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नरेंद्र मोदी बनाम मनमोहन सिंह: 11 साल की आर्थिक नीतियों का कड़वा हिसाब!

विजय सिंह ठकुराय-

सितंबर, 2013 में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर अपने सबसे निचले स्तर 68 रुपए पर पहुंच गया था। तब मनमोहन सिंह ने आरबीआई के साथ मिलकर अप्रवासी भारतीयों के लिए FCNR (B) नामक एक इन्वेस्टमेंट स्कीम लांच की थी, जिसके तहत NRIs को अमेरिकी बैंकों के मुकाबले तीन गुना ब्याज देने की गारंटी दी गयी थी।

शुरू में इस स्कीम की बेहद आलोचना हुई पर सरदार जी की यह स्कीम गेमचेंजर साबित हुई। भारत के पास डॉलर के इन्वेस्टमेंट की झड़ी लगी गयी। कुछ ही दिनों में भारत को लगभग डेढ़ लाख करोड़ का फॉरेक्स रिज़र्व प्राप्त हुआ था और दो महीने के भीतर रुपया मजबूत होकर 60 तक आ गया था। यह मौनमोहन सरदार का मास्टर स्ट्रोक था, जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं।

वैसे ऐसा ही एक मिलता-जुलता मास्टर स्ट्रोक हमारे अजैविक महात्मा जी के नाम भी दर्ज है। रुपए को मजबूत करने, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने और सोने का इम्पोर्ट कम करने के लिए महात्मा जी की सरकार ने 2015 में “सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना” शुरू की थी। अर्थात – अपना सोना सरकार को दो और गोल्ड बॉन्ड खरीद लो। 8 साल बाद ढाई परसेंट के ब्याज के साथ सोने की वर्तमान कीमत के हिसाब से रिटर्न ले लेना। निवेशकों ने धड़ाधड़ इस स्कीम में इन्वेस्ट किया।

सरकार को सोने की कीमतें स्थिर रहने की उम्मीद थी। परंतु जो सोना 2015 में 26 हजार का था, उसने सब अनुमानों को धता बताते हुए ऐसी जंप मारी कि 2024-25 आते-आते लाख रुपए पार हो गया। परिणामस्वरूप आज सरकार ने अपने ऊपर सवा लाख करोड़ के आसपास की एक्सट्रा लायबिलिटी मोल ले रखी है, जो वह लोगों को चुका रही है। सरल शब्दों में – इस सोने के इन्वेस्टमेंट से जितना लाभ नहीं कमाया, उससे कहीं ज्यादा का बिल फट गया। झक मार कर अंततः इस साल इस स्कीम को बंद कर दिया गया। नोटबंदी और जीएसटी की तरह यह योजना भी “मास्टर ब्लंडर” साबित हुई।

पढ़े-लिखे पीएम और अशिक्षित पीएम की “दूरदर्शिता” का अंतर इसे ही कहते हैं।

अंत में एक बार फिर से याद दिला दूँ कि पिछले 11 साल में जीडीपी 2 ट्रिलियन से 4 ट्रिलियन अर्थात “दो गुनी” हुई है। वहीं राष्ट्रीय कर्ज 55 लाख करोड़ से 200 लाख करोड़ पार हो चुका है, अर्थात कर्ज की वृद्धि “चार गुना” हुई है।

पढ़े-लिखे पीएम को हटा कर चाय बेचने वालों के हाथ में देश सौंप देने का यही अंजाम होता है।

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