वाराणसी की मतदाता सूची में एक पते पर एक अविवाहित स्वामी के 48 पुत्रों का मामला और उसके सेक्रेट्री द्वारा उसे पूरी तरीके से ‘सही’ करार दिये जाने की ईटीवी डॉट कॉम की दिलचस्प खबर पढ़िये

संजय कुमार सिंह
आज जब सरकार कई मोर्चों पर शांत और विफल है, जिस विषय पर बोलना चाहिये उसपर मुंह सिले बैठी है तब अखबारों ने यह दिखाने की कोशिश की है कि सरकार की सक्रियता से ललित मोदी का वानुआतू का पासपोर्ट रद्द हो जायेगा। इस खबर को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया जबकि उसका पासपोर्ट बना कैसे यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। भारत सरकार जिसका प्रत्यर्पण चाहती है उसे किसी और देश की नागरिकता मिल गई, वह भारतीय नागरिकता रद्द करना चाहता है – यह ज्यादा बड़ी खबर थी। मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि जब वानुआतू का पासपोर्ट हासिल हो ही गया था तो उसे भारतीय पासपोर्ट रद्द करने का आवेदन करने की क्या जरूरत थी और जब किया तो बड़ी खबर यही थी कि एक भगोड़े को दूसरे देश की नागरिकता मिल गई। पर तब खबर थी कि वह भारतीय पासपोर्ट रद्द कराना चाहता है। अब वानुआतू के पीएम ने रद्द करने का आदेश दिया है तो इस खबर को इतना तूल दिया गया है जिससे यह लगे कि ललित मोदी को कामयाबी नहीं मिली और भारत सरकार कुछ काम कर रही है। आप जानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने दावा किया है कि उनके पोल खोलने से भारत टैरिफ कम करने के लिए तैयार हो गया है। इसपर भारत सरकार का पक्ष जानने के लिए बहुत सारे लोग उत्सुक हैं। यही नहीं अमेरिका में अदाणी के खिलाफ मुकदमे पर भी भारत सरकार ने कुछ नहीं कहा है (वसुधैव कुटुम्बकम वाली बात को छोड़कर), मणिपुर का मामला आप जानते ही है। ऐसे में ललित मोदी की खबर भारत सरकार का प्रचार है।
हालांकि, टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड के अनुसार सरकार ने संसद की एक समिति से कहा है कि अमेरिका से शुल्क पर कोई वादा नहीं किया गया है। प्रचारक आज इसे सरकार के पक्ष में तान सकते थे पर ऐसा हुआ नहीं है। शायद उन्हें ललित मोदी वाली खबर पर ज्यादा भरोसा हो। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, कांग्रेस ने यह आरोप लगाया है कि ईडी की कार्रवाई हेडलाइन बदलने के लिए है। और आज के हेडलाइन से लगता है कि यह आरोप निराधार नहीं है। यह खबर नवोदय टाइम्स में लीड है जबकि खबर में यह नहीं बताया गया है कि छापे में क्या मिला। इसके बावजूद यह खबर इंडियन एक्सप्रेस, दि एशियन एज, हिन्दुस्तान टाइम्स और अमर उजाला में पहले पन्ने पर दो कॉलम में प्रमुखता से है। द टेलीग्राफ से लेकर हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर है। नरेन्द्र मोदी ने नकद लेन-देन कम करने के लिए कई उपाय किये हैं और अब तो 500 से बड़ा नोट भी नहीं है। डिजिटल इंडिया में नकद कुछ होना नहीं है और शेल कंपनियों के जरिये विदेशी पैसा भारत आना नहीं है। इसलिये छापे में वैसे भी कुछ नहीं मिलना है और जो कंप्यूटर में तलाशे जायेंगे वो देने वाले के कंप्यूटर से भी मिल जायेंगे और उसके बिना छापे का कोई मतलब नहीं है। छापा (सरकारी काम है और खर्च भी होता है) पुख्ता सबूत के बिना मारा ही नहीं जाना चाहिये और छापे में कुछ न मिले तो बताया जाना चाहिये कि किन सूचनाओं के आधार पर छापे मारे गये ताकि सरकारी कार्रवाई में पारदर्शिता बनी रहे। लेकिन नरेन्द्र मोदी के राज में छापे राजनीतिक होते हैं, इलेक्टोरल बांड से वसूली किये जाने के संकेत मिलते हैं और विपक्षी राजनेताओं पर छापा वैसे भी अनैतिक है। इसके अलावा कुछ हो तो स्पष्ट किया जाना चाहिये। पर नरेन्द्र मोदी की सरकार नैतिक रूप से इतनी मजबूत और पारदर्शी कभी नहीं रही। उसपर भी मामला सब पीएमएलए का होता है और पीएमएलए कानून जिस जज साब की मेहरबानी से चल रहा है वे ईनामी हैं। इसकी वैधता पर सुनवाई न हो इसके लिए सरकारी कोशिशें कम नहीं रहीं। पर वह अलग मुद्दा है।
