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मोदी के दौर में मीडिया – आज़ाद आवाज़ों की कहानी!

एजाज़ अशरफ़-

मीडिया की आज़ादी पर बढ़ते दबाव और पत्रकारों के लिए सिमटती स्वतंत्रता पर एक विस्तृत लेख में चिंता जताई गई है। लेख में कहा गया है कि यह अपने आप में आश्चर्य है कि यह कॉलम ऐसे समय में जीवित रहा जब प्रेस की स्वतंत्रता अब सुनिश्चित नहीं है और मालिक, छापों व मुकदमों के डर से पत्रकारों को पूरी आज़ादी देने से कतराते हैं। कुछ गिने-चुने पत्रकार अभी भी स्वतंत्र रूप से काम कर पा रहे हैं।

लेख में लेखक को मिले लंबे समय तक स्वतंत्र रूप से लिखने के अवसर के लिए अख़बार के मालिकों का आभार जताया गया है। लेकिन इसके साथ ही यह भी लिखा गया है कि 2014 के बाद से हालात बदल गए हैं, और अब पत्रकारिता की स्वतंत्रता का दायरा पहले जैसा नहीं रहा।

लेख में कश्मीर टाइम्स की संपादक अनुराधा भसीन और प्रबोध जमवाल के उदाहरण देते हुए कहा गया है कि किस तरह कश्मीर में अख़बार के दफ्तर को सील कर दिया गया, संसाधन छीन लिए गए और प्रेस क्लब तक बंद कर दिया गया। लेखक के अनुसार यह घटनाएं दिखाती हैं कि सरकार के लिए प्रेस की भूमिका पहले जैसी स्वीकार्य नहीं रही।

लेख में कहा गया है कि प्रेस का काम है ताकतवरों को जवाबदेह ठहराना, लेकिन वर्तमान माहौल में यह काम करने वाले पत्रकारों को ही कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। अदालतों में कई पत्रकारों को राहत मिली है, लेकिन मुकदमों और पूछताछ की प्रक्रिया ही पत्रकारों को डराने के लिए काफी होती है।

लेख में यह भी कहा गया है कि आज के समय में मीडिया मालिकों की अहम भूमिका हो गई है। कई मालिक ऐसे सामाजिक समूहों से आते हैं जिनकी विचारधारा हिंदुत्व की ओर झुकी है, जिससे उनकी मीडिया संस्थाओं की रिपोर्टिंग प्रभावित होती है। मोदी सरकार के प्रति आलोचनात्मक लेखों को या तो संतुलन के नाम पर कमजोर कर दिया जाता है या उन्हें प्रकाशित ही नहीं किया जाता।

लेख के अनुसार कांग्रेस के दौर में भी सत्ता मीडिया को प्रभावित करती थी, लेकिन वर्तमान दौर में दमन की गुंजाइश और तरीक़े कहीं ज़्यादा संगठित हैं। लेखक का कहना है कि पत्रकारिता का अस्तित्व अब इस पर टिका है कि मालिक पत्रकार को कितनी स्वतंत्रता देता है।

लेख में पिछले कई वर्षों में लिखी गई स्तंभों—जैसे उमर ख़ालिद, सुधा भारद्वाज, विनोद राय, बिरेन सिंह, भारत की पहली बर्डवुमन, एमएमएस युग, और औरंगज़ेब पर किए गए लेख—का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इन सभी ने समाज में महत्वपूर्ण चर्चाएं पैदा कीं।

लेख के अंत में कहा गया है कि मीडिया की स्वतंत्रता लोकतंत्र की नींव है, और इसे सीमित करने से नागरिकों की स्वतंत्रता प्रभावित होती है। लेखक ने कहा है कि वह इस कॉलम को अलविदा कह रहा है, क्योंकि अब परिस्थितियां ऐसी हो गई हैं कि स्वतंत्र रूप से लिख पाना कठिन होता जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार एजाज अशरफ़ का यह लेख मिड-डे में प्रकाशित हुआ है।

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