
संजय कुमार सिंह
आज की खबरों में नागपुर की खबर सबसे महत्वपूर्ण है। भाजपा के इस दावे के कारण के कारण कि भाजपा सत्ता में हो तो दंगा नहीं होता है। नागपुर में जो हुआ वह दंगा है या नहीं है – वह भी नहीं कहा गया है। इसे हिन्सा बताया गया है। नवोदय टाइम्स के अनुसार नौ लोगों के घायल होने, 20 लोगों को गिरफ्तार किये जाने की खबर है पर वह भी शीर्षक में नहीं है। अमर उजाला ने शीर्षक में बताया है कि डीसीपी गंभीर रूप से घायल हैं फिर भी शीर्षक में घायलों की चर्चा नहीं है। और कोई मरा नहीं है तो पहले पन्ने की खबर कहां हुई। इसलिए छोटी-बड़ी जो भी खबर है उसे सामान्य मार-पीट, हिन्सा के रूप में पेश किया गया है। अमर उजाला ने उपशीर्षक में लिखा है, उपद्रवियों का पुलिस पर हमला, दो दर्जन से अधिक गाड़ियों में तोड़फोड़। कुल मिलाकर, जो हुआ उसे दंगा या अंग्रेजी का रॉयट नहीं कहा गया है जबकि जरूरी नहीं है कि दंगा सांप्रदायिक ही हो और मार-पीट, लड़ाई झगड़े, उपद्रव को भी दंगा कहा जाता है। अंग्रेजी में भी रॉयट का मतलब सांप्रदायिक दंगा नहीं होता है और इसका हिन्दी अर्थ दंगा, बलवा, हंगामा ही है। अंग्रेजी में इसका मतलब सार्वजनिक स्थल पर लोगों के समूह का हिंसक व्यवहार है। आज अंग्रेजी और हिन्दी के अखबारों में नागपुर की घटना के लिए दंगा या रॉयट नहीं लिखा गया है। नवोदय टाइम्स में आज यह खबर सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, नागपुर में अफवाह से बवाल, लाठीचार्ज। अमर उजाला में यह खबर तीन कॉलम में है।
आज जानते हैं कि ईवीएम की गड़बड़ी, मतदाता सूची से छेड़छाड़ और इन सबसे इनकार के बीच महाराष्ट्र में भाजपा को बहुमत मिला है। ऐसे में सरकार बनने या तय मुख्यमंत्री को शपथ लेने में जितना समय लगा उससे कुछ ही ज्यादा समय के बाद राज्य में ऐसी हिंसा हुई है तो बड़ी खबर है और उसे विस्तार से बताया जाना चाहिये। 2014 से पहले ऐसे मौकों पर नुकसान का एक अनुमान भी रहता था। अब डबल इंजन वाली सरकारों में जनता से वसूली तो होती है लेकिन नुकसान का अनुमान नहीं है। यह आम जनता के लिए मुश्किल और डर का एक बड़ा कारण है। जो जनता में बना रहेगा। पुराना इतिहास गवाह है कि भाजपा सत्ता में न हो और दंगा हो जाये तो दंगे में भाजपा नेता का नाम होता रहा है। इसलिये भी दंगे का कारण स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिये था और सभी अखबारों में एक होता तो उसपर यकीन होता। लेकिन आज न तो खबर एक सी छपी है ना उसका कारण एक है। असल में प्रचार वाली खबर के साथ तो निर्देश होता होगा पर ऐसी खबरों के मामले में घटना वाले दिन निर्देश नहीं भेजा जाता हो तो यह गड़बड़ी हो सकती है। आज वह गड़बड़ी दिख रही है।
इंडियन एक्सप्रेस में आज यह खबर टॉप पर दो कॉलम में है। एक कॉलम की तस्वीर के साथ तीन लाइन का कैप्शन और एक लाइन के फ्लैग शीर्षक के बाद तीन लाइन का मुख्य शीर्षक है। डेटलाइन, स्रोत और अगले पन्ने पर जारी होने की सूचनाओं के साथ खबर कुल 11 लाइनों की है। फ्लैग शीर्षक है, वाहनों में आग लगाई गई, पुलिस ने भीड़ पर आंसू गैस छोड़े। मुख्य शीर्षक है, औरंगजेब के मकबरे के खिलाफ हिंसा सुलगने से नागपुर में तनाव। नवोदय टाइम्स ने अफवाह को कारण बताया है। पर तथ्य यह है कि मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणविस ने कहा है, सरकार औरंगजेब के कब्र की सुरक्षा के लिए बाध्य, महिमा मंडन न करें…। दूसरी ओर, हिंदू संगठन मुगल सम्राट के मकबरे को ध्वस्त करने का आह्वान कर रहे हैं। ऐसे में अखबार बता रहे हैं, सरकार ने औरंगजेब के मकबरे को संरक्षित स्थल घोषित किया हुआ है, इसलिए वह इसकी सुरक्षा करने के लिए बाध्य है और इसका संरक्षण करना श्रद्धा से ज्यादा ऐतिहासिक रेकॉर्ड का विषय है। मुख्यमंत्री ने ठाणे में छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती के अवसर पर उन्हें समर्पित एक मंदिर का उद्घाटन करने के बाद कहा, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार को औरंगजेब के अत्याचारों के इतिहास के बावजूद उसकी कब्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी पड़ रही है। हालांकि, मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि यदि उनकी विरासत का ‘महिमा मंडन’ करने का कोई प्रयास किया गया तो यह सफल नहीं होगा।’ उन्होंने कहा कि केवल छत्रपति शिवाजी महाराज के मंदिर का ही महिमा मंडन किया जा सकता है, औरंगजेब की कब्र का नहीं। (नवभारतटाइम्स डॉट इंडिया टाइम्स डॉट कॉम के अनुसार) मुझे लगता है कि देवेन्द्र फडणविस को भारी बहुमत से विजय दिलाने वाली जनता अगर मुख्यमंत्री को उनकी मुश्किलों से मुक्त कराना चाहती है या अपने मन का कुछ चाहती है तो उसे बताया जाना चाहिये और स्पष्ट रूप से यह उनकी राजनीति है। भले संविधान और पद पर रहने के लिए ली गई शपथ के खिलाफ हो।
टाइम्स ऑफ इंडिया में आज पहले पन्ने से पहले वाले अधपन्ने पर दो कॉलम की मूल खबर है। इसमें एक कॉलम की एक तस्वीर है और 50 लोगों को गिरफ्तार किये जाने की सूचना है। अंदर खबर में इन्हें रायटर्स (दंगाई) लिखा गया है। खबर के अनुसार भीड़ ने दो बुलडोजर और 40 वाहनों में आग लगा दी। इनमें पुलिस की गाड़ियां भी हैं। अखबार ने यह भी बताया है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस अशांति पर रिपोर्ट मांगी है जो प्रधानमंत्री के अपेक्षित दौरे से सिर्फ दो हफ्ते पहले हुई है। दंगे का कारण अफवाह बताया जा रहा है इसलिए मैं उसका उल्लेख नहीं कर रहा हूं पर अफवाह रोकना भी सरकार और मीडिया का ही काम है। हालांकि उससे जरूरी है, सही खबर देना और वह टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी इस खबर के पीछे ही छापा है। यह खबर अधपन्ने के पीछे वाले हिस्से पर है। शीर्षक में वही बताया गया है जो आज सभी अखबारों को बताना चाहिये था। वह यह कि (मुख्यमंत्री देवेन्द्र) फडणविस को यह तकलीफ है कि सरकार को औरंगजेब के मकबरे की रक्षा करनी है। इसलिये उन्होंने कहा है (और यह खबर का इंट्रो है) महिमामंडन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जायेगी। अखबार ने इसके साथ खबर छापी है कि उत्तर प्रदेश के किसी दक्षिणपंथी संगठन ने औरंगजेब के मकबरे को ध्वस्त करने के लिए 21 लाख रुपये के ईनाम की घोषणा की है। संवैधानिक व्यवस्था में मुख्यमंत्री का यह बयान और उसके बाद की स्थिति (या उसका कारण) कानून सम्मत है कि नहीं उसकी जांच के लिए शिकायत करने का काम जिसका भी है वह अपना काम नहीं करता है तो जनता क्या करेगी। मुझे लगता है कि सरकार जब एक पक्ष हो जनता को आपस में लड़ना-भिड़ना ही बचता है और एक तरफ जब सत्ता हो, पुलिस हो तो दूसरा पक्ष कितना भी मजबूत हो, दबा ही रहेगा। यही होता है और इसी को दंगा नहीं होता कहकर प्रचारित किया जाता है और अब जो हो रहा है उसे सरकार ही कर रही है और जैसा मैंने ऊपर लिखा है, इसे मीडिया ने दंगा नहीं कहा है।

ऐसे समय में टाइम्स ऑफ इंडिया की यह प्रस्तुति प्रशंसनीय है। मैं नहीं जानता कि पहले पन्ने पर क्यों नहीं है या जो पहले पन्ने पर है वह इससे महत्वपूर्ण या पठनीय क्यों है। हालांकि, पहले (अध) पन्ने की आधे कॉलम की फोटो का कैप्शन बताता है कि कम से कम दो पुलिस कमांडो, 2 आईपीएस अफसर और दो अग्निशमन कर्मचारी घायल हुए हैं। मामले में गिरफ्तार 50 लोगों के खिलाफ वर्षों मुकदमा चलेगा और उनका जीवन चौपट हो जायेगा। और यह सब बहुमत से चुनी गई सरकार के कारण है। भले यह कारण उनकी राजनीति हो या (अ) योग्यता या दोनों। मीडिया अगर बताता तो जनता समझ पाती कि भाजाई मुख्यमंत्रियों की भाषा और कार्यशैली ऐसी क्यों है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर दो कॉलम की फोटो के साथ तीन कॉलम के शीर्षक से छपी है लेकिन खबर एक कॉलम में ही है। इसमें बताया गया है कि कम से कम 25 लोग घायल हुए हैं। इनमें पुलिस वाले भी हैं। खबर के अनुसार, बजरंग दल ने मांग की थी कि औरंगजेब के मकबरे को ध्वस्त कर दिया जाये। मुख्यमंत्री की चिन्ता (जैसा टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर में है) और फिर बजरंग दल की मांग किसी को भी परेशान करने के लिए काफी है। शांति व्यवस्था चाहने वाले किसी भी व्यक्ति (पदधारी) को इस मामले में कार्रवाई करनी चाहिये। भले खबर बताती है कि दंगे (झड़प) का कारण अफवाह है तथा वह कुछ और है (जिसे मैं यहां नहीं लिख रहा हूं)। नागपुर दंगे की खबर द हिन्दू में पहले पन्ने पर नहीं है और द टेलीग्राफ में सिंगल कॉलम की खबर है। दि एशियन एज में भी यह सिंगल कॉलम की खबर है और अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर टाइम्स ऑफ इंडिया के बाद सबसे लंबी है। और शीर्षक में फडणविस का जो बयान है वह ना तो फडणविस को खुश करेगा ना ही नाराज। हालांकि, टाइम्स ऑफ इंडिया जैसी खबर नहीं है तो हेडलाइन मैनेजमेंट हो ही गया। शीर्षक है, औरंगजेब के मकबरे की रक्षा करूंगा पर महिमामंडन नहीं :फडणविस।
आज की एक और खबर मणिपुर के चुराचांदपुर से है। पांच कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, आदिवासी नेता से मारपीट के बाद चुराचांदपुर में तनाव। खबर के अनुसार, मणिपुर में अब फिर से निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मणिपुर में हिंसा के सभी मामले गुवाहाटी में सुने जायेंगे। चुनाव आयोग की सक्रियता दिखाने वाली कल की खबर आज दि एशियन एज़ में पहले पन्ने पर है। इस बारे में मैं कल लिख चुका हूं और आज यह फिर दि एशियन एज में बाईलाइन के साथ पहले पन्ने पर है तो मैं समझ सकता हूं कि इसे छपवाने के लिए कितनी मेहनत की गई होगी। हालांकि वह मेहनत मुद्दा नहीं है। मुद्दा है, सरकारी प्रचार की खबर और यह तथ्य कि छूट जाये तो दूसरे दिन भी पहले ही पन्ने पर छपना है।
नायडू ने त्रिभाषा फॉर्मूले का समर्थन किया
हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने पर छपी एक खबर के अनुसार, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने त्रिभाषा फॉर्मूले का समर्थन किया है। आप जानते हैं कि तमिलनाडु की सरकार इसका विरोध कर रही है और अन्य विरोधियों को एकजुट करने का काम कर रही है। इसमें मुझे नायडू के पक्ष का इंतजार था क्योंकि वे हमारे बिहार के नीतिश कुमार के साथ केंद्र की लंगड़ी सरकार की बैसाखी हैं। अब उन्होंने जब त्रिभाषा फॉर्मूला का समर्थन किया है तो संभव है कि नीतिश कुमार भी करें और पास विदाउट इंग्लीश के लिए अगर कर्पूरी ठाकुर को अब भारत रत्न मिला तो नीतिश कुमार को अंग्रेजी के साथ किसी तीसरी भाषा को जरूरी करने के लिए भारत रत्न मिल सकता है। बिहार के सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी और हिन्दी जैसे पढ़ाई जाती है उसमें तीसरी भाषा (एं) भी पढ़ाने की व्यवस्था हो जाये तो नीतिश कुमार (या जो भी मुख्यमंत्री हों) को भारत रत्न होना ही चाहिये। हालांकि अभी यह मुद्दा नहीं है। अभी मुद्दा यह है कि ईवीएम से चुनाव शुरू हुआ था तो भारतीय जनता पार्टी ने इसका विरोध किया था और तब भाजपा का साथ देने वालों में एन चंद्रबाबू नायडू भी थे। नायडू अब भी भाजपा या नरेन्द्र मोदी के साथ हैं तो यह सामान्य है। फिर भी हिन्दुस्तान टाइम्स में खबर पहले पन्ने पर है क्योंकि यही राजनीति है। अखबारों में रोज की तरह सरकार और मोदी की प्रशंसा है उसपर कितना लिखूं।


