
संजय कुमार सिंह
दि एशियन एज में आज पहले पन्ने पर तीन कॉलम की एक बाईलाइन खबर है जो किसी और अखबार में पहले पन्ने पर इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी। दि एशियन एज में शशि भूषण ने इस खबर की शुरुआत ही इस तरह की है, बिहार का महत्वपूर्ण चुनाव करीब आ रहा है तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को किसानों और देश के कृषि क्षेत्र को संबोधित किया। कृषि और ग्रामीण संपन्नता पर बजट के बाद एक वेबिनार को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार न सिर्फ कृषि को विकास का पहला इंजन मानती है बल्कि एक ऐसा भारत बनाने के लिए काम कर रही है जहां, किसान संपन्न और सशक्त हों। किसानों के प्रति इस सरकार और खासकर नरेन्द्र मोदी का रवैया आप जानते हैं। मोटे तौर पर वह यह कि किसानों के हित में या कृषि से देश का जो भला हो सकता है उसे हासिल करने के लिए किसानों से संबंधित कानून बनाये थे जो किसानों की किसी मांग और उनसे कोई सलाह किये बगैर थोप दिये गये थे। अमूमन ऐसे कानूनों का विरोध नहीं होता है और अब तो करना भी संभव नहीं रह गया है। देश के लिए कौन लाठी खाये। पर किसानों ने इसका पुरजोर विरोध किया। जवाब में सरकार और सरकारी पार्टी के प्रचारकों की ओर से किसानों तथा उनके आंदोलनों को बदनाम किया गया। किसानों में बहुत सारे सिख हैं इसलिए सिखों को भी नहीं बख्शा गया। किसान दिल्ली पहुंचकर सरकार के समक्ष अपनी मांग रखना और बात करना चाहते थे लेकिन उन्हें रोकने के हर संभव उपाय किये गये। यहां तक कि दिल्ली सीमा सील कर दी गई सड़कों पर कीलें लगवा दी गईं। धरना दे रहे किसानों से एक फोन कॉल दूर होने की बात की गई पर ना कोई नंबर दिया गया ना कोई फोन कॉल आई।
अब किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल तीन महीने से ऊपर से अनशन पर हैं। उनकी मांग नहीं सुनी जा रही है। आज ही एक खबर है कि, डल्लेवाल के समर्थन में सौ किसान भूख हड़ताल करेंगे। लेकिन यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। दूसरी ओर, चुनाव से पहले “शिकारी आयेगा, जाल बिछायेगा, दाना डालेगा की तर्ज पर ….” प्रधानमंत्री ने अपना काम शुरू कर दिया है। मेरी खबर यह है कि आज न जाने कैसे यह खबर दूसरे अखबारों में इतनी या इससे ज्यादा प्रमुखता से नहीं है। भले, खबर है तो होगी ही पर प्रमुखता नहीं मिली यह रेखांकित करने वाली बात है। दि एशियन एज की खबर का शीर्षक है, मोदी ने ग्रामीण और कृषि विकास पर फोकस किया, किसानों की तारीफ की। उपशीर्षक है, सरकारी योजनाएं गिनाईं, नए आईडिया, ऐक्शन की अपील की। इस खबर को हिन्दी में ढूंढ़ने के लिए दि एशियन एज के शीर्षक का यह अनुवाद मैंने गूगल किया तो पता चला है कि यह खबर पीएम इंडिया डॉट गव डॉट इन से ली गई है। पीआईबी की विज्ञप्ति के साथ यू ट्यूब पर वीडियो भी है।
