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सियासत

मोदी-अडानी संबंध पर एक नोट!

अदाणी के बदले स्टारलिंक को मोदी सरकार देश का सारा डाटा हवाले करने जा रही है!

अरुण माहेश्वरी-

इतिहास और समकालीन राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिनमें किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष या शीर्ष नेता सत्ता के प्रभाव का उपयोग करके किसी बड़े उद्योगपति के व्यापार में चोरी-छिपे साझेदार बन जाता है अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उससे लाभ उठाता है। हालाँकि, ऐसे मामलों में अक्सर ये बातें छिपी रहती हैं और बाद में खुलासों, लीक या राजनीतिक परिवर्तन के बाद ही सामने आती हैं।

उदाहरण के तौर पर रूस में व्लादिमीर पुतिन और ओलिगार्क्स के संबंधों को लिया जा सकता है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर लंबे समय से आरोप हैं कि उन्होंने सत्ता में आने के बाद रूस के कई बड़े उद्योगपतियों (ओलिगार्क्स) के साथ गुप्त साझेदारियाँ कीं या उनसे भारी लाभ प्राप्त किया। जैसे, यूरी कोवलचुक, गेन्नादी टिमचेंको, और इगोर सेचिन ऐसे ओलिगार्क्स के नाम हैं जो पुतिन के निकट माने जाते हैं। पैनामा पेपर्स और पैराडाइज़ पेपर्स जैसी लीक में यह सामने आया कि पुतिन से जुड़े लोग गुप्त विदेशी कंपनियों के ज़रिए अरबों डॉलर का लेन-देन करते हैं, जिनमें पुतिन की अप्रत्यक्ष भागीदारी की आशंका जताई गई।

इसके पहले अतीत में इंडोनेशिया के सुहार्तो का क्रोनी कैपिटलिज़्म बहुत चर्चा में था। इंडोनेशिया के पूर्व राष्ट्रपति सुहार्तो के शासन (1967–1998) में कई बड़े उद्योगपतियों के साथ सत्ता के बल पर सुहार्तों की साझेदारी के आरोप लगे थे। सुहार्तो के परिवार और उनके करीबी व्यापारी (जिन्हें “क्रोनी” कहा गया) को विशेष सरकारी ठेके, लाइसेंस और व्यापारिक लाभ मिलते थे। ऐसा माना जाता है कि सुहार्तो ने अपनी सत्ता का उपयोग कर अपने और अपने परिवार के लिए अरबों डॉलर की संपत्ति बनाई।

यही कहानी फिलिपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस और उनकी पत्नी इमेल्डा मार्कोस की रही है। उन्होंने सत्ता का उपयोग कर बड़े व्यापारिक सौदों में गुप्त हिस्सेदारी बनाई और अरबों डॉलर की संपत्ति हड़पी। उन्होंने कई व्यापारिक घरानों को अपने हित में इस्तेमाल किया।

कांगो (ज़ायरे) के तानाशाह मोबुतु सेसे सेको ने सरकारी कंपनियों का निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल किया और व्यापारिक साझेदारियों के ज़रिए अपनी संपत्ति को अरबों डॉलर तक पहुँचाया।

इन उदाहरणों में यह सामान्य है कि राष्ट्राध्यक्ष सत्ता का दुरुपयोग करके ऐसे बड़े उद्योगपतियों से लाभ उठाते हैं, जो या तो उनकी सत्ता को बनाए रखने में मदद करते हैं या बदले में विशेष सुविधाएँ प्राप्त करते हैं। ऐसी चोरी-छिपे व्यापारिक साझेदारी को छिपाने के लिए अक्सर शेल कंपनियों, विदेशी खातों और परिवार या भरोसेमंद मित्रों के नाम का सहारा लिया जाता है।

इसी पृष्ठभूमि में मोदी के साथ गौतम अडानी के संबंध को भी देखा जा सकता है ।

गौतम अडानी और नरेंद्र मोदी का संबंध गुजरात से शुरू होता है, जब मोदी वहाँ के मुख्यमंत्री (2001–2014) थे। गुजरात मॉडल में इन्फ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्रियल ग्रोथ पर ज़ोर दिया गया, जिसमें अडानी समूह को कौड़ीयों के मोल पर कई परियोजनाएँ और भूमि आवंटन हुए। 2014 में मोदी जब प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव लड़ रहे थे, तब उन्होंने प्रचार हेतु अडानी के निजी विमान का उपयोग किया, इसकी तस्वीर तो लोक सभा तक में राहुल गांधी ने प्रदर्शित की थी।

