सत्येंद्र पीएस-
15 अगस्त 2024 को कुछ युगांतरकारी घटना माना जा रहा है कि लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को गौतम बुद्ध का देश कह दिया। गौतम बुद्ध के बारे में 20वी सदी में प्रमुख रूप से लिखने वालों में डॉ सम्पूर्णानन्द से लेकर राहुल सांकृत्यायन तक अनेक लोग हैं। गांधी के अहिंसा के सिद्धांत के बारे में दुनिया के तमाम विद्वानों ने यह कहा है कि उन्होंने अहिंसा और लोगों के हृदय परिवर्तन का सिद्धांत बुद्ध से लिया था। अंग्रेज विद्वान जेएच होम्स ने लिखा है कि गौतम बुद्ध के बाद गांधी सबसे महान भारतीय और ईसा मसीह के बाद सबसे महान व्यक्ति हैं।

गांधी ने खुद कहा है कि बुद्ध अहिंसा के सबसे महान शिक्षक थे और उन्होंने “हमें दिखावे को नकारना और सत्य और प्रेम की अंतिम विजय पर भरोसा करना सिखाया।” गांधी पर बुद्ध का प्रभाव देखते हुए अल्बर्ट श्वित्जर ने कहा है कि गांधी ने वही जारी रखा जो बुद्ध ने शुरू किया था। बुद्ध में प्रेम की भावना दुनिया में अलग-अलग आध्यात्मिक स्थितियों को बनाने का काम करती है; गांधी में यह सभी सांसारिक स्थितियों को बदलने का काम करती है। उनसे सहमति जताते हुए राघवन अय्यर ने लिखा है कि गांधी वास्तव में पीड़ित मानवता की सेवा और आत्म-शुद्धिकरण की प्रक्रिया के बीच संबंध दिखाने में बुद्ध के पदचिह्नों पर चल रहे थे।
इस सबके बीच डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर अछूतों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे। वह अंग्रेज हुकूमत के साथ रहकर दलितों के हित में तमाम कानून बनवा रहे थे। देश विभाजन में मुस्लिम लीग से उनका मोहभंग हो गया और वह भारत में ठहरे तो कांग्रेस के सपोर्ट से संविधान सभा में पहुँचे और संविधान निर्माण में अहम भूमिका निभाई।
सरदार पटेल की मृत्यु के कुछ साल बाद ही अम्बेडकर का कांग्रेस और सत्ता से मोहभंग हो गया। वहअपने कुछ समर्थकों के साथ बुद्धिज्म में चले गए, जहां जाति व्यवस्था, छुआछूत को कोई जगह नहीं है। उसके पहले अम्बेडकर हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवाद पर लगातार हमले करते रहे।
अम्बेडकर के बुद्धिज्म में आने के बाद तमाम दलित विद्वान बुद्धिज्म की तरफ आकर्षित हुए हैं। हालांकि अगर छिछले स्तर पर देखें तो ऐसा लगता है कि उनका बुद्धिज्म ब्राह्मणों या कुछ जातियों को गालियां देने तक सिमटा है।
नरेंद्र मोदी और अम्बेडकर के बुद्धिज्म को यहां जोड़कर देखना उचित होगा। इस समय भारत के प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश से बसपा का सफाया हो चुका है। 5 किलो राशन पर जिन लोगों का वोट भाजपा को मिलना था, वह मिल गया। पढ़े लिखे दलित इस समय भाजपा से चिढ़े हुए और समाजवादी पार्टी की तरफ आकर्षित हैं। यह बड़ी साफ राजनीति है कि गौतम बुद्ध का नाम लेकर दलितों को आकर्षित किया जाए, खासकर पढ़े लिखे दलितों को।
आप लाल किले की प्राचीर से भारत को बुद्ध की धरती कहें या अपनी प्रेमिका की बाहों में रहकर असल मसला यह है कि आप बुद्धिज्म को कितना जी रहे हैं? आपके कर्मों में कितना बुद्धिज्म है? अगर आप धर्म, जाति के नाम पर दंगे कराते हैं, ईश्वर में आस्था रखते हैं कि कोई ऐसा ताकतवर ईश्वर है तो आप बुद्धिस्ट कैसे हो सकते हैं? आप बुद्धि का इस्तेमाल ही न करें और बुद्धिस्ट होने का दावा करें तो बिल्कुल नहीं चल पाएगा। सबसे जरूरी तो यह है कि आपके आचरण में बुद्धिज्म दिखना चाहिए।
गौतम बुद्ध श्रावस्ती के जेतवन में दो मित्रों से कहते हैं…
बहुम्पि चे सहितं भासमानो न तक्करो होति नरो पमत्तो।
गोपो व गावो गणपं परेसं न भागवा सामञ्जस्स होति॥16।।
(वह्वीमपि संहितां भाषमाणः, न तत्करो भवति नरः प्रमत्तः।
गोप इव गा गणयन् परेषां, न भागवान् श्रामण्यस्य भवति ॥18॥)
चाहे कोई भले ही बहुत से ग्रन्थों का पाठ करने वाला हो, किन्तु प्रमाद में पड़ यदि उसके अनुसार आचरण न करे, तो यह दूसरों की गौवें गिनने वाले ग्वाले की भांति, श्रामण्य का अधिकारी नहीं होता।
