संजय कुमार सिंह
आज जब कई अखबारों के लिए भाजपा के नए अध्यक्ष के पदभार संभालने की खबर लीड है और भाजपाई तंत्र इस प्रचार में लगा है कि प्रधानमंत्री ने भाजपा अध्यक्ष को अपना बॉस कहा तो एक खबर यह भी है कि राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस की सूचना नहीं रखने वाली देश की सर्वोच्च अदालत के न्यायमूर्तियों को अवमानना के मामलों की जानकारी होती है। अदालत की पीठ ने मेनका गांधी के अधिवक्ता से कहा, क्या आपने अपने मुवक्किल का पॉडकास्ट सुना है? उन्होंने बिना सोच-समझे सबके खिलाफ टिप्पणियां की हैं। खुद को नॉन बायोलॉजिकल कह चुके प्रधानमंत्री की बातों का पार्टी और उनके प्रचारकों के लिए चाहे जितना महत्व हो, देश की जनता के लिए जीरा बराबर भी नहीं है। इससे ना उन्हें कुछ मिलना है ना उनका कुछ जाना है। इनके जरिए सरकार को सिर्फ खबरों में रहना है ताकि जरूरी खबरें कहीं दबी-छिपी रहें। ऐसे में ज्यादातर अखबार जब प्रचार कर रहे हैं तो देश का हाल अखबारों की सुर्खियों से नहीं खबरों से मालूम होगा। ऐसी ही एक खबर अमर उजाला में उसके दूसरे पहले पन्ने पर मिली। पहले पन्ने पर तो भाजपा अध्यक्ष ही बॉस हैं। प्रधानमंत्री नहीं, चौकीदार बनना था और प्रधानी करते करते नया बॉस भी ढूंढ़ लिया। ऐसे में देश औऱ सरकार का जो हाल है वह अपनी जगह खबरें दिलचस्प हैं। अखबारों का ‘काम’ इनका प्रचार है। आज कुच प्रचार और उसके पोर्टमार्ट से खबर और सरकार तथा उसके काम को समझने की कोशिश करता हूं।
1. टाइम्स ऑफ इंडिया – बांग्लादेश ने भारत में क्रिकेट वर्ल्ड कप खेलने से मना किया। सरकार ने बांग्लादेश में तैनात भारतीय अधिकारियों के करीबियों को वापस आने की सलाह दी है। खबर के अनुसार, भारतीय प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचाए जाने के खतरे के मद्देनजर सरकार ने राजनयिकों, भारतीय अधिकारियों और उनके परिवार के लोगों को यह सलाह दी है। इसके साथ ही सिंगल कॉलम की खबर छपी है जो बताती है कि बांग्लादेश के खेल सलाहकार ने दोहराया है कि उनकी टीम भारत दौरे पर नहीं जाएगी।
2. हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड तो ट्रम्प की खबर है लेकिन सेकेंड लीड दिल्ली की जहरीली हवा की खबर है। इसमें बताया गया है कि घर या कमरे के अंदर की हवा भी उतनी ही जहरीली है जितनी बाहर की। अखबार ने रोहिणी के एक स्कूल की कक्षा से लेकर एम्स के मातृ एवं शिशु वार्ड और कैंसर वार्ड की स्थिति बताई है। खबर की शुरुआत ही इस सूचना से होती है कि दिल्ली में रहने वाले लाखों लोग समझते हैं कि घर के बंद कमरे में रहना दिल्ली की जहरीली हवा से बचने के लिए पर्याप्त है। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स के हफ्ते भर के जमीनी प्रयोग ने इस भ्रम को दूर कर दिया है।
3. इंडियन एक्सप्रेस की लीड डिजिटल अरेस्ट से निपटने के लिए पेमेंट एपलीकेशन में किल स्विच देने और बीमा की योजना पर विचार करने की खबर है। मुझे लगता है कि जो व्यक्ति खुद दबाव में या डर कर अपने पैसे किसी अनजान को ट्रांसफर कर रहा है वह किल स्विच का उपयोग कब और कैसे कर पाएगा? दिलचस्प यह है कि जो व्यक्ति मौजूदा सरकार की पूरी व्यवस्था के बावजूद लुट जा रहा है। लूटा हुआ धन बरामद नहीं हो रहा है और अपराधी पकड़े नहीं जा रहे हैं उसकी रक्षा के लिए उसी की जिम्मेदारी बढ़ाई जा रही है और सरकार अपने काम दुरुस्त करने की बजाय पल्ला झाड़ने की कोशिश में है। बीमा लुटने वाले के काम आ सकता है लेकिन स्वास्थ्य और वाहनों के बीमे से क्या समस्या टल गई है? क्या इसका दुरुपयोग नहीं होता है। वैसे भी बीमा से बैंकिंग की सुविधा और सेवा महंगी ही होगी। दूसरी ओर, इसका मतलब होगा अपराध चलते रहेंगे। अपराधियों पर रोक नहीं लगेगी पीड़ितों को राहत देने की व्यवस्था होगी। सरकार यह सब कैसे कर रही है इसका अंदाजा इस बात से लग सकता है कि इंडियन एक्सप्रेस को उसके सवालों के जवाब नहीं मिले। तथ्य यह है कि काला धन खत्म करने के लिए न जाने क्या-क्या किया गया पर इस तरह ठगे और लूटे गए करोड़ों रुपए कहां गए पता नहीं चला। पीएमएल में सरकार विरोधियों की ही जांच होती रह गई।
