अभिषेक श्रीवास्तव-
आज पुस्तक मेला का आखिरी दिन! आह… दु:ख! नाम तो बदल ही दिया है प्रगति मैदान का भारत मंडपम्। किताबों को हथियारबंद फौजियों से चाक-चौबंद कर दिया है। अब कौन जाने अगले बरस वहां एक मुकम्मल सैन्य मेला ही शुरू हो जाए। फिर हम लोग पुरानी तस्वीरें साझा करें, तो मंत्रीजी बोलें कि ये तो AI से बनी हैं, ठोको मुकद्दमा! यही हुआ है बनारस में परसों रात। बकौल सरकार बहादुर, सब AI का खड़ा किया लफड़ा है। कुछ टूटा नहीं, कोई सीमा के भीतर नहीं घुसा।
अभी आठ लोगों पर मुकदमा हुआ है। और क्या ही दिलचस्प मामला है कि FIR करवाने वाला चेन्नई की ठेकेदार कंपनी का तमिल प्रोजेक्ट मैनेजर है। जिन्हें लगता है कि बनारस में ये सब पहली बार हो रहा है, जो हल्ला काट रहे हैं नींद से जागकर अचानक, वे दरअसल काशी के इतिहास को धीरज के साथ पढ़ने का विवेक नहीं रखते। वरना बीते आठ साल से बन रहे काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का ही यह अंग है, कुछ भी नया नहीं।
अरे, यही तो उत्तरायण का मौसम था 2018 में जब बनारस के एक महान खेल पत्रकार ने जमीन की पैमाइश के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की थी। इतनी जल्दी लोग भूल गए धरोहर बचाओ समिति और मंदिर बचाओ आंदोलनम् को, जिसकी हवा 2019 के पुलवामा ने निकाल दी थी? जिसके बाद अपना-अपना हिस्सा लेकर हरकारे अमेरिका चले गए और किस्मत के मारे घाटिया दर-बदर हो गए! और मरा कौन अकेले में, घाट से दूर? मुन्ना मारवाड़ी!
पिक्चर अभी बाकी है। रूपा जाँघिया बानियान वाले अग्रवाल जी मणिकर्णिका पर CSR का पैसा लगाए हैं तो जिंदल जी के CSR से हरिश्चंद्र घाट का उद्धार होना है। फिर गोला दीनानाथ और मच्छोदरी पार्क की बारी है, जिनका टेन्डर खुलने ही वाला है। दालमंडी अतीत हुई। धीरे-धीरे पीपीपी मॉडल पूरे शहर को स्वच्छ और सुंदर बना देगा। निजी-सार्वजनिक की भागीदारी में कंपनियां और उनके तनखैया कारिंदे जनता पर केस करवाएंगे और मुकदमे में गवाही देगा AI, जो मनुष्य की सहज मति के विस्थापन, विनाश और आउटसोर्सिंग का ही दूसरा नाम है।
इस विनाश के पहले चरण पर बनारस से दिल्ली तक इतना रिपोर्ट किया था मैंने कि अबकी जब एक अखबार के मित्र ने मणिकर्णिका पर लिखने को दो दिन पहले कहा, तो जबरदस्त व्यर्थताबोध हुआ। मैंने तय किया कि अब न बनारस जाएंगे, न लिखेंगे, झंझट ही खत्म! उन्हें मना कर दिए। फिर बनारस में एक मित्र से फोन पर बात हुई, थोड़ा अच्छा लगा, मैंने कहा फरवरी में आऊँगा। जब बात हो रही थी, मैं प्रगति मैदान में धूप सेंक रहा था। बसंत की आहट-सी महसूस हो रही थी।
उससे दसेक दिन पहले एक दोस्त बनारस से आया था। देर शाम हम लोग खूब घूमे पैदल- आईटीओ से अजमेरी गेट, कनॉट प्लेस, जनपथ, केजी मार्ग। सारनाथ से लाकर डुबकियाँ तक जमीन, घर, लेने की बात हुई। दस साल पहले से चल रही दस साल बाद की मेरी योजनाओं को सुनने के बाद उसने अंत में थोड़ा दुख से कहा- ‘अब न लऊट पईबा तू! बहुत लोग सोचेलन लऊटे के, केहु ना लऊट के आवत।’ मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं यह बात 2012 में ही समझ चुका था जब दिल्ली में रहने की मेरी मानसिक मियाद खत्म हो गई थी। तेरह साल से बहलाये हुए हूं खुद को एक्स्टेन्शन पर। बहुत से मित्र तो यह मानते हैं कि मैं दिल्ली छोड़ चुका, बनारस रहता हूं। मैं भी उन्हें दुरुस्त नहीं करता क्योंकि मेरा तात्कालिक संकट बनारस है ही नहीं।
बीते दस दिन प्रगति मैदान में तैनात सैनिकों, टैंकरों, बंदूकों, सैन्य साजोसामान, इनके साथ फोटो खिंचवाते लोगों, पुस्तक लोकार्पण करते बाबाओं, और दो साल में 250 से गिरकर 96 पर आ चुके हिंदी प्रकाशकों के स्टॉल को देखकर सोच रहा हूं कि लौटना तो आगे से दिल्ली में भी नहीं हो पाएगा। एक जगह पर उपस्थित रहते हुए वहीं पर न लौट पाने का संकट ज्यादा बड़ा नहीं है? जैसे वो बनारसी मित्र, जो घाट किनारे रहते हुए भी दो साल से गोदौलिया नहीं गए? गली-गली ही जीवन का कारोबार निपटा रहे हैं!
लौटना छोड़िए, ये पुराने कवियों का नॉस्टैल्जिक शगल ठहरा! अब तो जहां आप हैं, वहीं से अचानक गायब हो जाना नया विषय है।
(ऊपर तस्वीर: 2019 का मार्च महीना, मणिकर्णिका की ओर जाती एक गली)


