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सियासत

विपक्ष ने मंच सजाया और मोदी ने लूटा!

रोहित देवेंद्र-

प्रिय विपक्ष,

आप अविश्वास प्रस्ताव लेकर क्यों आए? एक सरकार जो नंबरों की वजह से कहीं से भी अस्थिर होती हुई नहीं दिखती थी, आप उसे सिर्फ बातों से घेर सकते थे। लेकिन उसे बातों से घेरने वाला कौन था?…

टूटी फूटी हिंदी वाले अधीर रंजन या हिंदी में जेंडर की समझ न रखने वाले गौरव गोगोई? यूपी, बिहार, मप्र, राजस्‍थान, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली जैसे हिंदी भाषी राज्यों में कांग्रेस ने 2019 में करीब-करीब कोई सीट नहीं जीती है। सोनिया गांधी अब बोलती नहीं हैं। तो क्या एक अकेले राहुल के बूते यह अविश्वास प्रस्ताव आया था। वह राहुल जो अपनी स्पीच या जरुरत से ज्यादा मॉडेस्ट रखते हैं या फिर जरूरत से ज्यादा आक्रामक हो उठते हैं। अपनी स्पीच को भाषण का नाम देकर वह खुद ही उसे हल्का कर देते हैं।

कांग्रेस और विपक्ष को यह बात समझनी चाहिए कि वह इन दिनों लोकसभा में नेताओं के क्राइसिस से गुजर रही है। कांग्रेस के पास प्रियरंजन दास मुंशी जैसा विट रखने वाला नेता नहीं है। ना ही राजनीतिक समझ रखने वाले जर्नादन द्विवेदी। अपनी मारक अंग्रेजी में तथ्यों से चकाचौंध कर देने वाली प्रणव मुखर्जी नहीं हैं। एकेडमिक अर्जुन सिंह नहीं हैं। बातूनी कपिल सिब्बल या कानूनविद सलमान खुर्शीद नहीं हैं। जयपाल रेड्डी, मणिशंकर अय्यर, कमलनाथ, चिदंबरम, वीएन गाडगिल या ऑस्कर फर्नाडींज जैसे अच्छे संसदीय नेता नहीं हैं।

आपको पंजाब या साउथ से आए हुए नॉन हिंदी सांसदों से काम चलाना है। यह खालीपन अकेले कांग्रेस का नहीं है। मैं पीलू मोदी या मधु लिमये तक तो जा ही नहीं सकता। सदन में लालू नहीं हैं, नीतिश नहीं हैं, चन्द्रशेखर नहीं हैं। समकालीन ममता बनर्जी, अखिलेश या मायावती भी नहीं हैं। या कोई ऐसा नेता नहीं है जो अपनी लोकप्रिय होने की कैपिसेटी में पहचाना जाता हो। राज्यसभा में अभी भी आपकी दुर्गत नहीं है। वहां अभी ऐसे नेता हैं जो अपनी बात रख लेते हैं। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में सक्षम हैं।

नेता का एक वक्ता के तौर पर औसत होना तब मैनेज हो जाता है जब आपके साथ मीडिया हो। मीडिया, विशेषकर टीवी मीडिया। जो फिलहाल सरकार की बातों पर मानों मंत्रमुग्‍ध है। हर कोई जानता है कि राहुल गांधी ने महिलाओं की तरफ फ्लाइंग किस का इशारा नहीं किया था। वह एक झूठ था फिर भी मीडिया में राहुल की स्पीच से ज्यादा इस झूठ को तैराया गया। एक स्तरहीन आरोप मीडिया की निगाह में भाषण से भारी पड़ गया। विपक्ष को यह बात पता होनी चाहिए थी कि उनके नेताओं के भाषण और बाद में सरकार के तरफ से आने वाले जवाब में मीडिया किसे तवज्जो देगा? सारा खेल यह नैरेटिव गढ़ने का था। सरकार की दिलचस्पी म‌णिपुर में ना पहले थी ना ही अविश्वास प्रस्ताव की बहस में दिखी।

‘सोनिया जी बेटे को सेट कर रही हैं और दामाद को भेंट’। मणिपुर पर हो रहे अविश्वास प्रस्ताव पर ऐसी लाइने सरकार की तरफ से बोलीं जाती हैं और मीडिया उन्हें हाथों-हाथ लपकता है। प्रधानमंत्री अच्छे वक्ता है। प्रधानमंत्री अच्छे वक्‍ता हैं, इसे इस तरह से भी देख सकते हैं कि उन्हें एक ऐसी संसद मिली जहां विपक्षी की बेंच वक्ताओं से खाली हैं। पर सिर्फ वक्ता हो जाना काफी होता है क्या? अविश्वास प्रस्ताव पर सवा दो घंटे के भाषण में प्रधानमंत्री मणिपुर का जिक्र तब लेकर आते हैं जब दो घंटे बीत रहे होते हैं और विपक्ष सदन में वाकआउट कर रहा होता है।

हर चैनल ने उस एक फिल्म की लंबाई बराबर के उनके प्रवचन को बिना ब्रेक के दिखाया। इतना फुटेज तो उन्हें एक रैली में भी नहीं मिलता जितना संसद से मिल गया। एक भी टीवी चैनल ने यह बात नहीं उठायी कि म‌णिपुर की इस बहस में मणिपुर कहां है? विपक्ष को यह बात पता होनी चाहिए थी कि वह दरअसल वह मोदी के प्रवचन के लिए ही मंच सजा रहे हैं। सजे हुए मंच को लूटना उन्हें आता है। उन्हें यह भी आता है कि मणिपुर पर हो रही बात को चुनाव की तरफ कैसे मोड़ी जाए। मोदी जी के अंदर यह हुनर है वह दाल और सब्जी के स्वाद में हो रही बहस में भी चुनाव का लाभ-हानि खोज सकते हैं। यह उनका हुनर है। इसकी आलोचना के साथ कद्र भी करनी चाहिए।

अविश्वास प्रस्ताव खत्म हो चुका है। विपक्ष पहले हताश दिख रहा था, अविश्वास प्रस्ताव की इस नौटंकी के बाद हताश और हारा हुआ दोनों। इस दुनिया में ‌स्थिर कुछ भी नहीं है। ना ही ये निर्वात रहेगा और ना ही सम्मोहन। लेकिन विपक्ष को यह बात समझनी चाहिए कि जब सारा खेल बातों का है तो उसे भी नेता नहीं बातूनी चाहिए…

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