहार लगाई है कि दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता/ नई दिल्ली जिला के डीसीपी मधुर वर्मा के खिलाफ थप्पड़ मारने, गाली गलौज करने और अवैध रूप से बंधक बनाने के आरोप में एफआईआर दर्ज की जाए.. घटना 10 मार्च की रात को तुग़लक़ रोड इलाके की है… हाईकोर्ट की जज मुक्ता गुप्ता के यहां शादी समारोह था… इंस्पेक्टर कर्मवीर अपने स्टाफ के साथ वहां तैनात था.

तभी डीसीपी मधुर वर्मा की पंजाब नंबर की एक SUV गाड़ी और सरकारी कार तुगलक रोड थाने की ओर से ग़लत दिशा में आई जिससे ट्रैफिक जाम हो गया। इंस्पेक्टर कर्मवीर मलिक ने कार चालक से वहां जाम न करने के लिए कहा. इंस्पेक्टर का आरोप हैं कि SUV कार के चालक डीसीपी मधुर वर्मा के आपरेटर रोहित ने उसे धमकी दी कि कार डीसीपी की है और यह तो ऐसे ही चलेगी. इंस्पेक्टर के अनुसार रात करीब साढ़े दस बजे ट्रैफिक की नई दिल्ली रेंज के डीसीपी ने उसे फोन किया और डीसीपी मधुर वर्मा से बात करने को कहा. उसने डीसीपी मधुर वर्मा को फोन किया तो डीसीपी ने उसे डांटा और तुग़लक़ रोड़ थाने में बुलाया. इसके बाद तुगलक रोड थाने के एसएचओ ने फोन किया और थाने आकर डीसीपी से मिलने को कहा.

इंस्पेक्टर का आरोप है कि जब वह थाने पहुंचा तो डीसीपी मधुर वर्मा अपनी कार के पास खड़े थे. वहां पहुंचते ही डीसीपी ने उसका मोबाइल फोन छीन लिया. डीसीपी उसे गालियां देने लगे. उसने विरोध किया तो डीसीपी ने उसे थप्पड़ मारे. इसके बाद डीसीपी ने एसएचओ से उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर हवालात में बंद करने को कहा और खुद वहां से चले गए.

इंस्पेक्टर का आरोप है कि उसे किसी को फोन भी नहीं करने दिया गया. रात करीब पौने दो बजे उसके ड्राइवर ने ट्रैफिक पुलिस के कंट्रोल रूम को इस बारे में जानकारी दी. इंस्पेक्टर कर्मवीर ने अगले दिन उपरोक्त शिकायत गृहमंत्री, उपराज्यपाल, पुलिस आयुक्त और दक्षिण क्षेत्र कानून एवं व्यवस्था के विशेष आयुक्त से की. इंस्पेक्टर कर्मवीर ने डीसीपी मधुर वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और विभागीय कार्रवाई की मांग की है. इंस्पेक्टर कर्मवीर की शिकायत सोशल मीडिया पर भी वायरल है.

आईपीएस मधुर वर्मा
इंस्पेक्टर कर्मवीर मलिक

पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक, विशेष आयुक्त रणबीर कृष्णियां ताज हसन, डीसीपी मधुर वर्मा और एडिशनल पीआरओ अनिल मित्तल को इस पत्रकार द्वारा मोबाइल फोन/ ई-मेल/ वाट्स एप/ एसएमएस संदेश भेज कर इस संगीन/ गंभीर आरोप पर पुलिस का पक्ष बताने को कहा गया. किसी ने भी जवाब नहीं दिया है. मधुर वर्मा दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता भी हैं.

दिल्ली पुलिस के एडिशनल पीआरओ अनिल मित्तल ने सिर्फ इतना कहा कि ऑफिसियली अभी इस मामले में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. उन्होंने आरोपों की पुष्टि या खंडन नहीं किया. बाद में देर शाम को अनिल मित्तल ने बताया कि तथ्यों की पड़ताल के लिए सतर्कता विभाग द्वारा जांच के आदेश दिए गए हैं.