मैंने कल यहां पर लिखा था, आज की दूसरी बड़ी खबर संसद के बजट सत्र की शुरुआत की है। इंडियन एक्सप्रेस और दि एशियन एज में यह लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सेकेंड लीड है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, विपक्ष अमेरिकी टैरिफ, मतदाता सूची, परिसीमन का मुद्दा उठायेगा सरकार वक्फ विधेयक पर फोकस करेगी। दि एशियन एज ने लिखा है, वक्फ विधेयक, मणिपुर, टैरिफ पर विपक्ष सरकार संसद में भिड़ने के लिए तैयार। संसद की खबर आज भी सभी अखबारों में लीड नहीं है। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, संसद के दोनों सदनों में मतदाता सूची का विरोध। इसका फ्लैग शीर्षक है, राहुल ने (मतदाता सूची में गड़बड़ी) के तृणमूल के दावे का समर्थन किया, चर्चा की मांग की। यह खबर आज मेरे बाकी सात अखबारों में से दो, नवोदय टाइम्स और दि एशियन एज में पहले पन्ने पर है। यानी पांच में तीन में खबर है द टेलीग्राफ की तरह यह खबर दि ट्रिब्यून में भी लीड है। हिन्दी अखबारों में यह दैनिक भास्कर में लीड है। संसद की कार्यवाही टेलीविजन पर देख रहे लोगों ने कल देखा होगा कि राहुल गांधी के सवाल पर लोकसभा अध्यक्ष समेत भाजपा के नेताओं का अचार-व्यवहार कैसा था। यह सवाल भी उठा कि मतदाता सूची सरकार बनाती है क्या? कहने की जरूरत नहीं है कि संसद में सरकार के काम पर ही चर्चा हो – ऐसा कोई नियम नहीं है। उससे इतर विषयों पर भी चर्चा होती रही है। कायदे से, संसद में उन सभी विषयों पर चर्चा होनी चाहिये जिनका संबध देश और देश की जनता से है। वैसे भी, मतदाता सूची सरकार नहीं बनाती है पर बनाने वाले और बनवाने वाले तो सरकारी कर्मचारी होते ही हैं। बनवाने के समय काम करने का वेतन चुनाव आयोग अलग से नहीं देता है वही वेतन मिलता है।
कहने की जरूरत नहीं है कि मतदाता सूची से संबंधित शिकायतों की भरमार है और इनपर चुनाव आयोग का जवाब संतोषजनक नहीं रहा है। संसद में एक नंबर के दो कार्ड के मसले पर चर्चा की मांग नहीं मानी गई तो कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने वॉक आउट का नेतृत्व किया। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, राज्यसभा के नेता और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि नियमों का पालन किये बगैर संसद का मुद्दे उठाकर संसद का अपमान किया जा रहा है। यहां फर्जी मतदातओं के जरिये जीत कर पूरी प्रक्रिया और संविधान का मजाक बनाना मुद्दा नहीं है। लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के नेता कल्याण बनर्जी ने चुनाव आयोग के खिलाफ कार्रवाई की मांग की और कहा कि कि आयोग निष्पक्ष व पारदर्शी चुनाव कराने में नाकाम रहा। ऐसे में सोशल मीडिया पर वाराणसी की एक मतदाता सूची घूम रही है। इसमें एक पते पर 48 बच्चों का पिता एक ही है। खोजबीन करने पर ईटीवी भारत डॉट कॉम की एक खबर मिली जो मतदाता सूची की इस गड़बड़ी को तो सही बता ही रही है खबर यह दी थी कि 48 बच्चों का पिता अविवाहित है और कौन है। मतलब यह कि खबर का मुद्दा एक व्यक्ति के 48 बच्चे या एक पते पर 48 लोगों का रहना नहीं है बल्कि वह व्यक्ति है जो अविवाहित होते हुए 48 बच्चो का पिता है। कहने की जरूरत नहीं है कि किसी भी अन्य सरकारी दस्तावेज या रिकार्ड में ऐसा होता तो बड़ी खबर बन जाती। आधार, पैन कार्ड या किसी संस्था के परिचय पत्र में भी ऐसा संभव नहीं है लेकिन इस मामले में ईटीवी की खबर कहती है ,… लेकिन, हैरान करने वाली बात यह है कि, आधिकारिक तौर पर इस वोटर लिस्ट के सही होने की भी पुष्टि की गई है।