4. द हिन्दू की लीड और सेकेंड लीड केरल और तमिलनाडु की खबरें हैं जहां भाजपा पांव फैलाने की कोशिश में है। खबर के अनुसार, केरल के मुख्य मंत्री ने आरोप लगाया है कि राज्यपाल ने नीति संबंधी भाषण को संशोधित कर दिया। नए साल के पहले सत्र की शुरुआत के लिए राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए रिवाजी भाषण में राज्यपाल ने परिवर्तन कर दिए। यही नहीं कुछ अंश हटा दिए गए जबकि कुछ अंश जोड़े भी गए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि संवैधानिक व्यवहार और विधायी परंपरा के अनुसार राज्य मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत रूपांतर ही केरल में बना रहेगा।
तमिलनाडु का मामला और आगे है। राज्यपाल ने विधान सभा को संबोधित करने से इनकार कर दिया और सदन से चले गए। इसका कारण यह बताया गया कि राज्य सरकार द्वारा तैयार भाषण में कई ऐसे दावे थे जिनकी पुष्टि नहीं हुई है और भ्रम फैला रहे थे। इसके अलावा जनता को परेशान करने वाले कई मुद्दों की उपेक्षा की गई थी। यही नहीं, राज्यपाल के माइक्रोफन को बार-बार बंद किया गया और उन्हें बोलने नहीं दिया गया। राज्यपाल की कार्रवाई से असहमति मुख्यमंत्री ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसे सदन ने आम राय से स्वीकार किया। इस तरह, राज्यपाल के स्वीकृत भाषण को ही रिकार्ड में लिया गया।
राज्यपालों के अधिकार और उनके द्वारा विधेयकों को सहमति न देने अथवा उसमें अत्यधिक विलंब करने के प्रश्न पर राज्यों की शिकायतों तथा केंद्र सरकार की दलीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश ने भारतीय संघीय ढांचे में संतुलन की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। यह केवल संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या का मुद्दा नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संघ–राज्य संबंधों की भावना से भी जुड़ा हुआ है। कई राज्यों ने यह शिकायत की कि राज्यपाल इन अधिकारों का प्रयोग राजनीतिक उद्देश्य से कर रहे हैं और निर्वाचित विधानसभाओं द्वारा पास विधेयकों को महीनों तक लंबित रखा जा रहा है। इससे न केवल विधायी प्रक्रिया बाधित होती है, बल्कि जनादेश का भी अप्रत्यक्ष रूप से हनन होता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि राज्यपालों के अधिकार असीमित नहीं हैं और उनका प्रयोग “उचित समय” तथा संवैधानिक परंपराओं के अनुरूप होना चाहिए। न्यायालय ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित सरकारों की प्राथमिकता और संघीय संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित किया है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह भाजपा सरकार के चाल, चरित्र और चेहरे से जुड़ा मामला है।
5. केंद्र राज्य संबंधों का मुद्दा आया है तो आज दि एशियन एज में बंगाल की एक खबर गौर करने लायक है। अखबार का शीर्षक भी राजनीतिक झुकाव बताने वाला है। पहले पन्ने पर तीन कॉलम में छपी इस खबर का शीर्षक है, ममता बनर्जी को एक झटका देते हुए हाईकोर्ट ने बेलडांगा में केंद्रीय बल तैनात करने के आदेश दिए। खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को बड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। कलकत्ता हाई कोर्ट ने मंगलवार को राज्य सरकार को मुर्शिदाबाद के हिंसा प्रभावित बेलडांगा में तुरंत सेंट्रल फोर्स तैनात करने का आदेश दिया। मेरा मानना है कि हाईकोर्ट का आदेश, अगर वह सही और जरूरत है तो राज्य सरकार के लिए शर्मिन्दगी कैसे हो सकती है और हो भी तो अखबार को क्यों बताना या उसका प्रचार करना। वह भी तब जब पूरा मामला राजनीति है और बंगाल हाई कोर्ट के दो जज पूर्व में भाजपा के प्रति झुकाव दिखा चुके हैं। जनहित के मामले में कार्रवाई से कोई शर्मिन्दा हो कोई चुनाव जीते या हारे – यह राजनीत हो सकती है, पत्रकारिता नहीं। लेकिन