पीआईबी के अनुसार, विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रहे भारत के संकल्प बहुत स्पष्ट हैं। हम सभी मिलकर एक ऐसे भारत के निर्माण में जुटे हैं, जहां किसान समृद्ध हो, किसान सशक्त हो। हमारा प्रयास है कि कोई किसान पीछे ना छूटे, हर एक किसान को आगे बढ़ाएं। हमने कृषि को विकास का पहला इंजन मानते हुए, अपने अन्नदाताओं को गौरवपूर्ण स्थान दिया है। हम दो बड़े लक्ष्यों की ओर एक साथ बढ़ रहे हैं, पहला- कृषि सेक्टर का विकास और दूसरा- हमारे गांवों की समृद्धि। पीएम किसान सम्मान निधि योजना, 6 साल पहले लागू की गई थी। इस योजना के तहत अब तक लगभग पौने 4 लाख करोड़ रुपए किसानों को मिल चुके हैं। इतनी राशि करीब-करीब 11 करोड़ किसानों के खाते में सीधे पहुंचाई गई है। 6 हजार रुपए सालाना की इस आर्थिक मदद से ग्रामीण अर्थव्यवस्था सशक्त हो रही है। हमने एक किसान केंद्रित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया है, ताकि देशभर के किसानों तक इस योजना का लाभ पहुंच सके। आप समझ सकते हैं कि चुनावी नजरिये से यह खबर कितनी प्रभावी हो सकती है। यह अलग बाद है कि किसानों के खिलाफ काम करके भी भाजपा हरियाणा का चुनाव जीत गई है। पर वह अलग मुद्दा है।
आज (इतवार है इसलिए) मुद्दा यह है कि दि एशियन एज के पहले पन्ने पर बताया गया है कि अंदर कौन सी खबरें हैं। इनमें एक खबर है, पाकिस्तान चीन का प्रभावी मुकाबला करने के लिए भारतीय वायु सेना को 60-65 लड़ाकू स्क्वाड्रन चाहिये। अंदर इस खबर के शीर्षक का पहला हिस्सा है, भारतीय सेना की शक्ति घटकर 30 स्क्वाड्रन रह गई है। निजी तौर पर मैं सेना की शक्ति बढ़ाने या युद्ध की तैयारियों के पक्ष में नहीं हूं। मैं सबके साथ मिलकर, शांतिपूर्ण जीवन जीने और जीने देने में यकीन करता हूं। इसलिए मैं ऐसी खबरों पर ध्यान नहीं देता। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने 2019 का चुनाव घुसकर मारूंगा की घोषणा के साथ लड़ा था और अब अगर यह स्थिति है तो चिन्ता की बात है। एक तो आपने लड़ाई मोल ली, उसे कम करने के प्रयास नहीं किये और अब पता चल रहा है कि वायु सेना को ही कमजोर कर दिया है तो यह कैसी देश भक्ति है और देश नहीं बिकने दूंगा कहकर सबकुछ अदाणी को सौंपते जाने के बाद अब यह क्या है और आज यह खबर इस रंग-रूप में पहले पन्ने पर क्यों नहीं है? खबर के अनुसार भारत की स्वीकृत शक्ति 42 स्क्वाड्रन की है और घटकर 30 रह गई है।
दूसरी ओर, पड़ोस के देशों में काफी कुछ बदला है। वैसे, यह खबर ‘सूत्रों’ के हवाले से है। असल में ऐसी ही एक खबर दि एशियन एज में कल भी थी। वायुसेना प्रमुख के हवाले से कल सिंगल कॉलम में छपी इस खबर का शीर्षक था, हमें हर साल 35-40 लड़ाकू विमानों की आवश्यकता है। उन्होंने मेक इन इंडिया योजना के तहत इसके लिए निजी निर्माताओं को आकर्षित किये जाने की बात की थी और संभव है, मामला देश की चिन्ता से ज्यादा विमान खरीदने का हो और ऐसे मामलों में ऐसा होता भी है। लेकिन मुख्य बात यह है कि हमारी वायु सेना के पास लड़ाकू विमानों की कमी है और राफेल विमान के सौदे में जो संशोधन हुए थे, जो जल्दबाजी हुई और जो सब हुआ, उसके आलोक में इस जरूरत की निष्पक्ष चर्चा होनी चाहिये और खबर छपने की यह स्थिति आनी ही नहीं चाहिये थी। एक तरफ तो सरकार ने राफेल विमानों के तकनीकी विवरण गोपनीयता के आधार पर साझा नहीं किये