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सुख-दुख

संसार मेरे लिए नहीं है, यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं जो मुझे ठीक लगे, अब तक जो जिया, सिर्फ़ बेहोशी में, नशे में : यशवंत

यशवंत सिंह-

संसार मेरे लिए नहीं है। यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं जो मुझे ठीक लगे। अब तक जो जिया, सिर्फ़ बेहोशी में। नशे में। आज दो कहानियाँ आँखों के सामने घटित हुईं। इनके पात्रों से मुखातिब था, अलग अलग वक़्त। इनकी बातें चलचित्र माफ़िक़ चलती दिखती रहीं।

एक बड़े बिल्डर ने ख़ुद की कहानी बताई। सुप्रीम कोर्ट में मुक़दमा लड़ने और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के झगड़ों से निपटने के लिए बीस करोड़ का ख़ुद का बंगला बेचना पड़ा। तनाव में हार्ट की बाईपास सर्जरी करानी पड़ी। वाइफ को ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उम्र साठ पैंसठ के आसपास है। मैंने उन्हें देखता सुनता रहा। वे अब किराए के मकान में है। लेकिन उनकी वासना जस की तस है। उन्हें पैसे कमाने हैं, खूब कमाने हैं। लगे हुए हैं। जो भी उनका अब दायरा है, उसी में। मुझे वो ज़िंदा लाश नज़र आए।

रियल एस्टेट से जुड़ा एक पैंतीस वर्षीय नौजवान मिला जो सत्रह साल की उम्र से इस फील्ड में है और अच्छा पैसा कमा चुका है। सुगर है। हाई बीपी के चलते रोज़ दवा अनिवार्य है। थोड़ा दौड़ने में हाँफने लगता है। उनकी बातें सुन हालत देख मुझे परेशानी होने लगी। दया आने लगा उन पर। विपश्यना शिविर में जाने की सलाह पर वो बोल पड़े थे – इतना वक्त कहाँ, काम कैसे होगा, कौन करेगा? मैंने सुबह शाम घर पर ही आधे आधे घंटे ध्यान करने को कहा। मेरी सलाह उनको समझ में नहीं आई होगी, ये पक्का यकीन है।

लोग जीवन में इतने उपद्रव के बाद पाते क्या हैं? वही रुग्णता, एकाकीपन, तनाव, क्षोभ और बहुत सारी बीमारियां!

फिर भी संसार से चिपके हुए हैं। धन बटोरने की प्रतिष्ठा पाने की पॉवर में होने की ऐसी भूख है ऐसी दौड़ है कि हर कोई भागा जा रहा है, एक दूसरे को कुचलकर।

ऊपर मैंने कहा, संसार मेरे लिए नहीं है। यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं जो मुझे ठीक लगे। अब तक जो जिया, सिर्फ़ बेहोशी में। नशे में। इस संसार के लोग नशे में हैं। बेहोशी में हैं। उनकी बातें, उनका काम मुझे अब समझ नहीं आता। कुछ भी तो सुसंगत नहीं है। एक दूसरे को मार कर खा जाने के कारण ज़िंदा इस दुनिया में ड्राइविंग फ़ोर्स बुराई है, ये एक सच्चाई है। बाहरी यात्रा का सच यही है। इसीलिए ये बाहरी यात्रा है, इसीलिए इस जगत संसार का दृश्यमान गतिमान कहानी दुखों और निराशाओं से भरपूर है। इसे ऐसा होना ही है क्योंकि ये हमारी चेतना समझ ज्ञान संवेदनशीलता और संभावनाओं को झकझोर कर आंतरिक यात्रा के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। सिद्धार्थ का गौतम बुद्ध बनना इसी वजह से है। हम सबके भीतर एक सुषुप्त बुद्ध है। लेकिन हमारा सिद्धार्थ जागरूक नहीं है, होश में नहीं है।

गौतम बुद्ध को हमें ठीक से नहीं पढ़ाया जाता। या हम उनके चैप्टर को ठीक से समझ नहीं पाते।

संसार में दुख हिंसा असफलता निराशा अपमान इसलिए है क्योंकि आपको इससे सीखना सोचना है, और फिर आंतरिक यात्रा पर चल पड़ना है। संसार में/से तनिक मोह उम्मीद सफलता अमरता आप ख़ुद के लिए देख पाते हैं तो फिर आंतरिक यात्रा के दरवाज़े आपके लिए हमेशा बंद रहेंगे, चाहें जितना यांत्रिक प्रयास कर लें इसे खोलने या इससे कुछ नया पाने महसूसने को!