2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद अडानी समूह का अप्रत्याशित विस्तार शुरू हो गया। बंदरगाह, हवाई अड्डे, ऊर्जा, रक्षा, खनन, यहाँ तक कि मीडिया में भी अडानी समूह ने तूफानी गति से प्रवेश किया। अडानी समूह को नीतिगत लाभ भी दिये गए, जिनमें हवाई अड्डों का निजीकरण शामिल है, जिसमें अडानी को बिना पूर्व किसी अनुभव के 6 प्रमुख हवाई अड्डों का संचालन सौंप दिया गया।

विदेशों में भी मोदी सरकार ने अडानी के पक्ष में राजनयिक दबाव डाला ऑस्ट्रेलिया में अडानी के लिए राजनयिक दबाव और पर्यावरणीय नियमों में ढील दिलाई गई। 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने ऑस्ट्रेलिया की यात्रा की और वहाँ के नेताओं के साथ अडानी की परियोजना को लेकर विशेष चर्चा की। अडानी को भारतीय स्टेट बैंक से $1 बिलियन ऋण दिलाने की कोशिश भी हुई, जिसे जनदबाव के कारण रोका गया। वहां की कारमाइकल कोयला खदान (Carmichael Coal Mine) अडानी समूह की आज भी एक सबसे विवादास्पद परियोजना है। ऑस्ट्रेलियाई पर्यावरण कार्यकर्ताओं और जन-आंदोलनों के विरोध के बावजूद मोदी सरकार ने इस परियोजना के लिए ऑस्ट्रेलिया सरकार पर राजनयिक दबाव डाला।

श्रीलंका में कोलंबो बंदरगाह का अडानी को ठेका दिलवाया गया जिस पर वहाँ तीव्र स्थानीय विरोध और राजनैतिक संकट उत्पन्न हुआ। बाद में लीक हुई रिपोर्टों के अनुसार भारतीय उच्चायोग और मोदी सरकार द्वारा श्रीलंकाई नेताओं पर अडानी समूह को ठेका देने के लिए दबाव की पुष्टि हुई है। श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने स्वयं संसद में स्वीकार किया कि “भारत सरकार के आग्रह पर अडानी को यह परियोजना दी गई।”

पड़ोस के दूसरे देश बांग्लादेश में अडानी को उच्च दर पर बिजली खरीद का अनुबंध दिलवाया गया। बांग्लादेश सरकार ने अडानी पावर से बिजली खरीदने का समझौता किया, जिसमें बाजार दर से कहीं अधिक दर पर बिजली खरीदना तय हुआ। यह सौदा बांग्लादेश में लोकल मीडिया और विपक्ष द्वारा भ्रष्टाचार के रूप में प्रस्तुत किया गया। विश्लेषकों का कहना है कि इसमें भी भारत सरकार के कूटनीतिक दबाव की भूमिका थी। द गार्जियन (UK) और वाशिंगटन पोस्ट जैसी अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इस सौदे की आलोचना की।

ऐसा ही मामला है इज़राइल में हाइफा पोर्ट के अधिग्रहण का। 2023 में अडानी समूह ने हाइफा पोर्ट का अधिग्रहण किया। यह अधिग्रहण सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था क्योंकि हाइफा पोर्ट इज़राइल के लिए रणनीतिक व्यापार और सैन्य पोर्ट है। इसमें भी मोदी और प्रधानमंत्री नेतन्याहू के घनिष्ठ संबंधों का दबाव काम कर रहा था। इज़राइली मीडिया में यह रिपोर्ट सामने आई है कि अडानी को मोदी के प्रभाव से यह अधिग्रहण संभव हुआ।

जिन अन्य देशों की परियोजनाओं के लिए अडानी के लिए मोदी सरकार ने काम किया उनमें म्याँमार अफ्रीका के देश केन्या और तंज़ानिया शामिल हैं।

2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट ने अडानी समूह पर शेयर बाज़ार में धोखाधड़ी और कृत्रिम तरीके से शेयर कीमत बढ़ाने का आरोप लगाया। इस रिपोर्ट के बाद मोदी सरकार की अडानी समूह के प्रति मौन और जाँच में उदासीनता भी अडानी-मोदी के संबंधों को संदेह के घेरे में ला देती है।

