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आज के अखबार : महाभियोग के साये में मुख्य चुनाव आयुक्त, मनमानी, चुनावी मानक कुछ भी मुद्दा नहीं है

संजय कुमार सिंह

किसी ने नहीं कहा है कि बंगाल में चुनाव के नाम पर मजाक चल रहा है। पक्षपाती चुनाव आयुक्त तो बाकी देश में भी यही करेंगे लेकिन बंगाल और तृणमूल कांग्रेस का मामला चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग के पहले नोटिस के कारण अलग है लेकिन किसी को परवाह हो – ऐसी कोई खबर नहीं है। भ्रष्टाचार दूर करने के दावे और दिखावे तथा ना खाउंगा ना खाने दूंगा के बावजूद राज्यसभा चुनाव में क्रॉसवोटिंग भी चिन्ता का कारण नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज ने दहेज हत्या के एक जैसे 510 में से 508 मामलों में जमानत दे दी। शर्तें, भाषा, जमानत राशि सब समान है तो सुप्रीम कोर्ट ने खबर ली है। इसकी खबर इंडियन एक्सप्रेस ने दी है। आरएसएस के खिलाफ सिफारिश और भारत सरकार का बचाव में कूदना भी खबर है लेकिन आरएसएस को बचाते हुए।

तृणमूल कांग्रेस ने 13 मार्च को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग नोटिस दिया। 15 मार्च को मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य राज्यों के साथ पश्चिम बंगाल में भी चुनाव की घोषणा कर दी। प्रेस कॉन्फ्रेस में उनसे इस बारे में पूछा गया लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने कोई जवाब नहीं दिया। स्पष्ट तौर पर वे सवाल को टाल गए। दुनिया जानती है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के सिर पर महाभियोग की तलवार लटक रही है और इसका सामना करने वाले वे देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त है। इस नोटिस का नेतृत्व करने वाली पार्टी देश के एक राज्य में सत्तारूढ़ है, केंद्र सरकार उसे बेदखल करने के लिए क्या कुछ करती रही है वह सर्वविदित है फिर भी उनके द्वारा नियुक्त और पक्षपात का आरोप झेल रहे मुख्य चुनाव आयुक्त खुद को इससे अलग नहीं रख रहे हैं जबकि तमाम मामलों में कई जज खुद को मामले की सुनवाई से अलग करते रहे हैं। ऐसे मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में ‘निष्पक्ष’ चुनाव कराने के घोषित उद्देश्य और इरादे से पश्चिम बंगाल के डीजीपी और कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को पद से हटा दिया गया है।

देशबन्धु, नवोदय टाइम्स और अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। किसी ने इस मामले में नैतिकता का मुद्दा नहीं उठाया है। स्पष्ट तौर पर यह सब केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के फायदे के लिए हो रहा है। यह सब तब हो रहा है जब उसके पितृ संगठन आरएसएस के खिलाफ ‘अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग’ (यूएससीआईआरएफ) की 2026 की सालाना रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (आरएंडएडब्ल्यू या रॉ) पर पाबंदी लगाने की सिफ़ारिश की गई है। यह अलग बात है कि भारत सरकार ने आरएसएस की ओर से भी आरोपों को ‘खारिज’ कर दिया है। इस रिपोर्ट में भारत सरकार के संगठन रॉ के साथ आरएसएस पर भी धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के आरोप हैं। अमर उजाला ने केंद्र सरकार के पक्ष या बचाव को शीर्षक बनाया है। पांच कॉलम का शीर्षक है, “अमेरिकी रिपोर्ट में भारत की विकृत व पक्षपाती तस्वीर : केंद्र सरकार”। कहने की जरूरत नहीं है कि तस्वीर भारत की नहीं, आरएसएस और रॉ की है या भारत की तस्वीर इनके कारण है। अगर भारतीय संस्थाओं के कारण भारत की बुरी तस्वीर बने तो रिपोर्ट को बुरा कहने से पहले तस्वीर के बारे में विचार किया जाना चाहिए। पर यहां उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़ वाली स्थिति है तथा क़ुसूर हमेशा किसी और का बताया जाता है।

मेरे नौ अखबारों में अकेले देशबन्धु ने इस खबर को रिपोर्ट के आधार पर की गई सिफारिश की तरह छपा है। यह भी पांच कॉलम का बॉटम है और इसका शीर्षक है, आरएसएस और रॉ पर प्रतिबंध लगाया जाए। रिपोर्ट स्लग से फ्लैग शीर्षक है, अमेरिका के ‘अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने सरकार से सिफारिश की है। इसके साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल। इसमें कहा गया है कि आयोग ने 2025 की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भी अमेरिकी विदेश विभाग से भारत को “व्यवस्थित, निरंतर और घोर धार्मिक स्वतंत्रता उल्लंघनों में शामिल होने” के लिए ‘विशेष चिंता वाला देश’ घोषित करने की मांग की थी। कहने की जरूरत नहीं है कि स्थिति पर्याप्त गंभीर है, आरएसएस ने अपना बचाव किया हो या नहीं, भारत सरकार उसका बचाव कर रही है और उस पर आरोप को भारत पर आरोप माना जा रहा है। आप जानते हैं कि भारत और यहां के अखबार बांग्लादेश के मामले में बोलते रहे हैं, आरएसएस के बारे में अमेरिकी आयोग ने जो कहा है वह नया नहीं है फिर भी भारत सरकार उसका बचाव कर रही है और ऐसा लग रहा है जैसे वह सरकारी संगठन हो। दूसरी ओर, चुनाव आयोग भी सरकार की तरह काम कर रहा है और ऐसा लग रहा है जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ पेश प्रस्ताव का भी वही हश्र होगा जो संख्या बल के कारण लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ पेश प्रस्ताव का हुआ। अगर ऐसा हो या होने ही वाला हो तो भी लोकसभा अध्यक्ष की तरह मुख्य चुनाव आयुक्त को भी फैसला होने तक काम से अलग रहना चाहिए लेकिन प्रचारकों की पार्टी और सरकार का मामला ही अलग दिखता है। 