आजकल ऐसी खबरें और शीर्षक खूब होते हैं। वैसे भी, कानून व्यवस्था का मामला राज्य सरकार का होता है और अगर अदालत का आदेश राज्य पुलिस की बजाय केंद्रीय बलों की तैनाती या उपयोग का है तो राज्य पुलिस की खामी या कमजोरी को ठीक कौन करेगा? उसकी चिन्ता किसे होनी चाहिए? खबर के अनुसार, खंडपीठ ने एनआईए जांच का आदेश देने का रास्ता भी खुला रखा। मुझे लगता है कि एनआईए जांच का रास्ता हमेशा खुला है और जरूरत हो तो इसकी मांग भी की जानी चाहिए और राज्य सरकारें करती ही रही होंगी। कोर्ट को रास्ता खुला रखने की जरूरत ही नहीं है और यह कोर्ट का काम भी नहीं है। मौजूदा स्थितियों में जो हो रहा है उसमें केंद्र सरकार राज्य सरकार के अधिकार और कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप कर अपने मतलब साधती है वरना राज्य सरकार अगर प्रशासन चलाने में अक्षम है, केंद्रीय एजेंसियों की जरूरत है तो राज्य सरकारें बर्खास्त भी की जाती रही हैं। मौजूदा स्थिति में इसका लाभ केंद्र सरकार को होगा इसकी उम्मीद कम है इसलिए उसे परेशान और बदनाम करने के उपाय हो रहे हैं। ईडी का छापा और उसके बाद जो सब हुआ ऐसी ही कार्रवाई है।
6. द टेलीग्राफ की लीड इसी क्रम में है। एसआईआर के मकसद पर सवाल पुराना नहीं है। बिहार के मामले में जो सब नहीं हुआ वह बंगाल में हो रहा है और दिख रहा है। इसी में एक आदेश है, कथित तार्किक विसंगतियों के लिए दिए जाने वाले दस्तावेजों की पावती देना। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने मंगलवार शाम तक अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को इस संबंध में निर्देश नहीं दिए थे। पूरे दिन हजारों लोग दिए गए दस्तावेजों की किसी पावती के बिना सुनवाई केंद्रों से लौटने को मजबूर हुए। इसके साथ की एक खबर का शीर्षक है, बंगाल के 10 जिलों में दिल्ली (चुनाव आयोग) ने पर्यवेक्षक भेजे। इस तरह बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनाती, एसआईआर में मनमानी जारी है, रिपोर्ट भी हो रही है लेकिन ज्यादातर अखबारों में वही और वैसी घटनाएं जिससे केंद्र सरकार को भारी साबित किया जा सके या पश्चिम बंगाल सरकार को बदनाम किया जा सके।
7-9. हिन्दी अखबारों में देशबन्धु, अमर उजाला और नवोदय टाइम्स की लीड नए भाजपा अध्यक्ष के कार्यभार संभालने की है। अमर उजाला ने अपने दूसरे पहले पन्ने पर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की खबर को लीड बनाया है, केंद्रीय कर्मियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच कर सकती है राज्य पुलिस। मुझे लगता है कि एक देश, एक कानून में यह मुद्दा ही नहीं होना चाहिए। पुलिस राज्य की हो या केंद्र की या केंद्र प्रदेश के लिए हर नागरिक के लिए बराबर है चाहे वह केंद्र सरकार का कर्मचारी हो या राज्य सरकार का या केंद्र शासित प्रदेश। इसी तरह वह सिर्फ कर्मचारियों के लिए नहीं होगी नागरिकों के लिए भी होगी और विवाद तो इस बात पर भी हो सकता है कि कहां के नागरिक पर कहां की कार्रवाई होगी और जब अलग अलग होगा तो देश को बंटने में कितना समय लगेगा। लेकिन ऐसे मामले उठाए और सुने जा रहे हैं। पहले ना ऐसे मामले होते थे, ना सुने जाने की खबर होती थी। शिकायत तो कोई नहीं ही करता था। एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों का अंबार है दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट में ऐसे मामले सुने जा रहे हैं जिनपर विवाद ही नहीं होना चाहिए। एसआईआर इनमें एक हैं लेकिन इसे सबसे ज्यादा समय मिला है और आदेशों को लागू किए जाने पर द टेलीग्राफ की खबर है। कुत्तों पर सुनवाई को न सिर्फ प्राथमिकता मिली, एसआईआर पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘हमें राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस की जानकारी नहीं…’ आज छपी इस खबर के अनुसार मेनका गांधी ने किसी पॉडकास्ट में जो कहा उसकी चर्चा अदालत में हुई और खबर तो छपी ही है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