और दूसरी ओर दुनिया जान चुकी है कि लड़ाकू विमानों के मामले में हमारी क्षमता और स्थिति जरूरत से कम या खराब है। आज की खबर कल वाले की फॉलो अप हो तो भी सर्वोच्च स्तर पर सक्रियता पहले से होनी जानी चाहिये थी और आज इस खबर की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिये थी। पर जैसा कि मैंने पहले कहा और खबरों से लग रहा है, सरकार बिहार चुनाव जीतने के लिए चुनावी तैयारी कर रही है और इसमें देश की रक्षा शक्ति उपेक्षित लग रही है। वायु सेना प्रमुख ने यह बात कल एक सेमिनार में कही थी और आज उसका फॉलोअप है तो यह भी संभव है कि जो स्थितियां हैं उससे वे चिन्तित हों और देश को वास्तविकता बताना अपनी जिम्मेदारी मानते हों और वैसे ही मजबूर हों जैसे एक समय चार जज हो गये थे। या पिछले दिनों शिवराज सिंह चौहान और फिर भोपाल के सांसद आलोक शर्मा नजर आये। वायु सेना से संबंधित इस खबर में यह जरूर बताया गया है कि रक्षा मंत्रालय ने एक पैनल बना रखा है पर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाला पैनल जब मनमाना है तो इसके बारे में कौन जाने।
इस स्थिति में यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री अपनी प्रचार योजना जारी रखे हुए हैं और आज हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर छपी खबर के अनुसार भारत जो बैक ऑफिस होता था वर्ल्ड फैक्ट्री हो गया है और अब यहां सेमीकंडक्टर से लेकर एयरक्राफ्ट कैरियर तक बनते हैं। हालांकि, कार और ट्रक जो देसी कंपनी पहले से ही बना रही थी उसके लिए विदेशी कंपनियों को भी आमंत्रित कर लिया गया है और सारा काम मशीनों से हो रहा है तो देश को कम कंपनियों को ज्यादा लाभ है। पर वह अलग मु्द्दा है और विपक्ष को देखना है पर विपक्ष सरकार का काम देखे या चुनाव जीतने की उसकी साजिशों-उपायों का मुकाबला करे। सरकार की मनमानी और जनविरोधी नीतियों के परिणामस्वरूप आज एक और खबर है, पुरानी (मियाद निकल चुकी) गाड़ियों को दिल्ली में पेट्रोल नहीं बेचा जायेगा। यह बात दिल्ली के पर्यावरण मंत्री ने कही है पर मुद्दा यह है कि जब गाड़ियों को चलने ही नहीं देना है, जब्त कर ली जानी है तो पेट्रोल बेचने या नहीं बेचने का क्या मतलब? पेट्रोल गाजियाबाद या फरीदाबाद से भराकर भी तो दिल्ली में नहीं चलाना है। कायदे से पुरानी गाड़ी चलती मिले तो गाड़ी मालिक के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिये और मामला गंभीर लगे तो उसके खिलाफ जिसे दिल्ली में इसे रोकना है। दोनों को छोड़कर पेट्रोल बेचने पर रोक से अधिकारियों को कुछ विशेष अधिकार मिल जायेंगे और इसका उपयोग वैध-अवैध वसूली के लिए किया जा सकता है। इसीलिये ऐसे नियम बनाये जाते हैं और लागू किये जाते हैं। इसे लाल फीताशाही कहा जाता था। स्वतंत्रता के बाद इसे कम करने के प्रयास किये जाते रहे हैं लेकिन अब मामला कुछ और ही है। ऐसी खबरों से सरकार काम करती दिखती है इसलिए इन्हें प्रमुखता मिलती है। ऐसी ही एक खबर आज मणिपुर की है।