यद्यपि इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं कि मोदी स्वयं किसी व्यापार में साझेदार हैं, परन्तु अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से साफ है कि अक्सर राजनेताओं और उद्योगपतियों के बीच गुप्त साझेदारी शेल कंपनियों, विश्वासपात्रों, और नीतिगत लाभों के ज़रिए होती है, जो सामान्य जाँच में सामने नहीं आती। यह भी देखा गया है कि अडानी समूह में निवेश करने वाली कुछ विदेशी शेल कंपनियाँ भारत में FPI (Foreign Portfolio Investors) के तौर पर जुड़ी हैं, जिनकी पारदर्शिता संदिग्ध है।

सब जानते हैं कि रूस में पुतिन और ओलिगार्क्स का संबंध “सत्ता के लिए व्यापार और व्यापार के लिए सत्ता” के आधार पर चलता है। भारत में अडानी समूह को जिस तरह नीतिगत समर्थन, तेज़ी से ऋण, और रणनीतिक क्षेत्रों में प्रवेश मिला है, वह पुतिन-ओलिगार्क्स के समीकरण से मिलता-जुलता दिखता है। सुहार्तो और मोबुतु के समय की तरह क्रोनी कैपिटलिज़्म (सत्ता के करीबी व्यापारियों को बढ़ावा देना) का दृश्य भारत में भी अभी दिख रहा है।

अडानी समूह ने 2022-23 में NDTV जैसे स्वतंत्र मीडिया चैनल का अधिग्रहण कर लिया। इससे यह आरोप और गहराया कि सरकार के पक्ष में मीडिया नियंत्रण करने का प्रयास अडानी के ज़रिए किया गया।

इस प्रकार, सत्ता के बल पर किसी एक उद्योगपति का तेज़ी से विस्तार; नीतिगत लाभ और संसाधनों पर पहुँच; व्यापारिक हितों की सुरक्षा हेतु विदेशी स्तर पर भी दखल; विपक्ष, मीडिया और नागरिक समाज द्वारा जवाबदेही की माँग – इन सब लिहाज से मोदी-अडानी संबंधों पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है। मोदी अडानी की साझेदारी के कानूनी प्रमाण नहीं हैं, पर राजनीतिक साझेदारी और नीतिगत लाभ की साझेदारी के सशक्त प्रमाण और संदिग्ध घटनाक्रम से ऐसे प्रश्न स्वाभाविक रूप में उठते हैं। को निरंतर हवा देते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में आता है अमेरिका में अडानी पर चल रहा आपराधिक मुक़दमा और भारत के प्रति ट्रंप के रुख का सवाल। 2024 में अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने अडानी समूह की कुछ शेल कंपनियों और व्यापारिक गतिविधियों की क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन शुरू की थी। आरोप है कि अडानी समूह ने अमेरिकी निवेशकों को गुमराह किया, साथ ही मनी लॉन्ड्रिंग और इंसाइडर ट्रेडिंग जैसे अपराध किए। अमेरिकी अदालतों में इसके दस्तावेज़ दाखिल हो चुके हैं।

अमेरिकी मीडिया में यह चर्चा है कि डोनाल्ड ट्रंप, जो व्यक्तिगत स्तर पर मोदी से घनिष्ठ रहे हैं, अडानी के व्यापारिक रहस्यों और मोदी-अडानी संबंधों से परिचित हैं। विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप इस संबंध का उपयोग भारत पर दबाव डालने अर्थात् मोदी की “बाँहें मरोड़ने” में कर सकते हैं। इसे कूटनीतिक ब्लैकमेल का एक उदाहरण माना जायेगा।

कुल मिला कर जाहिर है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत की विदेश नीति के कुछ हिस्से अडानी समूह के व्यापारिक विस्तार से इतने गहराई से जुड़े दिखाई देते हैं कि वह राज्य की शक्ति का निजी पूँजी के लाभ के लिए नग्न ढंग से प्रयोग करने का उदाहरण लगता है।

यह वही मॉडल है जो रूस, इंडोनेशिया और कांगो जैसे देशों में सत्ता और पूँजी के बीच गुप्त साझेदारी के रूप में सामने आया जहाँ सत्ता स्वयं किसी औद्योगिक साम्राज्य की निर्माता और रक्षक के रूप में सामने आती है।

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