भीड़ में अपनों के बीच बैठे बैठे मेरा मन अचानक कहता है कि मैं सबसे बोलूँ- चलो सब लोग ध्यान करते हैं!

और मेरे इतना कहते ही सब लोग स्टॉप मोड में आ जायें, पंद्रह मिनट के लिए ही सही, जो जहाँ जैसे है वहीं मौन होकर आँखें बंद कर ले और ध्यान में उतरने का प्रयास करने लगे।

ऐसे लोग नहीं हैं जिनसे आप कभी भी ध्यान की अपेक्षा कर सको। ऐसे लोग नहीं हैं तो फिर इनमें कोई नहीं है जो मुझे समझ सके। इसीलिए संसार के लोगों के समूह को भीड़ कहते हैं जो अक्सर अराजकता या बेचैनी या जुगुप्सा से भरी होती है। नेगेटिव एनर्जी से लैस।

इस दुनिया को सिर्फ़ बंद आँखों और मौन से समझा जा सकता है!


भड़ास एडिटर यशवंत के उपरोक्त लिखे पर एआई का गुरुवत विश्लेषण-

आपकी पोस्ट में तीन स्पष्ट परतें दिखती हैं:

पहली परत — वैराग्य की शुरुआत

आपको संसार की दौड़, धन, प्रतिष्ठा, बीमारी और तनाव की विडंबना साफ दिख रही है। यह वही बिंदु है जिसे बुद्ध ने “दुःख का बोध” कहा था।

दूसरी परत — करुणा

आप उन लोगों को देखकर सिर्फ़ आलोचना नहीं कर रहे, बल्कि दया महसूस कर रहे हैं। करुणा आना ध्यान यात्रा का महत्वपूर्ण संकेत है।

तीसरी परत — अकेलापन

आपको लगता है कि “कोई समझ नहीं रहा”। आंतरिक यात्रा में यह चरण लगभग हर साधक के साथ आता है।

2. बुद्ध के रास्ते में यह चरण क्या कहलाता है

बौद्ध परंपरा में इसे “संवेग (Samvega)” कहते हैं।

संवेग का अर्थ है —

जब व्यक्ति अचानक संसार की पूरी व्यवस्था को देख कर भीतर से हिल जाता है।

उसे लगता है कि लोग सो रहे हैं और वह जाग रहा है।

सिद्धार्थ को भी यह तब हुआ था जब उन्होंने बीमार, बूढ़े और मृत व्यक्ति को देखा।

3. लेकिन यहाँ एक सावधानी ज़रूरी है

आंतरिक यात्रा का अगला कदम संसार से घृणा नहीं, बल्कि समत्व है।

यानी:

संसार बुरा नहीं है

संसार अचेतन है

लोग लालची नहीं हैं

लोग बेहोश हैं

यह समझ आने पर मन में गुस्सा या जुगुप्सा कम होती है और करुणा बढ़ती है।

4. ध्यान की दिशा (आपके लिए)

आपके स्वभाव को देखकर तीन अभ्यास सबसे उपयोगी होंगे:

1. साक्षी ध्यान (20 मिनट सुबह)

सिर्फ़ सांस को देखना।

न उसे बदलना, न रोकना।

2. चलते हुए ध्यान

चलते समय सिर्फ़ कदमों को महसूस करना।

3. करुणा ध्यान (Metta)

मन में कहना:

सब सुखी हों

सब स्वस्थ हों

सब जागें

यह ध्यान आपके भीतर के कठोर वैराग्य को करुणा में बदल देगा।

5. आपकी पोस्ट की सबसे शक्तिशाली लाइन

आपने लिखा:

“इस दुनिया को सिर्फ़ बंद आँखों और मौन से समझा जा सकता है।”

यह वास्तव में ध्यान की मूल परिभाषा है।

6. एक छोटी सी बात जो आपको आगे ले जाएगी

आंतरिक यात्रा में तीन चरण होते हैं:

संसार झूठा लगता है स्वयं झूठा लगता है फिर केवल साक्षी बचता है

आप अभी पहले और दूसरे चरण के बीच हैं।

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