
नई दिल्ली/श्रीनगर। कश्मीर में एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज को बंद किए जाने का मामला अंतरराष्ट्रीय मीडिया नेटवर्क अल जज़ीरा में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ है, लेकिन भारतीय मुख्यधारा मीडिया में यह खबर या तो नदारद है या फिर बेहद सीमित तरीके से दबा दी गई है। यह सवाल खड़ा हो रहा है कि जब वैश्विक मीडिया इसे लोकतंत्र, शिक्षा और अल्पसंख्यक अधिकारों से जोड़कर देख रहा है, तो देश के भीतर इसे लगभग अदृश्य क्यों रखा गया।
अल जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने 6 जनवरी को जम्मू-कश्मीर के रीसी जिले में स्थित श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल इंस्टीट्यूट (SMVDMI) की मान्यता रद्द कर दी। रिपोर्ट का दावा है कि यह कदम उस समय उठाया गया, जब प्रवेश प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मुस्लिम छात्रों का चयन हुआ था, जिसके बाद दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों ने खुले तौर पर विरोध शुरू कर दिया।
अल जज़ीरा लिखता है कि प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि हिंदू चैरिटी से संचालित संस्थानों का लाभ मुस्लिम छात्रों को नहीं मिलना चाहिए। विरोध-प्रदर्शनों और दबाव के बीच कॉलेज की मान्यता रद्द कर दी गई, जिससे सैकड़ों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया।
हैरानी की बात यह है कि यह वही मामला है, जिसे लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसे धार्मिक भेदभाव, शिक्षा में समान अवसर और राज्य की भूमिका के नजरिए से देख रहा है, लेकिन भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से ने या तो इसे नजरअंदाज किया है या सिर्फ़ “नियामकीय खामियों” तक सीमित कर दिया है। न विरोध की पृष्ठभूमि पर चर्चा, न छात्रों की धार्मिक पहचान से जुड़े सवाल—सब कुछ गायब।
मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि यह चुप्पी कोई संयोग नहीं, बल्कि एक पैटर्न का हिस्सा है, जहां असहज सवालों वाली खबरें या तो दबा दी जाती हैं या फिर विदेशी मीडिया के भरोसे छोड़ दी जाती हैं। नतीजा यह है कि जो सच्चाई देश के बाहर बहस का विषय बनती है, वही देश के भीतर जनता तक पहुंच ही नहीं पाती।
यह मामला सिर्फ़ एक मेडिकल कॉलेज का नहीं है, बल्कि यह सवाल भी है कि क्या भारतीय मीडिया अब उन मुद्दों से कतराने लगा है, जो सत्ता, धर्म और शिक्षा के टकराव को उजागर करते हैं? जब अल जज़ीरा जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं यह कहानी सुना रही हैं और देश की मीडिया चुप है, तो यह चुप्पी खुद एक बड़ी खबर बन जाती है।
प्रकरण पर आशीष कौल ने लिक्डइन पर लिखा है-
मैं वाक़ई बेहद उलझन में हूँ। जब आपके पास इतने पसंदीदा “विकल्प” मौजूद हैं, तो फिर किसी मेडिकल कॉलेज को बंद करने की ज़रूरत ही क्या थी?
- अपने अनुयायियों से कह सकते थे कि बिना लाइसेंस के ही “वैकल्पिक चिकित्सा” अपनाएँ।
- जो NEET में चयनित न हो पाए हों, उन्हें बाबा बनने की सलाह दे देते—और बीमारियों का आध्यात्मिक इलाज करा देते।
- अपने जैसे सफल उद्यमियों का उदाहरण देकर गोमांस निर्यात करवाते, और साथ-साथ गोहत्या की निंदा भी करते रहते।
- मेहनत से आगे बढ़ने का उपदेश देते—पकोड़े और चाय बेचकर।
- कह देते कि अगले साल कोशिश करें, पेपर लीक तो चलता ही रहता है।
- और अगर कुछ भी काम न आए, तो चुनाव आयोग के सहयोग से चुनाव लड़वा देते—और उन्हें स्वास्थ्य या शिक्षा मंत्री ही बना देते।
कम से कम मेहनत करके NEET पास करने वाले मुस्लिम छात्रों को तो मेडिकल पेशे में “सड़ने” दीजिए।