बुद्धिस्ट कभी भी, कोई भी हो सकता है। उसमें न धर्म का बंधन है न जाति की सीमा। आपको गैर नफरती बन जाना होता है, प्रेम से भर जाना होता है, करुणामय हो जाना होता है, सरल सहज हो जाना होता है, कल्याण मित्र बन जाना होता है। आप इतिहास में तमाम उदाहरण पाते हैं। जैसे मौर्य राजा अशोक बहुत भयानक हिंसक था। उसका हृदय परिवर्तन हुआ और उसने बौद्ध धर्म अपना लिया। राजाज्ञा जारी कराई कि पाकशाला में अब रोजाना 2 मोर और एक हिरन का मांस पकाया जाएगा, इससे ज्यादा जानवरों को नहीं मारा जाएगा। हथियार उठाने को बहुत अनिवार्य होने तक सीमित कर दिया। वहीं अशोक के पिता चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्म के अनुयायी थे।
सिद्धार्थ के समय में भी तमाम ब्राह्मणों ने बुद्धिज्म को अपना लिया। बड़ी संख्या में ब्राह्मण, अतार्किक यज्ञ और उसकी हिंसा छोड़कर श्रमण बन गए। बुद्धिज्म के विद्वान नागार्जुन दक्षिण भारत के ब्राह्मण थे। तिब्बत में बुद्धिज्म को ले जाने वाले भी ब्राह्मण रहे हैं।
अम्बेडकर ने अपने जीवन के अंतिम दौर में बुद्धिज्म अपनाया। शायद वह अपने जीवन के आखिरी पल तक वैदिक धर्म से उम्मीदें बनाए हुए थे, इसलिए देरी हुई। अगर अम्बेडकर दो दशक तक भी बुद्धिज्म में रह गए होते तो शायद देश के बहुत बड़े तबके का उद्धार हुआ होता। यही खेल नरेंद्र मोदी के साथ है। जिंदगी भर वह मानवद्रोही विचारधारा के साथ रहे हैं, जिसका सारा फोकस इस पर रहा कि देश के मुसलमानों को समुद्र में फेंक देना ही विकल्प है। अगर सच में नरेंद्र मोदी बुद्धिस्ट बन गए हैं तो वह उनके आचरण में दिखना चाहिए। उनके जीवन में भी बहुत कम वक्त बचा हुआ है, लेकिन वह प्रधानमंत्री जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर हैं, वह वैश्विक कल्याण की दिशा में बेहतर काम कर सकते हैं।
इसके लिए कोई जरूरी नहीं कि मोदी ने त्रिपिटक पढ़े हैं या नहीं। उन्होंने बुद्धिज्म के कितने विद्वानों से ज्ञान पाया है, यह भी जरूरी नहीं। अगर वह बुद्धिज्म का आचरण अपना लेते हैं तो इतना ही पर्याप्त होगा। उनके आचरण में झलकना चाहिए कि उनकी नफरत कम हुई है, उनकी आत्मा शुद्ध हुई है, वह शांत हुए हैं।
श्रावस्ती के जेतवन प्रवास के दौरान गौतम बुद्ध एक जिज्ञासु से कहते हैं…
अप्पम्पि चे सहितं भासमानो घम्मस्स होति अनुघम्मचारी। रागञ्च दोसञ्च पहाय मोहं सम्मप्पजानो सुविमुत्तचित्तो। अनुपादियानो इघ वा हुरं वा स भागवा सामञ्जस्स होति॥20॥
(अल्पामपि संहितां भाषमाणो, धर्मस्य भवत्यनुधर्मचारी।
रागं च द्वेषं च प्रहाय मोहं, सम्यक् प्रजानन् सुविमुक्तचित्तः।।
अनुपादान इह वाऽमुत्र वा, स भागवान् श्रमणस्य भवति ।।20।।)
चाहे कोई भले ही थोड़े ग्रन्थों का पाठ करने वाला हो, किन्तु धर्मानुकूल आवरण करता हो, राग, द्वेष और मोह को छोड़ सचेत और मुक्तचित्त वाला हो, तथा इस लोक या परलोक में कहीं भी आसक्ति न रखता हो तो बह श्रामण्य का अधिकारी होता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बुद्धिज्म में खुले दिल से स्वागत है। लेकिन बुद्धिज्म अपनाने के लिए तमाम तरह के राग द्वेष, कुंठाए त्यागनी पड़ती हैं। लव और कंपेशन लाना पड़ता है। राज पाठ त्यागना पड़ता है, सुखों और दुःखो के प्रति निरपेक्ष होना पड़ता है। जातीय और धार्मिक घृणा त्यागनी पड़ती है। उम्मीद है कि खुद को बुद्धिस्ट कहने वाले थोड़ा सा बुद्ध बनने की कोशिश जरूर करेंगे। कोई बकरा, मछली, हिरन काट डालने, उसकी बलि दे देने के लिए लपलपाया भी रहे और बुद्धिस्ट भी रहे, यह सम्भव नहीं है। बुद्धिस्ट होने के लिए उसके शील/नियमों का पालन करना होता है, तभी लाभ मिलता है।



अनन्त वर्मा
August 15, 2024 at 8:05 pm
अशोक के पिताजी बिंदुसार थे ना की चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक की रसोई में मोर और हिरन बनाये जाते थे ये आप के लेख से ही पता चला वो भी बुद्ध बनने के बाद और आपके पुरे लेख का कोई सिर पैर समझ नहीं आया मतलब इतने बडे लेख का क्या अर्थ है