खबर से किया गया खेल
प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र की यह खबर 4 मई 2023 की है और सोशल मीडिया पर अब आई जब मतदाता सूची में गड़बड़ी के कई मामलों की चर्चा हो रही है। इस खबर में कहा गया है, …. उससे भी बड़ी बात यह है कि स्वामी जी के सेक्रेटरी ने इस लिस्ट के सही होने की भी पुष्टि की है। जाहिर है किसी स्वामी के 48 बच्चों का नाम मतदाता सूची में होने की पुष्टि उनके सेक्रेट्री ने कर दी और इसे ठीक मान लिया गया। सोशल मीडिया पर वायरल वाराणसी के वार्ड नम्बर 51 की वोटर लिस्ट के एक पन्ने के अनुसार क्रम संख्या 243 से 284 तक मकान नंबर बी24/19 के मतदाताओं के नाम दर्ज हैं। इन सबके पिता राम कमलदास बताये गये हैं। दिलचस्प यह है कि रामकमल दास खुद मतदाता नहीं हैं। हालांकि उनका नाम पहले हो सकता है। बाद में तो नहीं है। क्रम संख्या 285 और 286 पर किन्ही संदीप का नाम है जो कमलाकांत के पुत्र है और इस पते का आखिरी नाम ज्ञानप्रकाश है जो राजबहोर के पुत्र हैं। इनकी आयु 29 साल है। राम कमल दास के इस पते पर किसी महिला का नाम मतदाता के रूप में दर्ज नहीं है। ईटीवी की खबर के अनुसार, राम कमल दास 48 बच्चों के पिता दिखाये गये हैं। इनमें 13 बच्चे 37 साल के हैं, पांच 39 साल के, चार 40 तो वही अन्य 42 साल के हैं। ‘बच्चों’ के पिता राम कमल दास वाराणसी के जाने-माने संत गुरुधाम के राम जानकी मंदिर के संस्थापक स्वामी है। मैं यह मालूम नहीं कर पाया कि यह पता घर का है, मंदिर या धाम का। कायदे से मतदाता सूची में नाम घर में रहने वालों का ही होता है वरना स्कूल से लेकर दफ्तर और कारखाने में सैकड़ों नाम दर्ज कराये जा सकते हैं।
आज की एक और दिलचस्प खबर है, शिक्षा नीति पर विवाद। आप जानते हैं कि दक्षिण भारत में हिन्दी थोपने की भाजपा सरकार की कोशिश का विरोध एमके स्टालिन कर रहे हैं। कल संसद में लेकर इस पर हंगामा हुआ और यह भिन्न शीर्षक के साथ भिन्न अखबारों में है। अमर उजाला का शीर्षक है, नई शिक्षा नीति प्रधान के बयान पर हंगामा, विशेषाधिकार हनन का नोटिस। आज नवोदय टाइम्स में बॉटम का शीर्षक है, “परीक्षा में गड़बड़ी से कार्यपालिका में कम होता है विश्वास : सुप्रीम कोर्ट”। इस सरकार में परीक्षा की दशा पर कुछ बोलने की जरूरत नहीं है और अब जब सुप्रीम कोर्ट ने भी बोल दिया है तब केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने तमिलनाडु सरकार पर हमला कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस की खबर से लगता है कि स्टालिन ने इसपर नाराजगी जताई। दैनिक भास्कर के अनुसार, डीएमके ने कहा, केंद्र दबाव में फंड रोक रहा है। इसपर प्रधान पलटवार किया – डीएमके राजनीति कर रही है। यह सब तब जब नरेन्द्र मोदी ने 2014 में चुनाव जीतने के बाद स्मृति ईरानी को शिक्षा मंत्री बनाया था और फिर जो हुआ वह डिग्री और डिग्री की परिभाषा में उलझा हुआ है। शिक्षा का जो हाल है वह भी किसी से छिपा नहीं है और शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद करना अगर भाजपा की राजनीति नहीं है तो दक्षिण पर हिन्दी थोपने की उसकी कोशिश भी राजनीति नहीं है। और इसके बावजूद तमिलनाडु सरकार पर आरोप लगाने की हिमाकत – हंगामा होना ही था।


