मजीठिया वेतनमान से अधिक वेतन लेने के कारण हो सकती है रिकवरी…
भले ही पैसों के दम से प्रेस मालिक मजीठिया वेज बोर्ड की धारा 20जे का इस्तेमाल पत्रकारों को वेतन नहीं देने के लिए कर रहे हों, पर यदि न्यायपालिका और सरकार बिना भय के और भ्रष्टाचार से मुक्त होकर काम करे तो प्रेस मालिकों से करोड़ों की वसूली हो सकती है।
- चूंकि प्रेस मालिकों का वेतन करोड़ों में होता है और मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश के पेज 19-20 में अंकित धारा ‘आई’ कहती है कि ”किसी भी कर्मचारी को संशोधित वेतनमान की अधिकतम सीमा से अधिक वेतन नहीं मिलेगा।”
- धारा ’20जे’ के मुताबिक संशोधित वेतनमान 1 जुलाई 2010 से सभी कर्मचारियों पर लागू होगा। हालाँकि, यदि कोई कर्मचारी इन सिफारिशों को लागू करने वाले अधिनियम की धारा 12 के तहत सरकारी अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से तीन सप्ताह के भीतर वह अपने मौजूदा वेतनमान और “मौजूदा परिलब्धियों” को बरकरार रखने के विकल्प का प्रयोग करता है। वह अपने मौजूदा वेतनमान और ऐसी परिलब्धियों को बरकरार रखने का हकदार होगा।
इस पर किसी प्रेस मालिक ने सरकारी अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से तीन सप्ताह के भीतर कंपनी में यह आवेदन दिया ही नहीं था कि मैं मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं लेना चाहता, मुझे जितना वेतन मिल रहा है उससे मैं संतुष्ट हूं अपने वेतन में कटौती नहीं कराना चाहता।
चूंकि अब सुनवाई का लाइव प्रसारण होता है इसलिए प्रेस मालिकों का साम, दाम, दंड, भेद कुछ भी नहीं चलेगा। बस जरूरत है सुप्रीम कोर्ट मे पुन: याचिका डालने की।
पुन: अवमानना का केस कैसे लगा सकते हैं?
- सूचना के अधिकार तहत केंद्रीय श्रम मंत्रालय से इसकी जानकारी मांग सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 7 फरवरी, 2014 को Writ Petition (Civil) No. 246 of 2011 में दिए गए आदेश और 19.6.2017 को Contempt Petition (Civil) No. 411 of 2014 in W.P.(C) No.246 of 2011 को पारित आदेश का पालन कितने समाचार पत्र संस्थानों ने किया।
- क्या सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश के परिपालन की सूचना किसी समाचार पत्र ने सरकार को दिया है? यदि हां तो उसकी सत्यापित प्रतिलिपि उपलब्ध कराई जाए।
यही जानकारी सुप्रीम कोर्ट से भी आरटीआई के माध्यम से मांग सकते हैं। चूंकि सुप्रीम कोर्ट में अब आनलाइन सूचना के अधिकार के तहत आवेदन कर सकते हैं। इसिलए यहां आवेदन लगाने में कोई परेशानी नहीं होगी।
उक्त आदेश मिलने के बाद पत्रकार पुन: सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मामला सुप्रीम कोर्ट में चला सकते हैं।
एक पत्रकार द्वारा भेज पत्र के अनुसार