इंस्पेक्टर कर्मवीर ने आशंका जताई है कि डीसीपी को बचाने के लिए थाने के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज नष्ट की जा सकती है. मधुर वर्मा द्वारा पीआरओ कक्ष की साज सज्जा में लाखों रुपए खर्च करने के अलावा गलत हिन्दी वाला विज्ञापन जारी करने का मामला भी इस पत्रकार द्वारा उजागर किया गया था। क्या गृहमंत्री /उपराज्यपाल‌/ पुलिस आयुक्त बता सकते हैं कि मधुर वर्मा को उतरी जिला पुलिस उपायुक्त के पद से हटाया क्यों गया था? अगर हटाने का फैसला सही था तो फिर नई दिल्ली जिला पुलिस उपायुक्त के पद पर तैनात करने का आधार/ पैमाना क्या है?

क्या पुलिस कमिश्नर बता सकते हैं कि पंजाब नंबर की वह SUV कार क्या डीसीपी मधुर वर्मा की है? क्या इस निजी कार की खरीद के बारे में नियमानुसार सरकार को सूचना दी गई है? अगर कार मधुर वर्मा की नहीं है तो किस व्यक्ति की है? निजी कार को अपने आपरेटर पुलिस कर्मी रोहित द्वारा चलवाना भी तो डीसीपी द्वारा अपने पद का दुरुपयोग कर अपने निजी कार्य के लिए मातहत का इस्तेमाल करना है.

आईपीएस अफसर का दिमागी स्तर/समझ : डीसीपी पद के अहंकार में चूर मधुर वर्मा ने अपने आपरेटर रोहित के कहने /भड़काने में आकर इंस्पेक्टर कर्मवीर को पीट कर दिमागी स्तर / दिवालियापन का ही परिचय दिया. इससे पता चलता है कि आईपीएस को उसके चहेते मातहत कैसे इस्तेमाल कर लेते हैं.

डीसीपी की दोनों कारों का चालान भी हो : इस मामले में यह साफ़ है डीसीपी मधुर वर्मा की निजी SUV और सरकारी कारें ग़लत दिशा से आने से जाम लगा. इंस्पेक्टर कर्मवीर में तो यातायात के नियमों का उल्लघंन करने वाले डीसीपी की कारों के चालान काटने की हिम्मत नहीं थी. पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक और ट्रैफिक पुलिस के विशेष आयुक्त ताज हसन को डीसीपी मधुर वर्मा की कारों के चालान काट कर अपनी जिम्मेदारी/ हिम्मत और कर्तव्य पालन में ईमानदारी का परिचय देना चाहिए. तभी यह साबित होगा की यातायात नियमों का उल्लघंन करने वाला आईपीएस भी बख्शा नहीं जाता है.

गृहमंत्री /उपराज्यपाल/ पुलिस आयुक्त… अगर आप लोग ईमानदार हो तो ईमानदारी का नज़र आना भी ज़रूरी है. कुछ तो संविधान/ नियम कायदों का सम्मान/लिहाज/ शर्म करो. अगर आपके निजी स्वार्थ नहीं है तो फिर ऐसे आईपीएस के खिलाफ कार्रवाई करके कानून का राज कायम करके दिखाए. ऐसे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने से ही अन्य आईपीएस को भी सबक मिलेगा. वैसे लानत तो तुगलक रोड थाने के एसएचओ सहित उन सभी पुलिस वालों पर भी है जिनके सामने निरंकुश डीसीपी इंस्पेक्टर को पीटता रहा और वह गुलामों की तरह मूकदर्शक बने रहे. एसएचओ अगर ईमानदार होता तो इंस्पेक्टर को पीटने वाले डीसीपी को हवालात में बंद कर कानून का पालन कर मिसाल बना सकता था.

आईपीएस की करतूत : आईपीएस अफसरों के खराब व्यवहार के कारण ही मातहत तनावपूर्ण /गुलामों का जीवन जीने को मजबूर हैं. तत्कालीन पुलिस कमिश्नर क‌ष्णकांत पाल के समय ऐसे ही एक इंस्पेक्टर देवेंद्र मनचंदा ने आत्महत्या कर ली थी. देवेंद्र के परिवार ने इसके लिए पुलिस कमिश्नर को जिम्मेदार ठहराया था. तत्कालीन पुलिस कमिश्नर कृष्ण कांत पाल ने एक बार आर्थिक अपराध शाखा के डीसीपी दिनेश भट्ट से दुर्व्यवहार किया था लेकिन दिनेश भट्ट ने पाल को पलट कर करारा जवाब दिया. कृष्ण कांत पाल पर संयुक्त पुलिस आयुक्त के पद पर रहते हुए एक इंस्पेक्टर ने भी बदतमीजी का आरोप लगाया था. इंस्पेक्टर ने तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अजय राज शर्मा से शिकायत की थी. इस पर अजय राज शर्मा ने इंस्पेक्टर से माफी मांग कर बड़प्पन दिखाया.

