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नरेंद्र मोदी का सबसे बड़ा फैसला ‘न्यायिक समीक्षा’ के दायरे में आया, देखें किस अख़बार ने इसे कैसे छापा!

संजय कुमार सिंह-

सुप्रीम कोर्ट में नोटबंदी का मामला अब आया
अखबारों ने हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा बना दिया

नोटबंदी का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में सुने जाने से क्या होगा – यह सवाल सबके मन में है। मेरे मन में भी है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की खबर से जवाब समझ में आ जाता है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट 2016 की नोटबंदी की वैधता और इसे लागू करने के तरीके की जांच करेगी। नतीजा जो आए, उससे हमें क्या लेना-देना? हमने या देश या दुनिया ने तो जो भुगतना था भुगत लिया। खबरें छप चुकी। ये तो सिंगल कॉलम की भी खबर है। बड़ी खबर यह हो सकती थी कि अब इस मामले पर सुनवाई क्यों हो रही है। खबर लीड तब बनेगी जब जांच में पता चलेगा कि कुछ गड़बड़ थी। अगर सब ठीक था तो वो भी सिंगल कॉलम की ही खबर होगी पर सर्टिफिकेट दिखाने वालों के लिए यह महत्वपूर्ण हो सकता है कि नोटबंदी में सब ठीक था। यह सर्टिफिकेट एक बड़ी राजनीतिक नालायकी को वैधता प्रदान कर सकता है। देखा जाए।

आइए, इससे संबंधित खबरें और शीर्षक देखें

  1. हिन्दुस्तान टाइम्स – पहले पन्ने पर दो कॉलम में दो लाइन का शीर्षक, “बताइए कि नोटबंदी का निर्णय कैसे लिया गया था : सुप्रीम कोर्ट”
  2. द हिन्दू – यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अंदर के पन्ने पर यह चार कॉलम में दो लाइन के शीर्षक से लंबी सी खबर है। शीर्षक का हिन्दी अनुवाद होगा, “सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र, भारतीय रिजर्व बैंक से पूछा, नोटबंदी के उद्देश्य पूरे हुए थे”।
    3.इंडियन एक्सप्रेस – टॉप पर दो कॉलम में। तीन लाइन का शीर्षक है, “लक्ष्मण रेखा तो है, पर हमें नोटबंदी की जांच करने की जरूरत है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा”।
  3. द टेलीग्राफ – टॉप पर सिंगल कॉलम। शीर्षक है, समय की बर्बादी नहीं है, नोटबंदी पर शपथपत्र दाखिल करें : अदालत।

सभी शीर्षक से लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को लक्ष्मण रेखा की जानकारी है, हम जानते हैं कि सरकार ने किया है तो ठीक ही होगा, मकसद पूरा हुआ कि नहीं वह भले मुद्दा हो लेकिन उसपर अब क्या कोई कार्रवाई हो सकती है? देखा जाए। ऐसे मामले पर सुनवाई हो रही है तो अखबार अपने आका की सेवा करने से क्यों चूकें – देखिए आपके अखबार ने कैसे सेवा की है। मेरे पांच अखबारों की सेवा ऊपर है। जय हो।

पुनःश्च –

  1. शाह टाइम्स – लीड, पांच कॉलम। नौ अक्तूबर तक बताएं किस कानून के तहत की थी नोटबंदी – उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने सेंद्र सरकार और आरबीआई को भेजा नोटिस।
  2. नवभारत टाइम्स – लीड, चार कॉलम। नोटबंदी का फैसला सही था? सुप्रीम कोर्ट करेगा पड़ताल। कहा – मामला संविधान पीठ के समक्ष, इसलिए जवाब देना होगा।
  3. हिन्दुस्तान – तीन कॉलम। सुप्रीम कोर्ट नोटबंदी की समीक्षा करेगा।
  4. जनसत्ता – लीड, चार कॉलम। फ्लैग शीर्षक – उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने कहा, ‘लक्ष्मण रेखा’ से वाकिफ हैं, लेकिन नोटबंदी के फैसले की जांच जरूरी।
  5. नवोदय टाइम्स – लीड, चार कॉलम। “नोटबंदी केंद्र और आरबीआई से मांगा जवाब, लक्ष्मण रेखा मालूम, लेकिन पड़ताल अवश्य करेंगे : सुप्रीम कोर्ट”
  6. अमर उजाला – लीड, चार कॉलम। “नोटबंदी का सुप्रीम कोर्ट करेगा परीक्षण कहा- लक्ष्मण रेखा पता, पर यह जरूरी लेकिन पड़ताल अवश्य करेंगे”
  7. दैनिक जागरण – टॉप बॉक्स, छह कॉलम। “हमें अपनी लक्ष्मण रेखा मालूम है, लेकिन नोटबंदी पर करेंगे सुनवाई :सुप्रीम कोर्ट”।

कहने की जरूरत नहीं है कि लगभग छह साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जांच जरूरी है तो मुख्य शीर्षक यही होना चाहिए था और बताया जाना चाहिए था कि सरकार ने क्या कहा या सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा। पर ऐसा कहने से दूसरा सवाल यही उठता कि जरूरी था तो अब क्यों या इतनी देर बाद क्यों। लेकिन मीडिया को तो “सब चंगा सी” दिखाना है इसलिए वह बात कहीं नहीं आई, किसी शीर्षक लगाने वाले के दिमाग में नहीं। इनमें शाह टाइम्स का शीर्षक बताता है कि मामले में कानूनन कुछ गड़बड़ हो सकती है। पी चिदंबरम ने इसका जिक्र भी किया। खबर में है भी पर शीर्षक से ऐसा नहीं लगता है।

यहां दिलचस्प यह भी है कि सॉलिसिटर जनरल, तुषार मेहता का कहना था कि मामला केवल अकादमिक हित का रह गया है। लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, पूर्व वित्त मंत्री, अधिवक्ता और याचिकाकर्ताओं में एक की ओर से पी चिदंबरम ने कहा कि1978 की नोटबंदी एक अलग कानून था। अध्यादेश के बाद एक कानून लाया गया यह अकादमिक नहीं है, यह एक लाइव इश्यू है। हम इसे साबित करेंगे। यह मुद्दा भविष्य में उत्पन्न हो सकता है। इसके बाद पीठ का प्रथम दृष्ट्या विचार था कि इस मुद्दे को और जांच की जरूरत है। इसके बाद केंद्र और भारतीय रिजर्व बैंक से विस्तृत हलफनामा मांगा गया।

कुल मिलाकर, बतौर प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी का सबसे अहम या पहला बड़ा फैसला ‘न्यायिक समीक्षा’ के दायरे में है। इस लिहाज से यह भले गंभीर है पर शीर्षक ऐसे नहीं हैं।

दूसरी ओर, नरेन्द्र मोदी के निर्णय की ‘न्यायिक समीक्षा’ पर सरकार की दलीलें कम दिलचस्प नहीं रहीं। उदाहरण के लिए, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अकादमिक मुद्दों पर अदालत का समय ‘बर्बाद’ नहीं करना चाहिए। पी. चिदंबरम ने कहा कि यह मुद्दा अकादमिक नहीं है और इसका फैसला शीर्ष अदालत को करना है। याचिकाकर्ताओं की ओर से उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार के पास एक कार्यकारी आदेश के जरिये करेंसी नोटों को रद्द करने की शक्ति नहीं है और भविष्य के लिए यह मुद्दा अभी भी प्रासंगिक है। चिदंबरम की मानें तो इसके लिए एक अध्यादेश आना चाहिए था। देखा जाए आगे क्या होता है।

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