इसके अनुसार, “मणिपुर में आठ मार्च से सभी रास्तों पर मुक्त आवाजाही सुनिस्चित करें : शाह”। उपशीर्षक है, गृहमंत्री ने समीक्षा बैठक में दिया निर्देश, कहा – शांति के लिए प्रतिबद्ध। यह अमर उजाला का शीर्षक है और आज सभी अखबारों में है। मणिपुर की यह बहुत सामान्य सी खबर आज भिन्न अखबारों में पहले पन्ने पर है। लेकिन वहां चल रही हिंसा की खबरें पहले पन्ने पर नहीं होती थीं। नवोदय टाइम्स में आज एक और सरकारी खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। टॉप पर छपी इस खबर का शीर्षक है, “महिला सम्मान योजना 8 से!” नवोदय टाइम्स में छपी एक और खबर के अनुसार, मतपत्रों से चुनाव पर विधि मंत्रालय ने कहा, यह अधिकार क्षेत्र से बाहर। ईवीएम पर सु्ब्रमण्यम स्वामी के संपादन में आई एक किताब का नाम ही है, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन – असंवैधानिक और छेड़छाड़ योग्य। आप समझ सकते हैं कि कांग्रेस सरकार में ईवीएम आई थी तो वह छेड़छाड़ योग्य तो थी ही, असंवैधानिक भी थी। अब उससे छेड़छाड़ तो संभव नहीं ही है, इतनी संवैधानिक हो गई है कि विधि मंत्रालय मतपत्रों से चुनाव कराने को ही ‘अधिकार से बाहर’ कह रहा है। वास्तविकता जो भी हो भाजपा और उसकी सरकार का ‘यू टर्न’ छिपाये नहीं छिपने वाला है। दिलचस्प यह कि उसे इसकी जरूरत भी नहीं है क्योंकि मीडिया जेब में है। मणिपुर पर अमित शाह के आदेश वाली खबर इंडियन एक्सप्रेस से लेकर द टेलीग्राफ तक में है, भले द टेलीग्राफ में सिंगल कॉलम में है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में हत्या के 23 साल पुराने मामले में एक सजायाफ्ता महिला को सुप्रीम कोर्ट द्वारा छोड़ दिये जाने की खबर है। इससे पता चलता है कि देश की न्याय व्यवस्था की क्या हालत है और न्याय पाना कितना मुश्किल है। इस खबर की मानें तो न्याय मिलने में इतना समय लग गया जबकि दूसरे कई मामले हैं जिनमें सजा हुई ही नहीं। राजसत्ता किन मामलों में उच्च अदालत में अपील करेगी और किनमें नहीं से लेकर सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा लड़ना इतना महंगा है कि हर कोई राहत के लिए आ भी नहीं सकता है और जो आ सकता है उसे भी महीनों नहीं, वर्षों इंतजार करना पड़ता है। निश्चित रूप से यह स्थिति सुधरनी चाहिये और पहले की सरकारों ने इसपर ध्यान नहीं दिया तो इस सरकार को देना चाहिये था। हिन्दुओं का भला इससे भी किया जा सकता है पर वह मंदिर, भक्ति और आस्था में ही व्यस्त है। यह अलग बात है इससे इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई। जीएसटी वसूली बढ़ने का प्रचार ऐसी ही एक खबर है जो वर्षों से हर महीने पहले पन्ने पर छपती और छपवाई जाती है जबकि वसूली आम जनता और गरीबों से भी जाती है। यह खबर भी आज हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर दो कॉलम में है तो टाइम्स ऑफ इंडिया में दो लाइन के शीर्षक समेत कुल 11 लाइन की खबर बताती है कि विस्तार अंदर पेज 17 पर है। द हिन्दू ने पहले पन्ने पर दो कॉलम की एक खबर से बताया है कि केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर चर्चा करने अमेरिका जा रहे हैं। यह प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की खबर है।