कुछ समय पहले की बात है आईपीएस एसएस यादव ने उतरी जिला के मौरिस नगर थाने के सब इंस्पेक्टर राम चंद्र को अपने एक दोस्त के सामने ना केवल गालियां दी बल्कि सब इंस्पेक्टर से उठक बैठक भी लगवाई थी. सब इंस्पेक्टर इतना आहत हुआ कि आत्महत्या की बात करने लगा. यह मामला भी रोजनामचे में दर्ज किया गया. उत्तर पश्चिमी जिला के तत्कालीन डीसीपी वीरेंद्र चहल (वर्तमान विशेष आयुक्त) द्वारा गाली गलौज किए जाने की शिकायत तो मुखर्जी नगर के तत्कालीन एसएचओ सुरेंद्र संड ने रो़जनामचे में ही दर्ज कर दी थी.

दक्षिण जिला के तत्कालीन डीसीपी विवेक गोगिया ने भी एसएचओ राजेंद्र बख्शी से बदतमीजी की लेकिन राजेंद्र बख्शी ने विवेक गोगिया को मुंहतोड़ जवाब दिया. मातहतों से बदतमीजी कर घटिया संस्कार का परिचय देने वाले ऐसे आईपीएस के खिलाफ कार्रवाई नहीं किए जाने से ऐसे मामले बढ़ रहे हैं. आईपीएस अफसर भूल रहे हैं मातहतों के दम पर ही वह टिके हुए हैं. मातहतों की वजह से वह सफल अफसर कहलाते हैं. ऐसे आईपीएस को याद रखना चाहिए कि अगर अपनी हरकतें बंद नहीं की तो एक दिन ऐसा भी हो सकता है कि परेशान मातहत पलट कर उन पर भी हाथ उठा देगा. मातहत को गुलाम समझ कर गालियां देने वाले आईपीएस घटिया परवरिश/संस्कार का परिचय देते हैं. नई दिल्ली जिला के तत्कालीन डीसीपी असद फारुकी ने तो वायरलेस पर ही तत्तकालीन पुलिस कमिश्नर मुकुंद बिहारी कौशल और गृहमंत्री तक के बारे में अभद्रता की थी.

लेखक इंद्र वशिष्ठ दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं और अपने बेबाक लेखन के लिए चर्चित हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.


आईपीएस मधुर वर्मा ने दिल्ली पुलिस के काबिल ट्रैफिक इंस्पेक्टर को मारे थप्पड़…. इंस्पेक्टर ने प्रधानमंत्री सहित अधिकारियों को दी शिकायत… ये क्या हो रहा है सीपी साब.

-प्रदीप महाजन (वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली)

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Comments on “दिल्ली पुलिस में पदस्थ आईपीएस अफसर ने इंस्पेक्टर को पीटा, शिकायत प्रधानमंत्री तक पहुंची

  • This is pure yellow journalism. It is very biased article. Over emphasis to prosecute the IPS officer badly smells an angle of conspiracy in which either the writer is wilfully involved or so naive that he in small thinking not able to realize that journalist should not judge an event but investigate at thana levels with eye witnesses.
    IPS officer has a clean image of honesty and good behavior.
    Powered corrupts absolute power corrupts absolutely. As Machiavelli said police at lower level are reigned in to not abuse their power by the control of IPS officers by an large. Therefore I read this article with a pinch of salt

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  • खालिद हुसैन says:

    फ़ोन नंबर को ब्लर कर देते किसी की जाती जानकारी आम नहीं होनी चाहिए .
    शुक्रिया.

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  • Ritesh Dixit says:

    Definitely there should be strict action against the officer law should be equal to everyone. Government need to prove it right now.

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  • This is a real fact of all belt services as an gifted tradition from ‘gore angrej’ to ‘kale angrej’. These kale angrej behave with subordinates like a slave. None can deny this fact except few whose has flourish good values and culture learnt by good parent, otherwise it is present all over India , either militarizes, paramilitaries, police or any other belt service, everywhere.

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