जिसके पास पैसा है, वो नौकरी देना नहीं चाहता, जिसके पास नौकरी है, वो पैसा देना नहीं चाहता!

दीपक गोस्वामी-

सबको अच्छी #पत्रकारिता चाहिए. अच्छे रिपोर्टर चाहिए. लेकिन, पिछले डेढ़-दो महीने में कई संस्थानों/संपादकों से नौकरी के लिए संपर्क कर चुका हूं. कोई भी नौकरी/पैसा देने तैयार नहीं है.

जिसके पास पैसा है, वो नौकरी देना नहीं चाहता. जिसके पास नौकरी है, वो पैसा देना नहीं चाहता. ये लोग नौकरी के विज्ञापनों में काबिल और अनुभवी रिपोर्टर मांगते हैं, लेकिन वेतन के नाम पर खाक छानते हैं.

आलम ये है कि अनाप-शनाप वेतन पर अंग्रेजी भाषी पत्रकारों से हिंदी का काम करा रहे हैं जिनकी भाषा का स्तर यह है कि वे अर्थ का अनर्थ लिख रहे हैं.

बता दूं कि हम हिंदी वाले पत्रकार जिंदा हैं साहब! और हम वे पत्रकार हैं जिन्हें फोन लगाकर आपके ‘अंग्रेजी भाषी कथित हिंदी पत्रकार’ अपनी हिंदी की गलतियां सुधारते हैं.

अरे जनाब! आपके यहां छपने वाला कंटेंट मेरी रिपोर्ट से इंस्पायर्ड होता है. कभी-कभी तो पैरा का पैरा कॉपी हो जाता है. मेरे बताए रास्ते पर चलकर आपके रिपोर्टर आपके लिए रिपोर्ट लिखते हैं, लेकिन फिर भी आपके पास मुझे देने के लिए नौकरी/पैसा नहीं है और उन कॉपी-पेस्ट पत्रकारों पर लाखों लुटा रहे हैं.

मतलब कि ‘अच्छे रिपोर्टर’ से ‘अच्छी पत्रकारिता’ करवाने के इच्छुक इन संस्थानों के पास देने के लिए वेतन अच्छा नहीं है. अच्छे रिपोर्टर के लिए नौकरी नहीं है.

पिछले दिनों एक जनाब कहते हैं कि फ्रीलांसिंग छोड़कर मुख्यधारा में लौट रहे हो तो ध्यान रखना #गोदी_मीडिया में मत जाना.

अरे भाई! मैं नहीं जा रहा आपकी कथित ‘गोदी मीडिया’ में. लेकिन, मुफ्त की सलाह देने वाले ये लोग जरा मुझे बताएंगे कि क्या एक पत्रकार का आदर्शवादी रहकर भूखा मर जाना ठीक है?? बीमार होने पर क्राउड फंडिंग करके इलाज कराना ठीक है?

सबको रोजगार की जरूरत होती है. सिर्फ क्रांतिकारी पत्रकारिता से पेट नहीं भरता, परिवार नहीं पलता.

अब ये मत कहना कि मोदी जी ने अच्छे मीडिया संस्थानों की कमर तोड़ दी है. इसलिए वे‌तन देने की हालत में नहीं है.

यह सरासर झूठ है. देने के लिए उनके पास भी खूब पैसा है, लेकिन पैसे का असमान वितरण करते हैं. वे केवल नाम के लिए अच्छी पत्रकारिता चाहते हैं. बड़े-बड़े संपादक विभिन्न मंचों से केवल नाम के लिए बोलते हैं कि पत्रकार निष्पक्ष और दबावमुक्त हो, फलां हो, ढिकां हो.

लेकिन, वे स्वयं ही हम जैसे दबाव मुक्त पत्रकारों को नौकरी पर नहीं रखते. हमें काम करने के लिए स्पेस नहीं देते. अंग्रेजी वालों का फाइव स्टार होटल और फ्लाइट का टिकट कटा देते हैं. जिसके एवज में वे एक दोयम दर्जे की रिपोर्ट करके देते हैं. वे हिंदी पत्रकारिता की पोस्ट पर भी अंग्रेजी भाषियों की नियुक्ति कर देते हैं.

हिंदी वालों के लिए न तो नौकरी होती है और न देने के लिए अच्छी सैलरी. फिर तुम क्या खाक अच्छे रिपोर्टर से अच्छी पत्रकारिता कराओगे?

फिर जब कोई अपना पेट पालने के लिए ‘गोदी मीडिया’ में चला जाए तो उसे गाली मत देना साहब.

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