आज के अखबारों में राज्यसभा चुनाव के नतीजों की भी खबर है और खबरों से लगता है कि सरकारी पक्ष के लिए क्रॉस वोटिंग हुई है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, राज्य सभा चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत। उपशीर्षक है, बिहार में महागठबंधन के चार विधायक अनुपस्थित, सभी पांच सीटें एनडीए को। बिहार में चुनाव प्रचार के समय महागठबंधन को महाठगबंधन कहा जाता था। अब पता चल रहा है कि महागठबंधन के लोग किसके लिए ठगी कर सकते थे। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब पद, पैसा, प्रतिष्ठा या लालच के लिए होता है और भ्रष्टाचार दूर करने के नाम पर सत्ता में आए नरेन्द्र मोदी के 12 साल प्रधानमंत्री रहने के बाद भी हो रहा है जबकि आते ही उन्होंने ‘ना खाउंगा, ना खाने दूंगा’ जैसी गैर जरूरी घोषणा की थी और 50 दिन में सपनों का भारत तथा 100 दिन में विदेश में रखा काला धन वापस लाने की बात की थी। अब यह सब होना तो दूर, 2047 का लक्ष्य है और सरकारी तथा चुनाव आयोग की मनमानी का विरोध भी नहीं है। दूसरी ओर, सरकार का समर्थन अब भी खुल कर चल रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, “विपक्ष के लिए झटका : बिहार, उड़ीशा में नो शो और क्रॉस वोट। केंद्र की ऐसी सरकार में  चुनाव आयोग ने 24 घंटे से कम समय में ममता बनर्जी के सर्वोच्च अधिकारियों का तबादला कर दिया है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, बंगाल की मुख्यमंत्री ने कहा है कि अधिकारियों के तबादले भाजपा के इशारे पर किए गए हैं। अमर उजाला में छपी खबर के अनुसार यह महिला विरोधी मानसिकता है। मुख्यमंत्री ने कहा है, राज्य सरकार से सलाह लिए बिना आधी रात को मुख्य सचिव और बंगाली महिला नंदिनी चक्रवर्ती को हटाने का फैसला किया गया।

दि एशियन एज और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड आज दुबई हवाई अड्डे पर ईरान के हमले की खबर है। दि एशियन एज ने लिखा है कि इस हमले और युद्ध बढ़ने से ऊर्जा के वैश्विक संकट का डर बढ़ गया। लेकिन अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, होर्मुज खुलवाने पर अलग-थलग पड़े ट्रम्प, चीन बोला – पहले हमले बंद हों, जापान का भी इन्कार। आप जानते हैं कि होर्मुज स्ट्रेट की समस्या से निपटने के लिए ट्रम्प ने सात देशों से सहयोग मांगा था। द हिन्दू की लीड बताती है कि भारत अमेरिका से व्यापार करार पर दस्तखत तभी करेगा जब टैरिफ की दरों पर स्पष्टता होगी। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड विदेश मंत्री का बयान है जो एलपीजी की उपलब्धता से ही संबंधित है। आप जानते हैं कि सरकार शुरू से इस संकट को स्वीकार नहीं कर रही थी। कल संसद में भी एलपीजी संकट को लेकर हंगामा हुआ और यह नवोदय टाइम्स में लीड है। खबर के अनुसार, राज्यसभा में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि रसोई गैस की आपूर्ति प्रभावित होने से देश में हाहाकार मचा हुआ है। यह खबर किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने विदेश मंत्री के हवाले से बताया है कि, होर्मुज स्ट्रेट से जहाज को निकलने देने के संबंध में ईरान के साथ सीधी बात का नतीजा निकला। उन्होंने कहा कि इस मामले में कोई करार नहीं हुआ है और अलग-अलग मामलों के आधार पर क्लियरेंस मिल रहा है। समझना मुश्किल है कि गैस का संकट नहीं था तो क्लियरेंस मिलने की खबर को टाइम्स ऑफ इंडिया ने लीड क्यों बनाया है और अगर संकट था ही नहीं तो सिलेंडर के लिए लाइनें क्यों लगीं और स्टॉक था तो दो सिलेंडर के बीच बुकिंग का समय क्यों बढ़ाना पड़ा? स्टॉक के संबंध में सरकार की ओर से भ्रम फैलाने वाली जानकारी दी गई है और संभव है संकट का कारण यही हो। फिर भी सरकार की ओर से कांग्रेस को पैनिक क्रिएट करने का दोषी ठहराया गया। कोलकाता के अंग्रेजी अखबार, दे टेलीग्राफ ने लिखा है, सामूहिक तबादलों के बाद चुनाव से पहले के प्रशासन का कार्यभार संभालने के लिए ‘सख्त’ अधिकारियों ने कार्यभार संभला। मुख्य शीर्षक है, बंगाल के सर्वोच्च अधिकारियों पर चुनाव आयोग ने झाड़ू चलाया। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार अमेरिका नई शुल्क संरचना पर काम कर रहा है तब मलेशिया ने अमेरिकी व्यापार करार को निरस्त किया, यूरोपियन यूनियन ने निलंबित किया तो भारत ने सुरक्षा प्रावधानों की मांग की है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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