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सुनिये मार्क टली की रिपोर्ट शकुन्तला चंदन से!

आज करोड़ों के वारे न्यारे कर रहे पत्रकारों को मार्क टली की इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए!

हृदयेश जोशी-

बचपन से लेकर स्कूली दिनों में रेडियो पर बीबीसी पर समाचार सुनते हुए अक्सर जो लाइन याद आती है और जो स्मृति में अंकित रह गई वो यह है-

सुनिये मार्क टली की रिपोर्ट शकुन्तला चंदन से

शकुन्तला जी की जगह किसी और का भी नाम रहा हो जिन्होंने उनकी अंग्रेज़ी रिपोर्ट का हिन्दी रूपान्तरण पढ़ा हो लेकिन सुनने वाले हम जैसी हिन्दी भाषी ही हुआ करते जिनके लिए बीबीसी तब निर्विवाद सच हुआ करता।

फिर 1990 के दशक में विनोद दुआ जी के कार्यक्रम परख में (दूरदर्शन पर) उनका इंटरव्यू सुना.. उस वक्त यह कतई एहसास नहीं था कि एक दिन विनोद जी के साथ काम करने का मौका मिलेगा और एनडीटीवी के दफ्तर में मार्क टली से मुलाकात भी होगी।

विनोद जी से कभी मार्क टली के बारे में पूछा या नहीं यह तो याद नहीं लेकिन उनके परख इंटरव्यू में मार्क टली की वह बात याद है जिसमें उन्होंने कहा कि भारत में अफवाह का फैलना (या फैलाना) बहुत / सबसे आसान है।

नौकरी के शुरुआती वर्षों में पंजाब को कवर करते हुए मार्क टली और सतीश जैकब की पुस्तक “Amritsar Mrs Gandhi’s Last battle” ज़रूर पढ़ी जो मेरे जीवन में पढ़ी सबसे अच्छी पुस्तकों में एक है।

इस पुस्तक में टली ने एक जगह बताया है कि कैसे ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले विदेशी पत्रकारों या भारत में विदेशी अख़बार के लिए काम कर रहे पत्रकारों को अमृतसर से बाहर निकाल दिया गया। तब उन्होंने इस बात का विरोध भी किया था इतने साल भारत में रहने पर उनकी प्रतिबद्धता पर शक क्यों किया जा रहा है। लेकिन एक दिलचस्प बात जो मेरे ज़ेहन में अटक गई वह ये है कि मार्क टली ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि उनके जीवन का अनुभव यह है कि पत्रकारिता में उन्हें परिश्रम बहुत करना पड़ा पर उस अनुपात में पैसा नहीं है।

टली ने यह बात बीबीसी जैसे संस्थान का पत्रकार रहते हुए कही.. क्या यह बात आज के पत्रकारों के लिए कही जा सकती है जो साल में करोड़ों के वारे-न्यारे कर रहे हैं।

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